सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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वातादि तीनों दोष कुपित होकर मन्त्रा को दबाकर गले के पिछले भाग में (गुठी पर) तीव्र वेदना को करते हैं। विशेषकर ये दोष आँख, भू और शंख देश में स्थित रहते हैं, इसमें गण्ड के पार्श्व में कम्पन होता है, हनुग्रह एवं आंख के रोग होते हैं। इस रोग को अनन्तवात कहते हैं, यह रोग त्रिदोषजन्य है।
चरक में—“उपवासतिशोकातिरुक्षशीताल्पमोजनैः । दुष्टा दोषाल्लयो मन्त्रां पश्चाद् घाटासु वेदनाम् ॥ तीव्रां कुर्वन्ति नासाधि भ्रशंखेष्ववतिष्ठते । स्मन्दनं गण्डपार्श्वस्य नेत्ररोगं हनुग्रहम् ॥ सोऽनन्तवातः ॥१३,१४॥
यस्योत्तमाङ्गार्धमतीव जन्योः संभेदतोदंभ्रमशूलजुष्टम् ॥१५॥ पश्चाद्दग्नाहादथवाऽप्यकरमा- तस्याधर्भेदं त्रितयाद्वयवश्येत । जिस रोगी के आधे सिर में अतिशय भेद पीड़ा (फटने की सी) तोद (चुमने का या दर्द), भ्रम एवं शूल होता है, और बिना कारण के ही पन्द्रह या दस दिन में आक्रमण होता रहता है, इस रोग को अर्धभेद (आधासीसी) कहते हैं, यह रोग तीनों दोषों से होता है। चरकमें—
रुक्षाल्यधशनात्पूर्वं वातावश्यायमैश्वनैः वेगसन्धारणायस न्यायामैः कुपितोऽनिलः ॥ केवलःसकफोवाऽधं यहीत्वा शिरघोऽनिलः । मन्त्राभ्र शंखकर्णाधि ललाटादं च वेदनाम् । शाखाशनिनिभां कुर्यात् तीव्रां सोऽर्धावभेदकः । नयनं वाऽयश्रोत्रं वा अति वृद्धे विनाशयेत् ॥ वि० मन्तव्यं—कभी २ सूर्यावर्त्त तथा अधोवभेदक दोनों का रोगसंकर भी होता है ॥१५॥
शङ्खाश्रितो वायुरुद्वीणवेगः कृतानुयात्रः कफपित्तरक्तैः ॥१६॥ रुजः सुतीव्राः प्रतनोति मूर्ध्नं विशेषतश्चापि हि शङ्खव्योस्तु । सुकष्टमेनं खलु गङ्गकाख्यं महर्षयो वेदविदः पुराणाः ॥१७॥ न्याधि वदन्त्युदगतमृत्युकल्पं भिषक्सहस्रैरपि दुर्निवारम् ॥१८॥
उद्वीणं वेगवान् शंख में आश्रित वायु-कफ, पित्त, रक्त का अनुसरण करके, शिर में विशेषकर शंख प्रदेश में अतितीव्र वेदना को उत्पन्न करता है। वेदविद पुरातन महर्षि इस अतिशय कष्टदायक रोग को शंखक कहते हैं। यह रोग मृत्यु के समान है, हजारों वैद्य भी इसको (जल्दी) अच्छा नहीं कर सकते। इसी से चरक में कहा है कि—
रक्तपित्तानिलादुष्टाः शंखदेशो विमूर्च्छिताः । तीव्रकदाहराणां हि शोफं कुर्वन्ति दारुणम् ।
सशिरो विषवद्देगी निरुध्याशुगलं तथा । त्रिरात्राज्जीवितं हन्ति शंखको नाम नामतः ॥ जीवेत् अहं चेद् भेषज्यं प्रत्याख्यायास्य कारयेत् । शिरोविरेकसैकादि सर्ववीसर्पनुच्छ यद् ॥ चरक—सि० अ० ६ ॥१६-१८॥ इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शाळाकथतन्त्रे शिरो- रोगविज्ञानौ नाम पञ्चविशोऽध्यायः ॥१५॥
षड्विंशतितमोऽध्यायः
अथातः शिरोरोगतिप्रषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥ अब इसके आगे शिरोरोगप्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे— जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥ वातव्याधिविधिः कार्यः शिरोरोगेऽनिलात्मके । पयोनुपानं सेवेत् घृतं तैलमथापि वा ॥३॥ वातजन्यशिरोरोग में वातव्याधि की चिकित्सा सम्पूर्णरूप में (अन्तः और बाह्य दोनों रूपों में) करनी चाहिये। दूध के अनुपान से घृत का (पित्त का अनुबन्ध वायु के साथ होनेपर) एवं तैल का (कफ का अनुबन्ध होने पर) सेवन करे ॥३॥ मुद्गनान् कुलस्थानमाषांश्च खादेच्छ च निशि केवलान् । कटुष्णांश्च ससर्पिष्कानुष्णं चानु पयः पिबेत् ॥४॥ पिबेद्वा पयसा तैलं तत्करकं वाऽपि मानवः । रात्रि में मृग, उड़द या कुलथी को अकेला (तीनों में से किसी एक को) खाये। इनको कटु और उष्ण द्रव्यों से संस्कृत करके, प्रचुर घी के साथ खाकर पीछे दूध पीये। अथवा दूध के साथ तिल तैल, या तिल का करक पीये ॥४॥
वातघ्नसिद्धेः क्षीरेश्च मुखोष्णेः सेकमाचरेत् ॥५॥ तसिद्धेः पायसैवाऽपि मुखोष्णैलंपयेच्छिरः । स्विन्नैर्वा मत्स्यपिशितैः कुग्रैर्वा ससेन्धवैः ॥६॥ चन्दनोत्पलकुष्ठैर्वा सुरलक्षणैर्माधायुतैः । स्निग्धस्य तैलं नस्यं स्यात् कुळीररससाधितम् ॥७॥ वरुणादीं गणै लुण्णै क्षीरमर्घादिकं पचेत् । क्षीरशेषं च तन्मध्यं शीतं सारमुपाहरेत् ॥८॥ ततो मधुरकैः सिद्धं नस्यं तत् पूजितं हविः । तस्मिन् विपक्वै क्षीरे तु पेर्यं सर्पिः सशर्करम् ॥९॥ धूमं चास्य यथाकालं स्नेहिकं योजयेद्विभषक् । भद्राव्यादि वातघ्न द्रव्यों से सिद्ध दूध से सुहाता हुआ गरम-गरम घासा सेक शिर पर करे। वातघ्न सिद्ध दूध में बनाई खीर से (अथवा मावे से) सुहाता गरम-गरम लैप सिर पर करे। मछली के मांस को स्विन्न करके या तिल तण्डुल माप से बनी यवाम् को सेन्व मिलाकर गरम-गरम लैप करे। चंदन,