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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुश्रुतसंहिता

[ ४० ]

जो कफ एक गया हो, षट् हो गया हो, नीचे लटकता हो, उस कफ को शिरोविरचनो से खींचे । दोषों को देखकर विरेचन, आस्थापन, धूम, नस्य और कवलग्रह बरते ॥२०॥

निवातशय्यासनचेष्टनानि

मूर्ध्नां गुरुष्णं च तथैव वासः ।

तीक्ष्णा विरेकाः शिरसः सधूमा

रुक्षं यवात्रं विजया च सेव्या ॥२१॥

और वायुरहित घर में बैठना उठना, सोना, रहना करे, शिर को गरम एवं भारी वस्त्र से लपेटा रहे । तीक्ष्ण शिरो-विरचन देवे, धूमपान करे । रुक्ष एवं जो का तथा हरङ्ग का सेवन करे ॥२१॥

शीतान्मुद्योषिच्छिशिरावगाह-

चिन्तातिरुक्षाशनवेगरोधान् ।

शोकं च मद्यानि नवानि चैव

विवजयेत् पीनसरोगजुष्टः ॥२२॥

शीतल पानी, झोंसंग, शिर के साथ स्नान, चिन्ता, अति-रुक्षभोजन, उपस्थित बेगों को रोकना, शोक, नूतन बनाये मद्य, इनका पीनस रोगी सेवन न करे ॥२२॥

छर्द्यङ्गसाद्वस्वरगौरवार्त-

मरोचकारत्यतिसारयुक्तम् ।

विलङ्घनैः पाचनदीपनीये-

रूपाचरेत् पीनसिनं यथावत् ॥२३॥

वमन, अंगों का टूटना, खर, भारीपन, अरोचक, बेचैनी या अतिसार से पीड़ित पीनस रोगी की चिकित्सा लंघन से, दीपन-पाचन रोगों से, रोगों के अनुसार करे ॥२३॥

बहुद्रवैर्वातिकफोपसृष्टं

प्रच्छदयेत् पीनसिनं वयःस्थम ।

उपद्रवांश्चापि यथोपदेशं

स्वैर्भेषजैर्भोजनसंविधानैः ॥

जयेद्विदित्वा मृदुतां गतेषु

प्रागलक्षणैर्भूकृत्तमथादिशेच्च ॥२४॥

तरुण पीनस रोगी यदि बात, कफ से युक्त हो तो उसे अतिशय द्रववाले वमनों से वमन कराये । कथनानुसार उपद्रवों की उनकी अपनी औषधियों से भोजनों की कल्पना से चिकित्सा करे । दोषों को कोमल हुआ जानकर (घट जाने पर) आमप्रतिशय के लक्षणों में उनकी कही चिकित्सा करे ॥२४॥

वातिके तु प्रतिशयाये पिवेत् सर्पिर्यथाक्रमम् ।

पञ्चभिर्लवणैः सिद्धं प्रथमेन गणेन च ॥२५॥

नस्यादिषु विधिं कृत्स्नमवेक्षेतादितैरितम् ।

वातिक प्रतिशय म—स्नेहपानविधि से पाँचों नमक से सिद्ध या विदार्थदि प्रथमगण से सिद्ध घृत को पिये । नस्य आदि में अर्दित रोग की सम्पूर्ण चिकित्सा को करे ॥२५॥

पित्तरक्तोत्थयोः पेष्यं सर्पिसंघुरकैः श्रुतम् ॥२६॥

परिषेकान् प्रदेहाश्च कुर्यादपि च शीतलान् । श्रीसर्जरसपत्तंगप्रियकुमधुशर्कराः ॥२७॥

द्राक्षां मधूलिकां गोजीं श्रीपर्णीं मधुकैस्तथा । युज्यन्ते कवलाश्चात्र विरेको मधुरैरपि ॥२८॥

पित्त-रक्तजन्य प्रतिशय म—काकोल्यादि गण से सिद्ध घृत पिये । शीतल परिषेक, शीतल प्रदेह करे । राल, श्री (श्रीगंधक विरोजा), लालचन्दन, प्रियंगु, मधु, शर्करा, द्राक्षा, मधूलिका (गिलोय) गाजवां, गम्भारी, मुलेहटी इनसे सिद्ध घृत देवे । मधुर द्रव्यों से कवल और विरेचन देवे ॥२९-३०॥

धवस्वक्त्रिफलाश्यामातिल्वकैर्मधुकेन च । श्रीपर्णीरजनीमिश्रैः स्त्रीरे दशगुणे पचेत् ॥३१॥

तैलं कालोपपन्नं तत्रस्थं स्यादनयोहितम् । धवन की छाल, त्रिफला, कालीनिशोथ, तिल्वक, (लोथ) मुलेहटी, गम्भारी, हल्दी, इनसे, (तेल से) दस गुणे दूध में तैल सिद्ध करे । निराम हो जाने पर पित्त-रक्तजन्य प्रतिशय म से इससे नस्य देवे ॥३१॥

कफजे सर्पिषा स्निग्धं तिलमाषविपक्वया ॥३२॥ यवाग्वा वामयेद्वातः कफघ्नं क्रमसाचरेत् । उभे बले बृहदयो च विडंगं सत्रिकण्टकम् ॥३३॥

श्वेतामूलं सदाभद्रां वर्षाभूं चात्र सहंरेत् । तेलमेर्भिविपक्वं तु नस्यमस्योपकल्पयेत् ॥३४॥ सरलाकिण्णिहीदारुनिकुम्भेकुडिभिः कृताः । वर्तयश्चोपयोऽन्याः स्तुधेमपाने यथाविधि ॥३५॥

कफजन्य प्रतिशय म—रोगी को घी से स्निग्ध करके, तिल और उड़द से बनाई यवागू से वमन कराये और वमन के पीछे कफनाशक अन्न संसजन (पेया आदि) विधि बरते । बला, अतिबला, कटेरी, बड़ी कटेरी, वायविडंग, त्रिकुट, अपराजितामूल, गम्भारी, पुनर्नवा इनसे सिद्ध किया तेल इस रोगी को नस्य में देवे । चीड़, चिरचिटा, देवदारु, दन्ती, हिंगोट इनसे बनाई वर्त्तियाँ विधिपूर्वक धूमपान में बरतनी चाहिए ॥३०-३५॥

सर्पिषि कटुतिक्तानि तीक्ष्णधूमाः कटूनि च । भेषजान्युपयुक्तानि हन्युः सर्वप्रकोपजम् ॥३६॥

रसाळजने सातिविषे मुस्तायां भद्रदारुणि । तैलं विपक्वं नस्यार्थं विदध्याश्चात्र बुद्धिमान् ॥३७॥

कटु-तिक्त द्रव्यों से सिद्ध घृत, तीक्ष्णधूम, कटु औषधियों का उपयोग सविपातजन्य प्रतिशय म को नष्ट कर देता है । इस प्रतिशय म में बुद्धिमान् वैद्य-रसौत, अतीस, मुस्ता, देवदारु से सिद्ध तैल नस्य के लिये बरते ॥३६,३७॥

मुस्ता तेजोवती पाठा कटफलं कटुका वचा । सर्षपाः पिप्पलीमूलं पिप्पल्यः सेन्धवागिनकी ॥३८॥