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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० २५ ]

उत्तरतन्त्रम्

६१५

तुत्थं करजं बीजं च लवणं भद्रदाह च । एतेः कृतं कषायं तु कवले संप्रयोजयेत् ॥३७॥ हितं मूर्धनिरेके च तैलमेभिर्विपाचितम् । मुस्ता, तेजवल्, पाठा, कटफल, कटुकी, बच, सरसों, पिप्पलीमूल, पिप्पली, सैन्धव, चित्रक, तुत्थ, करंजीज, सैन्धव, देवदारु इनका कषाय कवल में बरते । इनसे सिद्ध किया तेल शिरोविरेचन में बरते ॥३६, ३७॥

क्षीरमर्धजले कषाथ्यं जाङ्गु लैसुंगपक्षिभिः ॥३८॥ पुष्यैर्विमिश्रं जलजं वीतं घनरौषधैरपि । हिमे क्षीरावशिष्टेऽस्मिन् घृतमुत्पाद्य यत्नतः ॥३९॥ सर्वगन्धसितानन्तामधुक् चन्दनं तथा । आवाप्य विपचेद्भूयो दशाक्षीरं तु तद्घृतम् ॥४०॥ नस्ये प्रयुक्तमुद्रिक्तान् प्रतिसयायान् व्यपोहति । यथास्वं दोषशमनैस्तैलं कुर्याच्छ च यत्नतः ॥४१॥

दूध में आधा पानी मिलाकर, जांगल पशु-पक्षियों के सांठों से कमल आदि जलजन्य पुष्पों से विदारिगन्धदि वातनाशक द्रव्यों से पकाना चाहिये । जब केवल दूध मात्र रह जाये, तब इसे मथकर युक्ति से घी निकाल ले । इस घृत में दशगुणा दूध, एलादिगन्ध के सुगन्धित द्रव्य, शर्करा, सारिबा, मुलेहठी, चंदन का प्रक्षेप देकर घृत करे । यह घृत नस्य में बरतने पर बड़े हुए प्रतिसयायों को नष्ट कर देता है । दोषों के अपने अनुसार वात-पित्त-कफहर द्रव्य समूहों से तैल को विधिपूर्वक बनाये ॥३८-४१॥

समूत्रपित्ताश्चोद्धिष्टाः क्रियाः क्रुमिषु योजयेत् । यापनार्थं क्रुमिष्वनानि भेषजानि च बुद्धिमान् ॥४२॥ क्रुमिनाशक जो चिकित्सा कही है, उसे मूत्र और पित्त के साथ मिलाकर, तथा सुरसादिगण क्रुमिष्वननाशक चिकित्सा को क्रुमिरोग के यापना के लिये बुद्धिमान् बरते ॥४२॥

इति सुप्रतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे प्रति-श्यामप्रतिषेधो नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥

पञ्चविंशतितमोऽध्यायः

अथातः शिरोरोगविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे शिरोरोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान करने—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।

वि० मन्त्रव्य—इस अध्याय में शिर के भीतरी रोगों का वर्णन है शिर के बाहरी रोग अर्धविका आदि का वर्णन छुट्ट रोगों में किया गया है । इस प्रकरण में रोग शब्द का तात्पर्य केवल “वेदना” शूल या दर्द से है । शिरः शूलके ही निम्नलिखित ११ भेद हैं ॥१, २॥

शिरो रुजति मर्त्यानां वातपित्तकफैस्त्वभिः । सन्निपातेन रक्तन क्षयेण क्रुमिभस्तथा ॥३॥ सूर्यावर्तानन्तवातार्धावभेदकगङ्गुः । एकादशप्रकारस्य लक्षणं संप्रबद्धयेत् ॥४॥ वात, पित्त, कफ, इन तीन से, सन्निपात से, रक्त के क्षय से, क्रुमियों से, सूर्यावर्त्त, अनन्त वात, अर्धावभेदक, शंखक से इन ग्यारह प्रकार से शिर में वेदना होती है, इसके लक्षणों को कहेंगे । ३-४ चरक— “पृथग् दृष्टास्तु ये पंच संग्रहे परमर्षिभिः । शिरोगदास्तान् शृणु मे यथास्वः हेतुलक्षणैः । संधारणात् दिवास्वप्नान् राज्ञो जागरणात् मदात् । उच्चैः भाष्यादवशयात् प्राग्वातादतिमेधुनात् ॥ गन्धादसत्यादाघातात् रजोधूमहिमातपात् । गुर्वल्लह्रितादानादतिशीताम्बुसेवनात् ॥ षिरोभिघातात् दुष्टाभात् रोदनात् वाष्पनिग्रहात् । वातादयः प्रकृप्यन्ति शिरस्यस्वं प्रदुष्यति ॥

सूर्यावर्त्त का विपरीत सूर्यावर्त्तक विपर्यय भी एक रोग है—यथा—“तत्र वातानुगं पित्तं वित्तं शिरसि तिष्ठति । मध्याह्ने तेजसाऽकस्य तद् विवृद्धं शिरोरुजम् । करोति पैत्तिकीं घोरं संक्षाम्यति दिनक्षये । अस्तं गते प्रमाहीने सूर्यं वायुर्विबर्धते । पित्तं शान्तिमवाप्नोति ततः शाम्यति वेदना । एषपित्तानिल-कृतः सूर्यावर्त्तविपर्ययः ॥ “दूसरे—” वातपित्तात् पुरो जाता रुजाऽन्यैस्परारहतः । सूर्यावर्त्तः सतु प्रोक्तो विपरीते विपर्ययः ॥”—जिस प्रकार चातुर्थक ज्वर का चातुर्थक विपर्यय ज्वर होता है, उसी प्रकार सूर्यावर्त्त का सूर्यावर्त्तक विपर्यय होता है । कई लोग शीर्षक एक रोग मानते हैं—यथा—“आलुच्छ्यते कम्पति चापि मूर्धा, सर्पन्ति मध्ये च पिपीलका वा । स्कन्धः शिरश्चाप्यवधूण्ते च मूच्छां प्रलापश्च तथैव निद्रा ॥ संज्ञाप्रकारां जनयेद् विनिद्रां प्रातस्ततः षश्यति चातिचिन्म । युद्धाति मन्त्रे हृदयं च रूपैः सर्वैरमीभिः समभिदुतस्तु । तिखोहरिप्रत्रिंरंजावुजीवेत् तं शीर्षकं गैत्रवदन्ति रोगम् ॥” वस्त्रन टीका से उद्धृत । यस्यानिमित्तं शिरसो रुजश्च

भवन्ति तीव्रा निशि चातिमात्रम् । बन्धोपतापैश्च भवेद्विशेषः । शिरोभितापः स समीरणेन ॥५॥ जिस पुरुष में बिना किसी कारण के या थोड़े से भी कारण से शिर में दर्द हो जाता है, और रात में बहुत अधिक बढ़ जाता है, बांधने या सेकने से जो घट जाता हो, वह शिरोरोग वायु के कारण से होता है ॥५॥ यस्योणामङ्कारचित्तं यथैव बृहत् धृष्येत शिरोक्षिनासम् ।