सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ ४० ]
जो कफ एक गया हो, षट् हो गया हो, नीचे लटकता हो, उस कफ को शिरोविरचनो से खींचे । दोषों को देखकर विरेचन, आस्थापन, धूम, नस्य और कवलग्रह बरते ॥२०॥
निवातशय्यासनचेष्टनानि
मूर्ध्नां गुरुष्णं च तथैव वासः ।
तीक्ष्णा विरेकाः शिरसः सधूमा
रुक्षं यवात्रं विजया च सेव्या ॥२१॥
और वायुरहित घर में बैठना उठना, सोना, रहना करे, शिर को गरम एवं भारी वस्त्र से लपेटा रहे । तीक्ष्ण शिरो-विरचन देवे, धूमपान करे । रुक्ष एवं जो का तथा हरङ्ग का सेवन करे ॥२१॥
शीतान्मुद्योषिच्छिशिरावगाह-
चिन्तातिरुक्षाशनवेगरोधान् ।
शोकं च मद्यानि नवानि चैव
विवजयेत् पीनसरोगजुष्टः ॥२२॥
शीतल पानी, झोंसंग, शिर के साथ स्नान, चिन्ता, अति-रुक्षभोजन, उपस्थित बेगों को रोकना, शोक, नूतन बनाये मद्य, इनका पीनस रोगी सेवन न करे ॥२२॥
छर्द्यङ्गसाद्वस्वरगौरवार्त-
मरोचकारत्यतिसारयुक्तम् ।
विलङ्घनैः पाचनदीपनीये-
रूपाचरेत् पीनसिनं यथावत् ॥२३॥
वमन, अंगों का टूटना, खर, भारीपन, अरोचक, बेचैनी या अतिसार से पीड़ित पीनस रोगी की चिकित्सा लंघन से, दीपन-पाचन रोगों से, रोगों के अनुसार करे ॥२३॥
बहुद्रवैर्वातिकफोपसृष्टं
प्रच्छदयेत् पीनसिनं वयःस्थम ।
उपद्रवांश्चापि यथोपदेशं
स्वैर्भेषजैर्भोजनसंविधानैः ॥
जयेद्विदित्वा मृदुतां गतेषु
प्रागलक्षणैर्भूकृत्तमथादिशेच्च ॥२४॥
तरुण पीनस रोगी यदि बात, कफ से युक्त हो तो उसे अतिशय द्रववाले वमनों से वमन कराये । कथनानुसार उपद्रवों की उनकी अपनी औषधियों से भोजनों की कल्पना से चिकित्सा करे । दोषों को कोमल हुआ जानकर (घट जाने पर) आमप्रतिशय के लक्षणों में उनकी कही चिकित्सा करे ॥२४॥
वातिके तु प्रतिशयाये पिवेत् सर्पिर्यथाक्रमम् ।
पञ्चभिर्लवणैः सिद्धं प्रथमेन गणेन च ॥२५॥
नस्यादिषु विधिं कृत्स्नमवेक्षेतादितैरितम् ।
वातिक प्रतिशय म—स्नेहपानविधि से पाँचों नमक से सिद्ध या विदार्थदि प्रथमगण से सिद्ध घृत को पिये । नस्य आदि में अर्दित रोग की सम्पूर्ण चिकित्सा को करे ॥२५॥
पित्तरक्तोत्थयोः पेष्यं सर्पिसंघुरकैः श्रुतम् ॥२६॥
परिषेकान् प्रदेहाश्च कुर्यादपि च शीतलान् । श्रीसर्जरसपत्तंगप्रियकुमधुशर्कराः ॥२७॥
द्राक्षां मधूलिकां गोजीं श्रीपर्णीं मधुकैस्तथा । युज्यन्ते कवलाश्चात्र विरेको मधुरैरपि ॥२८॥
पित्त-रक्तजन्य प्रतिशय म—काकोल्यादि गण से सिद्ध घृत पिये । शीतल परिषेक, शीतल प्रदेह करे । राल, श्री (श्रीगंधक विरोजा), लालचन्दन, प्रियंगु, मधु, शर्करा, द्राक्षा, मधूलिका (गिलोय) गाजवां, गम्भारी, मुलेहटी इनसे सिद्ध घृत देवे । मधुर द्रव्यों से कवल और विरेचन देवे ॥२९-३०॥
धवस्वक्त्रिफलाश्यामातिल्वकैर्मधुकेन च । श्रीपर्णीरजनीमिश्रैः स्त्रीरे दशगुणे पचेत् ॥३१॥
तैलं कालोपपन्नं तत्रस्थं स्यादनयोहितम् । धवन की छाल, त्रिफला, कालीनिशोथ, तिल्वक, (लोथ) मुलेहटी, गम्भारी, हल्दी, इनसे, (तेल से) दस गुणे दूध में तैल सिद्ध करे । निराम हो जाने पर पित्त-रक्तजन्य प्रतिशय म से इससे नस्य देवे ॥३१॥
कफजे सर्पिषा स्निग्धं तिलमाषविपक्वया ॥३२॥ यवाग्वा वामयेद्वातः कफघ्नं क्रमसाचरेत् । उभे बले बृहदयो च विडंगं सत्रिकण्टकम् ॥३३॥
श्वेतामूलं सदाभद्रां वर्षाभूं चात्र सहंरेत् । तेलमेर्भिविपक्वं तु नस्यमस्योपकल्पयेत् ॥३४॥ सरलाकिण्णिहीदारुनिकुम्भेकुडिभिः कृताः । वर्तयश्चोपयोऽन्याः स्तुधेमपाने यथाविधि ॥३५॥
कफजन्य प्रतिशय म—रोगी को घी से स्निग्ध करके, तिल और उड़द से बनाई यवागू से वमन कराये और वमन के पीछे कफनाशक अन्न संसजन (पेया आदि) विधि बरते । बला, अतिबला, कटेरी, बड़ी कटेरी, वायविडंग, त्रिकुट, अपराजितामूल, गम्भारी, पुनर्नवा इनसे सिद्ध किया तेल इस रोगी को नस्य में देवे । चीड़, चिरचिटा, देवदारु, दन्ती, हिंगोट इनसे बनाई वर्त्तियाँ विधिपूर्वक धूमपान में बरतनी चाहिए ॥३०-३५॥
सर्पिषि कटुतिक्तानि तीक्ष्णधूमाः कटूनि च । भेषजान्युपयुक्तानि हन्युः सर्वप्रकोपजम् ॥३६॥
रसाळजने सातिविषे मुस्तायां भद्रदारुणि । तैलं विपक्वं नस्यार्थं विदध्याश्चात्र बुद्धिमान् ॥३७॥
कटु-तिक्त द्रव्यों से सिद्ध घृत, तीक्ष्णधूम, कटु औषधियों का उपयोग सविपातजन्य प्रतिशय म को नष्ट कर देता है । इस प्रतिशय म में बुद्धिमान् वैद्य-रसौत, अतीस, मुस्ता, देवदारु से सिद्ध तैल नस्य के लिये बरते ॥३६,३७॥
मुस्ता तेजोवती पाठा कटफलं कटुका वचा । सर्षपाः पिप्पलीमूलं पिप्पल्यः सेन्धवागिनकी ॥३८॥
अ० २५ ]
उत्तरतन्त्रम्
६१५
तुत्थं करजं बीजं च लवणं भद्रदाह च । एतेः कृतं कषायं तु कवले संप्रयोजयेत् ॥३७॥ हितं मूर्धनिरेके च तैलमेभिर्विपाचितम् । मुस्ता, तेजवल्, पाठा, कटफल, कटुकी, बच, सरसों, पिप्पलीमूल, पिप्पली, सैन्धव, चित्रक, तुत्थ, करंजीज, सैन्धव, देवदारु इनका कषाय कवल में बरते । इनसे सिद्ध किया तेल शिरोविरेचन में बरते ॥३६, ३७॥
क्षीरमर्धजले कषाथ्यं जाङ्गु लैसुंगपक्षिभिः ॥३८॥ पुष्यैर्विमिश्रं जलजं वीतं घनरौषधैरपि । हिमे क्षीरावशिष्टेऽस्मिन् घृतमुत्पाद्य यत्नतः ॥३९॥ सर्वगन्धसितानन्तामधुक् चन्दनं तथा । आवाप्य विपचेद्भूयो दशाक्षीरं तु तद्घृतम् ॥४०॥ नस्ये प्रयुक्तमुद्रिक्तान् प्रतिसयायान् व्यपोहति । यथास्वं दोषशमनैस्तैलं कुर्याच्छ च यत्नतः ॥४१॥
