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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २१ ]

कमल, कूठ, पिप्पली इनको बारीक पीसकर सिर पर लेप करे । स्निग्ध हुए पुरुष को कंकड़े के मांसरस में सिद्ध किया तैल नस्य में देवे । वरुणादिगण को कूटकर इसमें आधा पानी मिलाया दूध क्षीरपाकविधि से पकावे । इस दूध में से मयकर घी निकाल ले । इस घी को काकोल्यादिगण से सिद्ध करके नस्य में भरते । वरुणादिगण में सिद्ध किये दूध में घी और शर्करा मिलाकर पीये । अवस्था के अनुसार मधुचूल्छ आदि स्नेह द्रव्यों से बनाये स्नेहिक धूम वैद्य करते ॥५-६॥

पानाभ्यञ्जननस्येषु वस्तिकर्म्मणि सेचने ॥१०॥

बिदध्यात्त्रैवृत्तं घीमान् बलात्तेलमथापि वा ।

पान, अभ्यङ्ग, नस्य या वस्तिकर्म में त्रैवृत्त स्नेह (अपतानक रोग में कहा) या बला (मृदगर्भ में कहा) बुद्धिमान् वैद्य करते ॥१०॥

भोजयेच्छ्व रसैः स्निग्धैः पयोभिर्वा सुसंस्कृतैः ॥११॥

स्निग्ध मांस रसों के साथ या वातहर द्रव्य साधित दूध भोजन देवे ॥११॥

पित्तरक्तसमुत्थानौ शिरोरोगौ निवारयेत् ।

शिरोलेपैः ससर्पिणैः परिषेकैश्च शीतलैः ॥१२॥

क्षीरेच्छुसधान्याम्बुस्तुष्कौदसिताजलैः ।

पित्तजन्य एवं रक्तजन्य शिरोरोग में घृत मिश्रित लेप सिर पर करे, शीतलद्रव्यों से परिषेक करे । यथा-दूध, ईल का रस, कांडी, मस्तु, सिता-जल (शर्बत) से परिषेक करे ॥१२॥

नल्वक्कुजुलकह्वारचन्दनोत्पलपद्मकैः ॥१३॥

वंशशोचलयघद्याह्वमुस्ताम्भोरुहसंयुतैः ।

शिरःप्रलेपैः सधुतैर्वैसर्पैश्च तथाविधैः ॥१४॥

मधुरैश्च मुखालेपैर्नस्यकर्मभिरैव च ।

लेप के लिये नइसर, वेतस, लालकमल, चन्दन, नीलोफर, पद्ममाल, वांस, शैवाल, मुलेहटी, मुस्ता, कमल, इनको घी में मिलाकर लेप करे, अथवा रक्त, पित्तजन्य विसर्प में भरते जानेवाले (उशीर लामरजक, चन्दन आदि) द्रव्यों से लेप करे ! काकोल्यादि मधुर द्रव्यों से मुख पर लेप करे तथा मधुर द्रव्यों से संस्कृत नस्य देवे, इनसे पित्त-रक्तजन्य शिरोरोग को शान्त करे ॥१३,१४॥

आस्थापनैर्विरेकैश्च पथ्यैश्च स्नेहवस्तिभिः ॥१५॥

क्षीरसर्पिहितं नस्यं वसा वा जाङ्गला शुभा ।

आस्थापन, विरेचन (मधुर द्रव्यों से सिद्ध) हितकारी वस्तु (आहार-विहार आदि), तथा स्नेहवस्तियों से पित्तरक्तजन्य शिरोरोग शान्त करे । दूध को मयकर निकाले घी का नस्य देवे । अथवा जांगल पशु-पक्षियों की वसा नस्य में उत्तम है ॥

