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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २५ ]

श्रीतेन रात्रौ च भवेद्विशेषः

शिरोभितापः स तु पित्तकोपात् ॥६॥

जिस रोगी का शिर गरम, अङ्गारों से भरा जैसा (उष्ण) हो, शिर, आंख, नाक जलती हो या घुएँ के समान धुआँ सा निकलता प्रतीत हो, शीतोपचार से या रात्रि में जो घट जाता हो, वह शिररोग पित्त के प्रकोप से होता है ॥६॥

शिरोगलं यस्य कफोपदिग्धं

गुरु प्रतिष्ठुध्यमथो हिमं च ।

शूनाक्षिकृटं वदनं च यस्य

शिरोभितापः स कफप्रकोपात् ॥७॥

जिस रोगी का शिर और गला कफ से भरा हुआ हो, भारी एवं स्थिर तथा ठण्डा हो, अक्षिकृट और मुख पर सूजन हो, यह शिररोग कफ के प्रकोप से होता है ॥७॥

शिरोभितापे त्रितयप्रवृत्ते

सर्वाणि लिङ्गानि समुद्भवन्ति ।

सन्निपातशिररोग में तीनों दोषों के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ।

रक्तारम्भः पित्तसमानलिङ्गः

सर्पासहस्रं शिरसो भवेच्च ॥८॥

रक्तजन्यशिररोग में पित्तज शिररोग के समान लक्षण रहते हैं, सर्पा को सहन नहीं करता (इसमें आवाज भी रोगी सहन नहीं करता-बोलना अच्छा नहीं लगता) ॥८॥

वसाबलासक्षतसंभवानां

शिरोगतानामिह संक्षयेण ।

क्षयप्रवृत्तः शिरसोऽभितापः

कष्टो भवेदुप्ररुजोऽति मात्रम् ॥९॥

संस्वेदनच्छर्द्वन धूमनस्यै-

रस्तुन्विमोक्षेऽश्र विवृद्धिमेति ।

आघात के कारण शिर में से वसा, कफ (देह स्नेह, मस्तिष्क-मेद-मज्जा आदि) के क्षीण हो जाने से, क्षयजन्य शिररोग होता है, इसमें अतिशय तीव्रवेदना रहती है । यह वेदना स्वेदन, वमन, धूम, नस्य, रक्तमोक्षण आदि से बढ़ जाती है ॥९॥

निस्तुद्यते यस्य शिरसोऽतिमात्रं

संभद्वयमाणं स्फुरतीव चान्तः ॥१०॥

प्राणाच्छ गच्छेत्सलिलं सरक्तं

शिरोभितापः क्रमिभिः स घोरः ।

जिस रोगी के शिर में अतिशय तीव्र वेदना होती हो ( चुभती हुई वेदना ) शिर के अन्दर खाने के समान या स्फुरण ( रँगने के-चलने के ) समान अनुभव होता हो, नाक से ईषत् रक्त मिला पानी बहता हो, यह शिररोग क्रमिजन्य होता है चरक में—

तिलक्षीरगुडाजीर्णपूति संकीर्ण भोजनात् । कलेदोऽसूक्तकफमंजानां दोषलस्योपजायते । ततः शिरसि संकलेदात् कुमयः पापकर्मणः । जनयन्ति शिरसि रोगं जाता बीभत्सलक्षणः । व्यधच्छेदवृकाण्ड शोफदीर्गस्थुः खितम् ॥ कूमिरोगातुरं विद्यात् कूमिणां दर्शनेन च ॥ वि० मन्तव्य—देखिये अ० २४ के श्लो० १३ का वक्तव्य

॥१०॥

सूर्यादयं वा प्रति मन्दमन्दा-

मक्षिभ्रवं रुक् ससुपैति गाढम् ॥११॥

त्रिवर्धते चाशुमता सहैव

सूर्यापवृत्तौ विनिवर्तते च ।

श्रीतेन शान्ति लभते कदाचि-

दुष्णेन जनतुः सुखमाप्नुयाच्छ ॥१२॥

तं भास्करावर्तमुदाहरन्ति

सर्वात्मकं कष्टतमं विकारम् ।

सूर्योदय के साथ-साथ धीरे-धीरे—आंख, भ्रुवों से मन्द-मन्द वेदना आरम्भ होकर सूर्य के बढ़ने के साथ साथ तीव्र होती जाती हो, तथा सूर्य के घटने पर शान्त होती हो, तथा कभी कभी क्षीतल उपचार से और कभी उष्ण उष्ण उपचार से रोगी को सुख मिलता हो, इस वेदना को सूर्यावर्त्त कहते हैं । यह रोग सन्निपातजन्य और अतिकष्टदायक है । ( गरम से शान्ति सूर्यावर्त्तविपर्यय में होती है ) ॥

वक्तव्य—रात में क्यों दब नहीं होता—“स्वभाव क्षीता तस्योऽभिभूला रात्रिस्तयोद्भूतकफेन मार्गे रुद्धे मरुत्कोपमियात् प्रभाते रुजं करोत्यत्र शिरोभितापे । मध्याह्नसूर्यातिपतापयोगात् कफे विछीने मरुति प्रपन्ने । स्वमार्गमायाति तदा दिनान्ते प्रशान्तिमावर्त्तं हृद्वाकं पूर्व ॥” चरक में—सि० अ० ६

संधारणात् अजीर्णानिः मस्तिष्कं रक्तमाकृतौ ।

दुष्टो दूषयतस्तच्च दुष्टं ताभ्यां विमूर्छितम् ॥

सूर्योदयाशुसंतापात् दुष्टं विष्यन्दते शनैः ।

ततो दिने शिरः शूलं दिनवृद्धया च वर्द्धते ।

दिनक्षये ततः स्याने मस्तिष्के संप्रामभ्यति ।

सूर्यावर्त्तः स एव स्यात् ॥११,१२॥

दोषास्तु दुष्टाच्छय एव मन्यां

संपोड्य घाटासु रुजां सुतोत्राम् ॥१३॥

कुर्वन्ति साक्षिभ्रवि शखदेशे

स्थिति करोत्याशु विशेषतस्तु ।

गण्डस्य पाश्चै तु करोति कम्पं

हनुमह लोचनजांश्च रोगान् ॥१४॥

अनन्तवार्ता तमुदाहरन्ति

दोषत्रयोत्थं शिरसो विकारम् ।