दूध में आधा पानी मिलाकर, जांगल पशु-पक्षियों के सांठों से कमल आदि जलजन्य पुष्पों से विदारिगन्धदि वातनाशक द्रव्यों से पकाना चाहिये । जब केवल दूध मात्र रह जाये, तब इसे मथकर युक्ति से घी निकाल ले । इस घृत में दशगुणा दूध, एलादिगन्ध के सुगन्धित द्रव्य, शर्करा, सारिबा, मुलेहठी, चंदन का प्रक्षेप देकर घृत करे । यह घृत नस्य में बरतने पर बड़े हुए प्रतिसयायों को नष्ट कर देता है । दोषों के अपने अनुसार वात-पित्त-कफहर द्रव्य समूहों से तैल को विधिपूर्वक बनाये ॥३८-४१॥
समूत्रपित्ताश्चोद्धिष्टाः क्रियाः क्रुमिषु योजयेत् । यापनार्थं क्रुमिष्वनानि भेषजानि च बुद्धिमान् ॥४२॥ क्रुमिनाशक जो चिकित्सा कही है, उसे मूत्र और पित्त के साथ मिलाकर, तथा सुरसादिगण क्रुमिष्वननाशक चिकित्सा को क्रुमिरोग के यापना के लिये बुद्धिमान् बरते ॥४२॥
इति सुप्रतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे प्रति-श्यामप्रतिषेधो नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥
पञ्चविंशतितमोऽध्यायः
अथातः शिरोरोगविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे शिरोरोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान करने—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।
वि० मन्त्रव्य—इस अध्याय में शिर के भीतरी रोगों का वर्णन है शिर के बाहरी रोग अर्धविका आदि का वर्णन छुट्ट रोगों में किया गया है । इस प्रकरण में रोग शब्द का तात्पर्य केवल “वेदना” शूल या दर्द से है । शिरः शूलके ही निम्नलिखित ११ भेद हैं ॥१, २॥
शिरो रुजति मर्त्यानां वातपित्तकफैस्त्वभिः । सन्निपातेन रक्तन क्षयेण क्रुमिभस्तथा ॥३॥ सूर्यावर्तानन्तवातार्धावभेदकगङ्गुः । एकादशप्रकारस्य लक्षणं संप्रबद्धयेत् ॥४॥ वात, पित्त, कफ, इन तीन से, सन्निपात से, रक्त के क्षय से, क्रुमियों से, सूर्यावर्त्त, अनन्त वात, अर्धावभेदक, शंखक से इन ग्यारह प्रकार से शिर में वेदना होती है, इसके लक्षणों को कहेंगे । ३-४ चरक— “पृथग् दृष्टास्तु ये पंच संग्रहे परमर्षिभिः । शिरोगदास्तान् शृणु मे यथास्वः हेतुलक्षणैः । संधारणात् दिवास्वप्नान् राज्ञो जागरणात् मदात् । उच्चैः भाष्यादवशयात् प्राग्वातादतिमेधुनात् ॥ गन्धादसत्यादाघातात् रजोधूमहिमातपात् । गुर्वल्लह्रितादानादतिशीताम्बुसेवनात् ॥ षिरोभिघातात् दुष्टाभात् रोदनात् वाष्पनिग्रहात् । वातादयः प्रकृप्यन्ति शिरस्यस्वं प्रदुष्यति ॥
सूर्यावर्त्त का विपरीत सूर्यावर्त्तक विपर्यय भी एक रोग है—यथा—“तत्र वातानुगं पित्तं वित्तं शिरसि तिष्ठति । मध्याह्ने तेजसाऽकस्य तद् विवृद्धं शिरोरुजम् । करोति पैत्तिकीं घोरं संक्षाम्यति दिनक्षये । अस्तं गते प्रमाहीने सूर्यं वायुर्विबर्धते । पित्तं शान्तिमवाप्नोति ततः शाम्यति वेदना । एषपित्तानिल-कृतः सूर्यावर्त्तविपर्ययः ॥ “दूसरे—” वातपित्तात् पुरो जाता रुजाऽन्यैस्परारहतः । सूर्यावर्त्तः सतु प्रोक्तो विपरीते विपर्ययः ॥”—जिस प्रकार चातुर्थक ज्वर का चातुर्थक विपर्यय ज्वर होता है, उसी प्रकार सूर्यावर्त्त का सूर्यावर्त्तक विपर्यय होता है । कई लोग शीर्षक एक रोग मानते हैं—यथा—“आलुच्छ्यते कम्पति चापि मूर्धा, सर्पन्ति मध्ये च पिपीलका वा । स्कन्धः शिरश्चाप्यवधूण्ते च मूच्छां प्रलापश्च तथैव निद्रा ॥ संज्ञाप्रकारां जनयेद् विनिद्रां प्रातस्ततः षश्यति चातिचिन्म । युद्धाति मन्त्रे हृदयं च रूपैः सर्वैरमीभिः समभिदुतस्तु । तिखोहरिप्रत्रिंरंजावुजीवेत् तं शीर्षकं गैत्रवदन्ति रोगम् ॥” वस्त्रन टीका से उद्धृत । यस्यानिमित्तं शिरसो रुजश्च
भवन्ति तीव्रा निशि चातिमात्रम् । बन्धोपतापैश्च भवेद्विशेषः । शिरोभितापः स समीरणेन ॥५॥ जिस पुरुष में बिना किसी कारण के या थोड़े से भी कारण से शिर में दर्द हो जाता है, और रात में बहुत अधिक बढ़ जाता है, बांधने या सेकने से जो घट जाता हो, वह शिरोरोग वायु के कारण से होता है ॥५॥ यस्योणामङ्कारचित्तं यथैव बृहत् धृष्येत शिरोक्षिनासम् ।
६५६
सुश्रुतसंहिता
[ अ० २५ ]
श्रीतेन रात्रौ च भवेद्विशेषः
शिरोभितापः स तु पित्तकोपात् ॥६॥
जिस रोगी का शिर गरम, अङ्गारों से भरा जैसा (उष्ण) हो, शिर, आंख, नाक जलती हो या घुएँ के समान धुआँ सा निकलता प्रतीत हो, शीतोपचार से या रात्रि में जो घट जाता हो, वह शिररोग पित्त के प्रकोप से होता है ॥६॥
शिरोगलं यस्य कफोपदिग्धं
गुरु प्रतिष्ठुध्यमथो हिमं च ।
शूनाक्षिकृटं वदनं च यस्य
शिरोभितापः स कफप्रकोपात् ॥७॥
जिस रोगी का शिर और गला कफ से भरा हुआ हो, भारी एवं स्थिर तथा ठण्डा हो, अक्षिकृट और मुख पर सूजन हो, यह शिररोग कफ के प्रकोप से होता है ॥७॥
शिरोभितापे त्रितयप्रवृत्ते
सर्वाणि लिङ्गानि समुद्भवन्ति ।
सन्निपातशिररोग में तीनों दोषों के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ।
रक्तारम्भः पित्तसमानलिङ्गः
सर्पासहस्रं शिरसो भवेच्च ॥८॥