उत्पलादिविपक्वेन क्षीरेणास्थापनं हितम् ॥१६॥

भोजनं जाङ्गलरसैः सर्पिषा चानुवासनम् ।

मधुरैः क्षीरसर्पिस्तु स्नेहने च सशर्करम् ॥१७॥

उत्पलादिगण से सिद्ध दूध से आस्थापन देना उत्तम है, जांगल मांसरसों से भोजन देवे, काकोल्यादिमधुरगण से संस्कृत घी से अनुवासन देवे । दूध को मयकर निकाला घी, शर्करा को मिलाकर स्नेहन नस्य में या स्नेहन वस्ति में देवे ॥१६,१७॥

पित्तरक्तजन्यमुद्भिदृष्टं यच्छ्वान्यदपि तद्वितम् ।

पान-आलेपन आदि में रक्त पित्तजन्य जो अन्य विधि कही है, वह भी यहाँ बरते ।

कफोत्थितं शिरोरोगं जयेत् कफनिवारणैः ॥१८॥

शिरोविरेकैर्बमनेस्तौदण्णद्वेषधारणैः ।

अच्छं च पाययेत्सर्पिः स्वेदयेच्छ्चात्यभीक्षणः ॥१९॥

शिरो मधुकसारैण स्निग्धं चापि विरेचयेत् ।

इक्षुदस्य त्वचा वाडपि मेघशुद्धस्य वा भिषक् ॥२०॥

कफजन्य शिरोरोग को कफनाशक शिरोविरेचनादि द्रव्यों से शान्त करे इसके शिरोविरेचन, तीक्ष्णवमन, तीक्ष्णगण्डुष मुख में रखे । शुद्ध घी पिलाये, बार-बार स्वेद देवे । स्निग्ध हुए रोगी के सिर को मधुक सार (महुए की लकड़ी के चूर्ण से), हिंगोट की छाल के या मेघशुद्धी के चूर्ण से वैद्य विरेचित करे ॥

आभ्यामेव कृतां वर्ति धूमपाने प्रयोजयेत् ।

घ्रेयं कटफलचूर्णं च कवलाश्च कफापहः ॥२१॥

सरलाकुष्ठशाङ्गुष्टादेवकाष्ठैः सरोहिषैः ।

क्षारपिष्टैः सुलवणैः मुखोष्णौलपयेच्छिरः ॥२२॥

हिंगोट की छाल और मेघशुद्धी से बनाई वर्त्ति धूमपान में देवे । कटफल का चूर्ण सूखे, कफहर द्रव्यों से बनाये कवलाधारण करे । चौड़, कूठ, शाङ्गुष्टा (छुई मुड़े), देवदारु, रोहिष-घास, इनको क्षारोदक से पीसकर, थोड़ा नमक मिला, सुहाता गरम-गरम शिर पर लेप करे ॥२१,२२॥

यवषट्टिकयोश्चान्नं न्योषक्षारसमायुतम् ।

पटोलमुद्गकौलत्थैर्मात्रावद्भोजयेद्दसैः ॥२३॥

सौठ, मरिच, पीपल, यवक्षार से मिश्रित जो और साठी का भोजन पटोल, मूँग, कुलत्थो इनके यूष के साथ, मात्रा में खिलाये ॥२३॥

शिरोरोगे त्रिदोषोत्थे त्रिदोषन्तो विधिहितः ।

त्रिदोषजन्य शिरोरोग में त्रिदोषनाशक विधि बरते ।

सर्पिःपानं विशेषैर्गु पुराणं वा दिशन्ति हि ॥२४॥

इसमें विशेषकर पुरातन घृत (दस साल पुराने) का पान उत्तम कहा जाता है ॥२४॥

क्षयजे क्षयमासाद्य कर्तव्यो बृंहणो विधिः ।

पाने नस्ये च सर्पिः स्याद्वातवन्मधुरैः श्रुतम् ॥२५॥

क्षयकासापहं चात्र सर्पिः पथ्यतमं विदुः ।

क्षयजन्य शिरोरोग में रक्त आदि घात के क्षय का निश्रय करके बृंहण चिकित्सा करनी चाहिये । वातल