रक्तजन्यशिररोग में पित्तज शिररोग के समान लक्षण रहते हैं, सर्पा को सहन नहीं करता (इसमें आवाज भी रोगी सहन नहीं करता-बोलना अच्छा नहीं लगता) ॥८॥
वसाबलासक्षतसंभवानां
शिरोगतानामिह संक्षयेण ।
क्षयप्रवृत्तः शिरसोऽभितापः
कष्टो भवेदुप्ररुजोऽति मात्रम् ॥९॥
संस्वेदनच्छर्द्वन धूमनस्यै-
रस्तुन्विमोक्षेऽश्र विवृद्धिमेति ।
आघात के कारण शिर में से वसा, कफ (देह स्नेह, मस्तिष्क-मेद-मज्जा आदि) के क्षीण हो जाने से, क्षयजन्य शिररोग होता है, इसमें अतिशय तीव्रवेदना रहती है । यह वेदना स्वेदन, वमन, धूम, नस्य, रक्तमोक्षण आदि से बढ़ जाती है ॥९॥
निस्तुद्यते यस्य शिरसोऽतिमात्रं
संभद्वयमाणं स्फुरतीव चान्तः ॥१०॥
प्राणाच्छ गच्छेत्सलिलं सरक्तं
शिरोभितापः क्रमिभिः स घोरः ।
जिस रोगी के शिर में अतिशय तीव्र वेदना होती हो ( चुभती हुई वेदना ) शिर के अन्दर खाने के समान या स्फुरण ( रँगने के-चलने के ) समान अनुभव होता हो, नाक से ईषत् रक्त मिला पानी बहता हो, यह शिररोग क्रमिजन्य होता है चरक में—
तिलक्षीरगुडाजीर्णपूति संकीर्ण भोजनात् । कलेदोऽसूक्तकफमंजानां दोषलस्योपजायते । ततः शिरसि संकलेदात् कुमयः पापकर्मणः । जनयन्ति शिरसि रोगं जाता बीभत्सलक्षणः । व्यधच्छेदवृकाण्ड शोफदीर्गस्थुः खितम् ॥ कूमिरोगातुरं विद्यात् कूमिणां दर्शनेन च ॥ वि० मन्तव्य—देखिये अ० २४ के श्लो० १३ का वक्तव्य
॥१०॥
सूर्यादयं वा प्रति मन्दमन्दा-
मक्षिभ्रवं रुक् ससुपैति गाढम् ॥११॥
त्रिवर्धते चाशुमता सहैव
सूर्यापवृत्तौ विनिवर्तते च ।
श्रीतेन शान्ति लभते कदाचि-
दुष्णेन जनतुः सुखमाप्नुयाच्छ ॥१२॥
तं भास्करावर्तमुदाहरन्ति
सर्वात्मकं कष्टतमं विकारम् ।
सूर्योदय के साथ-साथ धीरे-धीरे—आंख, भ्रुवों से मन्द-मन्द वेदना आरम्भ होकर सूर्य के बढ़ने के साथ साथ तीव्र होती जाती हो, तथा सूर्य के घटने पर शान्त होती हो, तथा कभी कभी क्षीतल उपचार से और कभी उष्ण उष्ण उपचार से रोगी को सुख मिलता हो, इस वेदना को सूर्यावर्त्त कहते हैं । यह रोग सन्निपातजन्य और अतिकष्टदायक है । ( गरम से शान्ति सूर्यावर्त्तविपर्यय में होती है ) ॥
वक्तव्य—रात में क्यों दब नहीं होता—“स्वभाव क्षीता तस्योऽभिभूला रात्रिस्तयोद्भूतकफेन मार्गे रुद्धे मरुत्कोपमियात् प्रभाते रुजं करोत्यत्र शिरोभितापे । मध्याह्नसूर्यातिपतापयोगात् कफे विछीने मरुति प्रपन्ने । स्वमार्गमायाति तदा दिनान्ते प्रशान्तिमावर्त्तं हृद्वाकं पूर्व ॥” चरक में—सि० अ० ६
संधारणात् अजीर्णानिः मस्तिष्कं रक्तमाकृतौ ।
दुष्टो दूषयतस्तच्च दुष्टं ताभ्यां विमूर्छितम् ॥
सूर्योदयाशुसंतापात् दुष्टं विष्यन्दते शनैः ।
ततो दिने शिरः शूलं दिनवृद्धया च वर्द्धते ।
दिनक्षये ततः स्याने मस्तिष्के संप्रामभ्यति ।
सूर्यावर्त्तः स एव स्यात् ॥११,१२॥
दोषास्तु दुष्टाच्छय एव मन्यां
संपोड्य घाटासु रुजां सुतोत्राम् ॥१३॥
कुर्वन्ति साक्षिभ्रवि शखदेशे
स्थिति करोत्याशु विशेषतस्तु ।
गण्डस्य पाश्चै तु करोति कम्पं
हनुमह लोचनजांश्च रोगान् ॥१४॥
अनन्तवार्ता तमुदाहरन्ति
दोषत्रयोत्थं शिरसो विकारम् ।
अ० २६ ]
उत्तरतन्त्रम्
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वातादि तीनों दोष कुपित होकर मन्त्रा को दबाकर गले के पिछले भाग में (गुठी पर) तीव्र वेदना को करते हैं। विशेषकर ये दोष आँख, भू और शंख देश में स्थित रहते हैं, इसमें गण्ड के पार्श्व में कम्पन होता है, हनुग्रह एवं आंख के रोग होते हैं। इस रोग को अनन्तवात कहते हैं, यह रोग त्रिदोषजन्य है।
चरक में—“उपवासतिशोकातिरुक्षशीताल्पमोजनैः । दुष्टा दोषाल्लयो मन्त्रां पश्चाद् घाटासु वेदनाम् ॥ तीव्रां कुर्वन्ति नासाधि भ्रशंखेष्ववतिष्ठते । स्मन्दनं गण्डपार्श्वस्य नेत्ररोगं हनुग्रहम् ॥ सोऽनन्तवातः ॥१३,१४॥
यस्योत्तमाङ्गार्धमतीव जन्योः संभेदतोदंभ्रमशूलजुष्टम् ॥१५॥ पश्चाद्दग्नाहादथवाऽप्यकरमा- तस्याधर्भेदं त्रितयाद्वयवश्येत । जिस रोगी के आधे सिर में अतिशय भेद पीड़ा (फटने की सी) तोद (चुमने का या दर्द), भ्रम एवं शूल होता है, और बिना कारण के ही पन्द्रह या दस दिन में आक्रमण होता रहता है, इस रोग को अर्धभेद (आधासीसी) कहते हैं, यह रोग तीनों दोषों से होता है। चरकमें—
रुक्षाल्यधशनात्पूर्वं वातावश्यायमैश्वनैः वेगसन्धारणायस न्यायामैः कुपितोऽनिलः ॥ केवलःसकफोवाऽधं यहीत्वा शिरघोऽनिलः । मन्त्राभ्र शंखकर्णाधि ललाटादं च वेदनाम् । शाखाशनिनिभां कुर्यात् तीव्रां सोऽर्धावभेदकः । नयनं वाऽयश्रोत्रं वा अति वृद्धे विनाशयेत् ॥ वि० मन्तव्यं—कभी २ सूर्यावर्त्त तथा अधोवभेदक दोनों का रोगसंकर भी होता है ॥१५॥
शङ्खाश्रितो वायुरुद्वीणवेगः कृतानुयात्रः कफपित्तरक्तैः ॥१६॥ रुजः सुतीव्राः प्रतनोति मूर्ध्नं विशेषतश्चापि हि शङ्खव्योस्तु । सुकष्टमेनं खलु गङ्गकाख्यं महर्षयो वेदविदः पुराणाः ॥१७॥ न्याधि वदन्त्युदगतमृत्युकल्पं भिषक्सहस्रैरपि दुर्निवारम् ॥१८॥
उद्वीणं वेगवान् शंख में आश्रित वायु-कफ, पित्त, रक्त का अनुसरण करके, शिर में विशेषकर शंख प्रदेश में अतितीव्र वेदना को उत्पन्न करता है। वेदविद पुरातन महर्षि इस अतिशय कष्टदायक रोग को शंखक कहते हैं। यह रोग मृत्यु के समान है, हजारों वैद्य भी इसको (जल्दी) अच्छा नहीं कर सकते। इसी से चरक में कहा है कि—
रक्तपित्तानिलादुष्टाः शंखदेशो विमूर्च्छिताः । तीव्रकदाहराणां हि शोफं कुर्वन्ति दारुणम् ।
सशिरो विषवद्देगी निरुध्याशुगलं तथा । त्रिरात्राज्जीवितं हन्ति शंखको नाम नामतः ॥ जीवेत् अहं चेद् भेषज्यं प्रत्याख्यायास्य कारयेत् । शिरोविरेकसैकादि सर्ववीसर्पनुच्छ यद् ॥ चरक—सि० अ० ६ ॥१६-१८॥ इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शाळाकथतन्त्रे शिरो- रोगविज्ञानौ नाम पञ्चविशोऽध्यायः ॥१५॥
षड्विंशतितमोऽध्यायः
अथातः शिरोरोगतिप्रषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥ अब इसके आगे शिरोरोगप्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे— जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥ वातव्याधिविधिः कार्यः शिरोरोगेऽनिलात्मके । पयोनुपानं सेवेत् घृतं तैलमथापि वा ॥३॥ वातजन्यशिरोरोग में वातव्याधि की चिकित्सा सम्पूर्णरूप में (अन्तः और बाह्य दोनों रूपों में) करनी चाहिये। दूध के अनुपान से घृत का (पित्त का अनुबन्ध वायु के साथ होनेपर) एवं तैल का (कफ का अनुबन्ध होने पर) सेवन करे ॥३॥ मुद्गनान् कुलस्थानमाषांश्च खादेच्छ च निशि केवलान् । कटुष्णांश्च ससर्पिष्कानुष्णं चानु पयः पिबेत् ॥४॥ पिबेद्वा पयसा तैलं तत्करकं वाऽपि मानवः । रात्रि में मृग, उड़द या कुलथी को अकेला (तीनों में से किसी एक को) खाये। इनको कटु और उष्ण द्रव्यों से संस्कृत करके, प्रचुर घी के साथ खाकर पीछे दूध पीये। अथवा दूध के साथ तिल तैल, या तिल का करक पीये ॥४॥
वातघ्नसिद्धेः क्षीरेश्च मुखोष्णेः सेकमाचरेत् ॥५॥ तसिद्धेः पायसैवाऽपि मुखोष्णैलंपयेच्छिरः । स्विन्नैर्वा मत्स्यपिशितैः कुग्रैर्वा ससेन्धवैः ॥६॥ चन्दनोत्पलकुष्ठैर्वा सुरलक्षणैर्माधायुतैः । स्निग्धस्य तैलं नस्यं स्यात् कुळीररससाधितम् ॥७॥ वरुणादीं गणै लुण्णै क्षीरमर्घादिकं पचेत् । क्षीरशेषं च तन्मध्यं शीतं सारमुपाहरेत् ॥८॥ ततो मधुरकैः सिद्धं नस्यं तत् पूजितं हविः । तस्मिन् विपक्वै क्षीरे तु पेर्यं सर्पिः सशर्करम् ॥९॥ धूमं चास्य यथाकालं स्नेहिकं योजयेद्विभषक् । भद्राव्यादि वातघ्न द्रव्यों से सिद्ध दूध से सुहाता हुआ गरम-गरम घासा सेक शिर पर करे। वातघ्न सिद्ध दूध में बनाई खीर से (अथवा मावे से) सुहाता गरम-गरम लैप सिर पर करे। मछली के मांस को स्विन्न करके या तिल तण्डुल माप से बनी यवाम् को सेन्व मिलाकर गरम-गरम लैप करे। चंदन,
६१८
सुश्रुतसंहिता
[ अ० २१ ]
कमल, कूठ, पिप्पली इनको बारीक पीसकर सिर पर लेप करे । स्निग्ध हुए पुरुष को कंकड़े के मांसरस में सिद्ध किया तैल नस्य में देवे । वरुणादिगण को कूटकर इसमें आधा पानी मिलाया दूध क्षीरपाकविधि से पकावे । इस दूध में से मयकर घी निकाल ले । इस घी को काकोल्यादिगण से सिद्ध करके नस्य में भरते । वरुणादिगण में सिद्ध किये दूध में घी और शर्करा मिलाकर पीये । अवस्था के अनुसार मधुचूल्छ आदि स्नेह द्रव्यों से बनाये स्नेहिक धूम वैद्य करते ॥५-६॥
पानाभ्यञ्जननस्येषु वस्तिकर्म्मणि सेचने ॥१०॥
बिदध्यात्त्रैवृत्तं घीमान् बलात्तेलमथापि वा ।
पान, अभ्यङ्ग, नस्य या वस्तिकर्म में त्रैवृत्त स्नेह (अपतानक रोग में कहा) या बला (मृदगर्भ में कहा) बुद्धिमान् वैद्य करते ॥१०॥
भोजयेच्छ्व रसैः स्निग्धैः पयोभिर्वा सुसंस्कृतैः ॥११॥
स्निग्ध मांस रसों के साथ या वातहर द्रव्य साधित दूध भोजन देवे ॥११॥
पित्तरक्तसमुत्थानौ शिरोरोगौ निवारयेत् ।
शिरोलेपैः ससर्पिणैः परिषेकैश्च शीतलैः ॥१२॥
क्षीरेच्छुसधान्याम्बुस्तुष्कौदसिताजलैः ।
पित्तजन्य एवं रक्तजन्य शिरोरोग में घृत मिश्रित लेप सिर पर करे, शीतलद्रव्यों से परिषेक करे । यथा-दूध, ईल का रस, कांडी, मस्तु, सिता-जल (शर्बत) से परिषेक करे ॥१२॥
नल्वक्कुजुलकह्वारचन्दनोत्पलपद्मकैः ॥१३॥
वंशशोचलयघद्याह्वमुस्ताम्भोरुहसंयुतैः ।
शिरःप्रलेपैः सधुतैर्वैसर्पैश्च तथाविधैः ॥१४॥
मधुरैश्च मुखालेपैर्नस्यकर्मभिरैव च ।
लेप के लिये नइसर, वेतस, लालकमल, चन्दन, नीलोफर, पद्ममाल, वांस, शैवाल, मुलेहटी, मुस्ता, कमल, इनको घी में मिलाकर लेप करे, अथवा रक्त, पित्तजन्य विसर्प में भरते जानेवाले (उशीर लामरजक, चन्दन आदि) द्रव्यों से लेप करे ! काकोल्यादि मधुर द्रव्यों से मुख पर लेप करे तथा मधुर द्रव्यों से संस्कृत नस्य देवे, इनसे पित्त-रक्तजन्य शिरोरोग को शान्त करे ॥१३,१४॥
आस्थापनैर्विरेकैश्च पथ्यैश्च स्नेहवस्तिभिः ॥१५॥
क्षीरसर्पिहितं नस्यं वसा वा जाङ्गला शुभा ।
आस्थापन, विरेचन (मधुर द्रव्यों से सिद्ध) हितकारी वस्तु (आहार-विहार आदि), तथा स्नेहवस्तियों से पित्तरक्तजन्य शिरोरोग शान्त करे । दूध को मयकर निकाले घी का नस्य देवे । अथवा जांगल पशु-पक्षियों की वसा नस्य में उत्तम है ॥
उत्पलादिविपक्वेन क्षीरेणास्थापनं हितम् ॥१६॥
भोजनं जाङ्गलरसैः सर्पिषा चानुवासनम् ।
मधुरैः क्षीरसर्पिस्तु स्नेहने च सशर्करम् ॥१७॥
उत्पलादिगण से सिद्ध दूध से आस्थापन देना उत्तम है, जांगल मांसरसों से भोजन देवे, काकोल्यादिमधुरगण से संस्कृत घी से अनुवासन देवे । दूध को मयकर निकाला घी, शर्करा को मिलाकर स्नेहन नस्य में या स्नेहन वस्ति में देवे ॥१६,१७॥
पित्तरक्तजन्यमुद्भिदृष्टं यच्छ्वान्यदपि तद्वितम् ।
पान-आलेपन आदि में रक्त पित्तजन्य जो अन्य विधि कही है, वह भी यहाँ बरते ।
कफोत्थितं शिरोरोगं जयेत् कफनिवारणैः ॥१८॥
शिरोविरेकैर्बमनेस्तौदण्णद्वेषधारणैः ।
अच्छं च पाययेत्सर्पिः स्वेदयेच्छ्चात्यभीक्षणः ॥१९॥
शिरो मधुकसारैण स्निग्धं चापि विरेचयेत् ।
इक्षुदस्य त्वचा वाडपि मेघशुद्धस्य वा भिषक् ॥२०॥
कफजन्य शिरोरोग को कफनाशक शिरोविरेचनादि द्रव्यों से शान्त करे इसके शिरोविरेचन, तीक्ष्णवमन, तीक्ष्णगण्डुष मुख में रखे । शुद्ध घी पिलाये, बार-बार स्वेद देवे । स्निग्ध हुए रोगी के सिर को मधुक सार (महुए की लकड़ी के चूर्ण से), हिंगोट की छाल के या मेघशुद्धी के चूर्ण से वैद्य विरेचित करे ॥
आभ्यामेव कृतां वर्ति धूमपाने प्रयोजयेत् ।
घ्रेयं कटफलचूर्णं च कवलाश्च कफापहः ॥२१॥
सरलाकुष्ठशाङ्गुष्टादेवकाष्ठैः सरोहिषैः ।
क्षारपिष्टैः सुलवणैः मुखोष्णौलपयेच्छिरः ॥२२॥
हिंगोट की छाल और मेघशुद्धी से बनाई वर्त्ति धूमपान में देवे । कटफल का चूर्ण सूखे, कफहर द्रव्यों से बनाये कवलाधारण करे । चौड़, कूठ, शाङ्गुष्टा (छुई मुड़े), देवदारु, रोहिष-घास, इनको क्षारोदक से पीसकर, थोड़ा नमक मिला, सुहाता गरम-गरम शिर पर लेप करे ॥२१,२२॥
यवषट्टिकयोश्चान्नं न्योषक्षारसमायुतम् ।
पटोलमुद्गकौलत्थैर्मात्रावद्भोजयेद्दसैः ॥२३॥
सौठ, मरिच, पीपल, यवक्षार से मिश्रित जो और साठी का भोजन पटोल, मूँग, कुलत्थो इनके यूष के साथ, मात्रा में खिलाये ॥२३॥
शिरोरोगे त्रिदोषोत्थे त्रिदोषन्तो विधिहितः ।
त्रिदोषजन्य शिरोरोग में त्रिदोषनाशक विधि बरते ।
सर्पिःपानं विशेषैर्गु पुराणं वा दिशन्ति हि ॥२४॥
इसमें विशेषकर पुरातन घृत (दस साल पुराने) का पान उत्तम कहा जाता है ॥२४॥
क्षयजे क्षयमासाद्य कर्तव्यो बृंहणो विधिः ।
पाने नस्ये च सर्पिः स्याद्वातवन्मधुरैः श्रुतम् ॥२५॥
क्षयकासापहं चात्र सर्पिः पथ्यतमं विदुः ।
क्षयजन्य शिरोरोग में रक्त आदि घात के क्षय का निश्रय करके बृंहण चिकित्सा करनी चाहिये । वातल
अ० २६]
उत्तरतन्त्रम्
६४६
(भद्राव्यादि), तथा काकोल्यादि मधुर द्रव्यों से सिद्ध घृत पान और नस्य में उत्तम है। क्षयकास नाशक घृत (कुलीर शुक्ति चक्रेणलावान्-आदि से कहा) इसमें अतिशय पथ्य है।
वि० मन्तव्य—क्षयजनित शिरोरोग में—बृहणविधि अर्थात् वादाम का हलुआ, खीर, मालपूआ, अखरोट, वादाम आदि सूखे फल एवं खसखस, मगद आदि पुष्टिकारक विशेषतः मस्तिष्क को पुष्ट करनेवाले आहारों का प्रयोग करे ॥२५॥
कृमिभिर्भक्ष्यमाणस्य वक्ष्यते शिरसः क्रिया ॥२६॥ नस्यं हि शोणितं दद्यात्तेन मूर्च्छन्ति जनतवः।
मत्ताः शोणितगन्धेन सभायान्ति यतस्ततः ॥२७॥
जिस रोगी के शिर को कृमि खाते हैं—उसकी चिकित्सा के लिये रक्त का नस्य देवे इसमें कृमि मद्युक्त हो जाते हैं, रक्त के गन्ध से मत्त होकर कृमि हृधर-उधर से नाक से बाहर आ जाते हैं।
वक्तव्य—“रक्त को देखकर या उसकी गन्ध से कई पुरुषों को मूर्च्छा आ जाती है, इसी प्रकार कृमि भी रक्त की तीव्र गन्ध से मूर्च्छित हो जाते हैं। इसी से कहा है—
पृथिव्यमस्तमोरूपं रक्तगन्धश्च तन्मयः।
तस्माद् रक्तस्य गन्धेन मूर्च्छन्ति सुवि मानवाः—सु० ॥
तेषां निर्हरणं कार्यं ततो मूर्ध्वविरेचनैः।
हरवशिप्रकृबीजैर्वा कांस्यनीलीसमायुतैः ॥२८॥
कृमिघ्नैरवपीडेक्ष्य मूत्रपिष्टैरुपाचरेत्।
पूतिमत्स्ययुतान् धूमान् कृमिघ्नांश्च प्रयोजयेत् ॥२९॥
इसके पीछे कृमियों को शिरोविरेचन से बाहर करना चाहिये। इसके लिये छोटा सुहाजना (कटुषहजन) के बीज, कांस्य नील मिलाकर नस्य देवे (या विडंग, मरिच, अपामार्ग आदि से देवे) कृमिनाशक द्रव्यों को मूत्र में पीसकर अवपीडन नस्य देवे। सड़ी मछली (सूखी मछली—जो नमक में रखकर बेची जाती है। एवं कृमिघ्न वस्तुओं से मिलाकर धूम देवे।
वि० मन्तव्य—उक्त उपायों से कृमि निकल जाते हैं और निम्नलिखित कृमिनाशक विविध अन्नो एवं पानों से उनकी उत्पत्ति रुक जाती है ॥२८, २९॥
भोजनानि कृमिघ्नानि पानानि विविधानि च।
कृमि प्रतिषेध में बताये धान्याम्ल आदि कृमिघ्न-नाना-प्रकार के भोजन, पान देवे।
सूर्यावर्तं विधातव्यं नस्यकर्मोदिभेषजम् ॥३०॥
भोजनं जाङ्गलप्रायं क्षीरान्नविकृतिघृतम्।
सूर्यावर्तं में नस्य आदि चिकित्सा करे। भोजन में मुख्यतः जांगलमसि, दूध से बने खाद्य पदार्थ, घृत देवे।
वि० मन्तव्य—निरामिषभोजियों के लिये—खीर, रबड़ी
आदि दुग्ध के पदार्थ देवे परन्तु वे अत्यन्त शीतल हों, यथा—खीर आदि को रात्रि में बनाकर ओस में घर दिया जाय अथवा जिलेबी को दूध अथवा गुलाब जल में भिगोकर ओस में घर दिया जाय और प्रातः खाया जाय ॥३०॥
तथाऽधमेदके व्याधौ प्राप्तमन्यरूचं यद्भवत् ॥३१॥
शिरीषमूलकफलैरवपीडोऽनयोर्हितः।
वंशमूलककपूरैरवपीडं प्रयोजयेत् ॥३२॥
अवपीडो हितश्चात्र वचामागधिकायुतः।
मधुकेनावपीडो वा मधुना सह संयुतः ॥३३॥
मनःशिलावपीडो वा मधुना चन्दनेन वा।
अर्धावमेदक में भी यही उपचार करे, तथा स्नेह, सिरावेध, अवपीडक आदि जो योग्य उपचार हो वह भी करे। सूर्यावर्त्त और अर्धावमेदक में—शिरीषमूल एवं फल से अवपीडन नस्य देवे। बांस की जड़ और कपूर इनसे अवपीडन नस्य दे। पिप्पली और बच से अवपीडन नस्य देवे। मुलेहटी का रस मधु मिलाकर अवपीडन रूप से देवे। मुलेहटी, मेनसिल और मधु से या मुलेहटी, चन्दन और मधु से अवपीडन नस्य दे ॥
तेषामन्ते हितं नस्यं सर्पिर्मधुरसान्वितम् ॥३४॥
अवपीडन नस्यों के पीछे काकोल्यादिगण के रस से सिद्ध घृत का नस्य देवे।
वि० मन्तव्य—अर्द्धावमेदक में भी शीतल आहार ही लाभप्रद होता है देखिये श्लो० ३० का वि० व० ॥३४॥
सारिवोत्पलकुष्ठानि मधुकं चाम्ल्येषितम्।
सपित्तैल्युतो लेपो द्वयोरपि सुखावहः ॥३५॥
एष एव प्रयोक्तव्यः शिरोरोगे कफात्मके।
सारिवा, कमल, कूठ, मुलेहटी इनको कांजी से पीसकर घी और तैल मिलाकर सूर्यावर्त्त, अर्धावमेदक में शिर पर लेप करे। कफजन्य शिरोरोग में भी यही उपचार करे ॥३५॥
अनन्तवाते कर्तव्यः सूर्यावर्तहरो विधिः ॥३६॥
सिरान्यधश्च कर्तव्योऽनन्तवातप्रशान्तये।
आहारश्च विद्यातव्यो वातपित्तविनाशनः ॥३७॥
मधुमस्तकसंयावघृतपूरैश्च भोजनम्।
अनन्तवात में सूर्यावर्त्त नाशक विधि करते। अनन्तवात की शान्ति के लिये सिरावेधविधि करनी चाहिये। वात-पित्त नाशक आहार देवे। इसके लिये मधु मस्तक (पूरनपोली या शहद की पोली जिसमें शहद ही मरा होता है), संयाव (लप्सी) घृतपूर (बेवर) देवे।
वि० मन्तव्य—अनन्तवात में भी वात पित्त विनाशक विधि करे यथा सूर्यावर्त्त एवं अर्द्धावमेदक में कहीं है ॥३६, ३७॥
क्षीरसर्पिः प्रशंसन्ति नस्ये पाने च शङ्के ॥३८॥
६६०
सुश्रुतसंहिता
[ अ० २७ ]
जाङ्गलानां रसैः स्निग्धैराहारश्चात्र शाश्यते । शंखक रोग में नस्य और पान में दूध से निकाला घी बरते । स्निग्ध जांगल मांस रसों को भोजन दे ॥३६॥
शतावरी तिलान् कुष्णान् मधुकं नीलमुत्पलम् ॥३६ दूर्वा पुनर्नवां चैव लेपे साध्ववचारयेत ।
महासुगन्धामथवा पाल्निदीं चास्लपेषिताम् ॥४०॥
शतावरी, काले तिल, मुलेहठी, नीलोफर, दूर्वा, पुनर्नवा इनको दूध में पीसकर शिर पर लेप करें । महासुगन्धा ( रास्ता या वर्षगन्धा ) और निशोध को कांजी में पीसकर लेप करें ॥
शीतांश्चात्र परीपेकान् प्रदेहोऽंश्च प्रयोजयेत् ।
शीतलपरिपेक, शीतलप्रदेह ( शीतवीर्य विदारि गन्धादि काकोल्यादि उत्पलादि ते ) इसमें बरते ।
अवपीडश्च देयोऽत्र सूर्यावर्तनैतिवारणः ॥४१॥
सूर्यावर्तनाशक ( शिरीषमूलकफलेः आदि ) अवपीडन नस्य देवे ॥४१॥
कृमिश्चयकृतौ हित्वा शिरोरोगेषु बुद्धिमान् ।
मधुतैलसमायुक्तैः शिरांस्यातिविरचेयेत् ॥४२॥
पश्चात्सर्पपतैलेन ततो नस्यं प्रयोजयेत् ।
कृमिजन्य और क्षयजन्य शिरोरोग को छोड़कर शेष रोगों में वैद्य शिरीरविरचन द्रव्यों में मधु और तैल मिलाकर नस्य देवे । पीछे सर्पों के तेल से नस्य देवे ॥४२॥
न चेच्छान्तिं व्रजन्त्येवं स्निग्धस्विन्नास्ततो भिषक् ॥४३॥
पश्चादुपाचरेत्सम्यक् सिराणांमथ मोक्षणे ।
यदि इन सब उपचारों से रोग शान्त न हो तो रोगी को स्नेहन और स्वेदन देकर सिरामोक्षण करके भली प्रकार चिकित्सा करे ।
वि० मन्तव्य—क्षयजनित शिरोरोग एवं कृमिज-शिरोरोग के अतिरिक्त शिरोरोगों में सिरावेष सफल उपचार है । शिरो- रोग एवं अधिमन्य आदि नेत्र रोगों में छलाट गत अथवा अपाङ्गगत सिरा का वेष करे । देखिये सु० शा अ० ८ सू० १७॥
षट्समतिनेत्ररोगा दशाष्टादश कर्णजाः ॥४४॥
एकत्रिशद्व प्राणगताः शिरस्येकादशैव तु ।
इति विस्तरतो ष ( वि ) ष्टाः सलक्षणचिकित्सिताः ॥४५॥
संहितायामभिहिताः समषष्ठिमुखामयाः ।
एतावन्तो यथास्थूलमुत्तमाङ्गगता गदाः ।
अस्मिन्ब्रह्माक्षे निगदिताः सङ्ख्यारूपचिकित्सितैः ॥४६॥
छिह्तर नेत्ररोग, अष्टाईस कर्णरोग, इकतीस नासारोग, ग्यारह शिरोरोग, ये विस्तर से लक्षण एवं चिकित्सा से कह दिये हैं । संहिता में सरसट ( ६७ ) मुखरोग कह दिये हैं । मुख्य
रूप से उत्तमांग के इतने रोग इस शास्त्र में संख्या, लक्षण एवं चिकित्सा से कहे गये हैं ॥४४-४६॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरन्वात्तर्गते शालाक्यतन्त्रे शिरो- रोगप्रतिषेधो नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥२६॥
सप्तविंशतितमोऽध्यायः
अथातो नवग्रहाकृतिविज्ञानौषधयार्थं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥३॥
अव इसके आगे नवग्रहाकृतिविज्ञानौषधयार्थ व्या- ख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।
वक्तव्य—बालकों के ग्रह नौ हैं, युवा व्यक्तियों के आठ हैं, आकृति से अभिप्राय लक्षणों से हैं ।
वि० मन्तव्य—अध्याय २७ से अ० ३७ तक बालग्रहों का वर्णन है । इन अध्यायों को भूतविद्या में ही गिनना चाहिये । कौमार भृत्य के लक्षणानुसार कौमार भृत्य में नहीं गिनना चाहिये । ये बालग्रह बालक-बालिकाओं पर ही आक्रमण करते हैं अतः बालग्रह कहे जाते हैं ॥१, २॥
बालग्रहाणां विज्ञानं साधनं चाप्यनन्तरम् ।
उत्पत्तिं कारणं चैव सुश्रुतैकमनाः श्रुणु ॥३॥
हे सुश्रुत ! बालकों के ग्रहों के लक्षण, उनकी चिकित्सा, उत्पत्ति और कारण को एकाग्र मन से सुनो ॥३॥
स्कन्दग्रहस्तु प्रथमः स्कन्दापस्मार एव च ।
शकुनी रेवती चैव पूतना चान्धपूतना ॥४॥
पूतना शीतनामा च तथैव मुखमण्डिका ।
नवमो नैगमेषश्च यः पितृग्रहसंज्ञितः ॥५॥
प्रथम स्कन्दग्रह, फिर स्कन्दापस्मार, शकुनी, रेवती पूतना, अन्धपूतना, शीतपूतना, मुखमण्डिका, और नौवां नैगमेष-जैसे पितृग्रह भी कहते हैं ॥४, ५॥
धात्रीमात्रोः प्राकप्रदिष्टापचारा-
न्च्छोचभ्रष्टान्मङ्गलाचारहीनान् ।
व्रस्तान् हृष्टास्तजितान् ताडितान् वा
पूजाहेतोर्हिश्युरेते कुमारान् ॥६॥
धात्री ( दाई ) या माता के घरों स्थान में कहे हुए मिथ्या आचरण के कारण ( मांस सुरादि का खाना, लाल वस्त्र आदि का धारण ), मूत्र-मल आदि का शोधन न करने से, मंगल ( स्वस्तिक, दाम, दूर्वा आदि पवित्र वस्तुओं का ) एवं आचार ( पापविरोधि ) से हीन, डरे हुए, प्रसन्न हुए, धमकाये हुए, मारे
१ चरक में शिरः कम्प रोग अधिक कहा है यथा— वातो क्ष्मादिसिः कुद्धः शिरःकम्पमुदोरयेत् । तत्रामुता वला रास्ता महावैताश्चगन्धकः ॥ स्नेहस्वेदादिवातघ्नं शस्त्रं नस्यं च तर्पणम् । नस्तः कर्म च कुर्वीत शिरोरोगेषु सुभविषितु । द्वारं हि शिरसो नासा तेन तद्व्याप्य हन्ति तान् ॥
अ० २७ ]
उत्तरतन्त्रम्
६६९
हुए बच्चों में पूजा प्राप्ति के उद्देश्य से या मारने की इच्छा से ये ग्रह आविष्ट होते हैं।
वक्तव्य—चरक में इसी से कहा है—“नक्षस्य विज्ञासनं वायु, तस्मात्तस्मिन् सदस्यभुंजानेवाऽन्यत्र वाऽविधेयतां गच्छति राक्षसपिशाचपूतनाद्यानां नामानि चाहृत्यता कुमारस्य विज्ञासनाथं नाम ग्रहणं न कार्यं स्यात् ॥” हिंसा या पूजा के लिये आक्रमण करते हैं—“त्रिविधं तून्मादकराणां भूतानामुन्मादने प्रयोजनम्। तद्यथा—हिंसारतिरस्यचर्चं चेति तेषां तत्प्रयोजनमुन्मत्ताचारविशेषलक्षणैः विद्यात्। तत्र हिंसार्थमुन्मद्यमानोऽर्गिन प्रविशति। अप्तु निमञ्जति, स्थानात् श्वत्रे वा निपतति, शस्त्र-काष्ठलोघमुष्टिभिर्हन्ति आत्मानमन्यच्च, प्राणवधार्थमारभते।”
चरक नि० अ० ७।१८।६॥
ऐश्वर्यस्थितास्ते न शक्या विशन्तो
देहं द्रष्टुं मानुषैर्विश्वरूपाः।
आत्मं वाक्यं तत्तस्मौह्याभिधाम्ये
लिङ्गान्येषां यानि देहे भवन्ति ॥७॥
वे ग्रह संसार के रूपवाले एवं अणिमा आदि ऐश्वर्य से युक्त होने के कारण शरीर में प्रविष्ट होते हुए मनुष्यों से नहीं देखे जा सकते। इसलिये इन ग्रहों के जो लक्षण होते हैं, उनको प्राप्त पुरुषों के कथनों के अनुसार कहेंगे।
वि० मन्तव्य—विश्वरूपाः—देवों के एक गण ( समूह-जाति ) का नाम “विश्व” है विशन्ति इति विश्वे—अर्थात् जो प्रवेश करते हैं विश्वप्रवेशने धातुः तुदादिगणीयः। इस धातु से आगे उणादि गण के १।२५१ सूत्रानुसार वनन् प्रत्यय लगाने पर विश्व शब्द निष्पन्न होता है। अस्तु। वेदों में अनेक स्थलों पर ॐ स्वस्ति नः इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्वेदेवाः स्वस्ति नः………तथा ॐ अग्निर्देवता वातो, देवता………विश्वेदेवा देवता………आदि वैदिक ऋचाओं में—विश्वेदेवा नामक देवताओं का नाम आया है। विश्वरूप अर्थात् देवरूप दिव्य-शक्ति सम्पन्न देवता हैं। अतएव ऐश्वर्य—ईश्वरता से युक्त अणिमा आदि सिद्धियों से युक्त हैं। यद्यपि वे प्रवेश-आवेश करते हुए देखे नहीं जा सकते तथापि आसजनों के वाक्यों की समीक्षा करके उनके लक्षण कहे गये हैं केवल अन्धविश्वास करके नहीं। समीक्षा-सम्यक्-समीचीन प्रकार से ईक्षा-दर्शन-देखना। आस-यथार्थ वादो-ठोक २-सत्यर कहनेवाले, भगवान् पुनर्वसु के शब्दों में—तप एवं ज्ञान की शक्ति द्वारा रजस् एवं तमसु (राग एवं द्वेष) से पूर्ण रूप से मुक्त, व्यवधान रहित निर्मल एवं त्रिकाल ज्ञान से युक्त आस होते हैं और वे शिष्ट समस्त संसार को कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक देनेवाले तथा विबुद्ध परम ज्ञान-जागरूक होते हैं उनका वाक्य संशय हीन एवं सत्य होता है। ऐसे जन असत्य क्यों बोलेंगे जब कि वे रजस् एवं तमसु से सर्वथा मुक्त हैं। ( च० सू० अ० ११ )
ईश्वर तथा अन्यान्य वे भाव जो चक्षुःआदि इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष नहीं किये जा सकते उन सबको आसवाक्यों के आधार पर ही माना जाता है। तात्पर्य यह है कि वे चेतना धातु-आत्मा के समान अत्यन्त सूक्ष्म हैं अतएव देखे नहीं जा सकते। आयुर्वेद के विद्वानों को चाहिये कि वे उन लेखकों को समझावें जो देव, गन्धर्व आदि को कृमि लिखने का साहस करते हैं ॥
अवूषयन्तः पुरुषस्य देहं
देवादयःस्वैश्चैव गुणप्रभावैः।
विशन्त्यहश्यास्तरसां यथैव-
च्छायातपो दर्पणसूर्यकान्तो ॥
चरक नि० अ० ६।१८ ॥७॥
शूनान्नः क्षतजसगन्धिकः स्तनद्विद्
वक्रास्यो हतचलितैकपदमनेत्रः।
उद्विग्नः मुलुलितचतुरूपरोदी
स्कन्दातो भवति च गाढमुष्टिवर्चाः ॥८॥
स्कन्द ग्रह से पीड़ित शिशु—की आँखें सूजी, रक्त के समान शरीर से सूड़ी गन्ध आती है, बच्चा स्तन नहीं पीता, मुख टेढ़ा हो जाता है, एक आँख और उसके पलक, किया रहित हिलते रहते हैं, बच्चा उद्विग्न ( बेचैन ), आँखें थोड़ी खुली, थोड़ा रोनेवाला मुड़ी जोर से बाँधे, सख्त मल आता है।
वक्तव्य—आँख से दीवता कम है, पलक हिलती है, यह एक आँख में होता है ॥८॥
निःसंज्ञो भवति पुनर्भवेत्ससंज्ञः
संरुधः करचरणैश्च नृत्यतीव ।
विग्मूत्रे सृजति विनद्य जूम्भमाणः
फेनं च प्रसृजति तत्सखाभिपन्नः ॥९॥
स्कन्दापस्मार से पीड़ित शिशु-बेहोश हो जाता है, परन्तु कुछ समय पीछे चेतन हो जाता है, अच्छी प्रकार आवाज करता हुआ हाथ-पैर को नचाता सा प्रतीत होता है, शब्द करता हुआ मल मूत्र त्याग करता है, जम्भाई लेता हुआ मुख से झाग गिराता है ॥९॥
अस्ताङ्गो भयचकितो विहङ्गगन्धिः
संसावित्रणपरिपीडितः समन्तात् ।
स्फोटेश्च प्रचिततंतुः सदाहपाकै-
विञ्च्यो भवति शिशुः क्षतः शकुन्या ॥१०॥
शकुनिग्रह से पीड़ित शिशु के अंग ढीले पड़ जाते हैं, भय से घबराया प्रतीत होता है, शरीर से मांस खानेवाले या जल-चर पक्षियों की गन्ध आती है। शरीर पर सब और खाववाले व्रणों से पीड़ित रहता है, जलन और पकनेवाले छालों से शरीर भरा रहता है, यह शिशु शकुनिग्रह से पीड़ित जानता ॥
६६२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० २७ ]
रक्तास्यो हरितमलोऽतिपाण्डुदेहः श्यावो वा ज्वरमुखपाकवेदनातः ।
रेवत्या व्यथिततनुश्च कर्णनासं सूदनाति ध्रुवसम्भिपीडितः कुमारः ॥११॥
रेवतीग्रह से पीड़ित शिशु का मुख लाल, मल हरा, शरीर अति पाण्डुवर्ण या काले रंग का होता है । बच्चे को ज्वर, मुखपाक, वेदना रहती है, बच्चा निरन्तर कान-नाक को मलता रहता है ॥११॥
सस्ताङ्गः स्वपिति मुखं दिवान रात्रौ विद्ध भिन्नं सूजति च काकतुल्यगन्धिः ।
छर्चाऽऽतो हृषिततनूरूहः कुमार-
स्तृष्णातुर्भवेति च पूतनागृहीतः ॥१२॥
पूतनाग्रह से पीड़ित शिशु के अङ्ग शिथिल रहते हैं, दिन में मुख से सोता है, रात्रि में नहीं सोता । मल पतला त्याग करता है । एवं शरीर में कौए के समान गन्ध, वमन से पीड़ित, शरीर के रोमों में रोमांच रहता है, बच्चे को प्यास बहुत रहती है ॥१२॥
यो द्वेष्टि स्तनमतिसारकासहिंका-
च्छर्द्वभिज्वरंसहिताभिरर्धमानः ।
दुर्वर्णः सततमधःशयोऽस्मृगन्धि-
स्तं ब्रूयुभिषञ्च इहान्धपूतनातैम् ॥१३॥
अन्धपूतना से पीड़ित शिशु स्तन से द्वेष करता है, यह अतिसार, कास, हिंका, वमन, ज्वर से पीड़ित रहता है, शरीर का रंग बदल जाता है, निरन्तर सदा उल्टा मुख रखकर (नीचे मुख करके) सोता है, शरीर से खड़ी गन्ध आती है, इस बच्चे को अन्धपूतना से पीड़ित जाने ॥१३॥
उद्भिद्यो भुशमतिषेपते प्ररुधात्
संलीनः स्वपिति च यस्य चान्नत्रकूजः ।
विस्त्राङ्गो भुशमतिसार्यते च यस्तं
जानीयाद्भिषगिह शीतपूतनातैम् ॥१४॥
शीतपूतना से पीड़ित बच्चा अतिशय बेचैन, बहुत कपिता रहता है, बहुत रोता है, खाट के एक पार्श्व पर लगा हुआ सोता है, आँखों में आवाज (गङ्गङ्गाहट) रहती है, अङ्गों में से सड़ी गन्ध आती है, और अतिसार रहता है, इस प्रकार का शिशु शीतपूतना से आक्रान्त होता है ॥१४॥
म्लानाङ्गः सुरचिरपाणपादवक्रत्रो
बद्धाशां कलुषसिराद्युतोदरो यः ।
सोद्रेगो भवति च मूत्रतुल्यगन्धिः
स ज्ञेयः शिशुरिह चक्रमण्डिकार्तः ॥१५॥
शरीर का मध्यभाग दुर्बल, हाथ-पैर-मुख सुन्दर, बहुत खानेवाला, उदर मलिन सिराओं से भरा, बेचैन, मूत्र के
समान गन्धवाला शिशु मुखमण्डिका से पीड़ित जानना चाहिये ॥१५॥
यः फेनं वमति विनम्यते च मध्ये सोद्रेगं विलपति चोर्ध्वंमोक्षमाणः ।
ज्वर्येत प्रततमयो वसासगन्धि-
निःसंज्ञो भवति हि नेगमेषजुष्टः ॥१६॥
जिसके मुख से क्षाम गिरती हो, मध्यभाग से झुका-मुड़ा रहता है, बेचैन एवं ऊपर को देखता हुआ जो रोता हो, सदा-निरन्तर ज्वर रहता हो, वसा के समान गन्ध जिसके शरीर से आती हो, संज्ञारहित-बेहोश जो हो जाता है, उसे नेगमेष से आक्रान्त जानना चाहिये ॥१६॥
प्रस्तब्धो यः स्तनद्वेषो मुखते चाविगन्तुमुहः ।
तं बालमचिराद्भुन्ति महः संपूर्णलक्षणः ॥१७॥
जो बच्चा अतिशय स्तन्ध (जड़ीभूत) अङ्गोंवाला, स्तन से द्वेष करनेवाला, बार-बार जो मूर्छित होता है, उस बालक में बार-बार आवेश करता हुआ ग्रह, सम्पूर्ण लक्षण उत्पन्न करके मार देता है ॥१७॥
विपरीतमतः साध्यं चिकित्सेदचिराद्वितम् ।
इससे विपरीत अवस्था में (असम्पूर्ण लक्षणों में) तथा रोग की नूतनावस्था में चिकित्सा करनी चाहिये ॥
गृहे पुराणहविषाभ्यञ्ज्य बालं गुचो गुचिः ॥१८॥
सर्षपान् प्रकिरेत्तर्चां तैलैर्द्वीपं च कारयेत् ।
सदा सन्निहितं चापि जुहुयाद्भ्यवाहनम् ॥१९॥
सर्वगन्धोषधीबीजैर्गन्धमाल्यैरलङ्कृतम् ।
अरनये कृत्तिकाभ्यञ्ज्य स्वाहा स्वाहेति संततम् ॥२०॥
वैद्य पवित्र होकर, बालक को पुरातन घृत से अभ्यंज करे, पवित्रस्थान पर सरसों को उसके चारों ओर बिखेरे, तैल का दिया जलावे । इस बच्चे के प.स. सदा अग्नि में एलादिगण में पठित औषधियों से, तिल, गेहूँ-उड़द आदि से, सुगन्ध (चन्दन-राल आदि) से हवन करे । बालक को गन्ध-माला से अलंकृत करे । अग्नि और कृत्तिका के लिये स्वाहा-स्वाहा इस उच्चारण से आहुतियाँ देवे ॥१८-२०॥
नमः स्कन्दाय देवाय प्रहाधिपतये नमः ।
शिरसा त्वाऽभिवन्देऽहं प्रतिगृह्णीष्व मे बलिम् ।
नीरुजो निर्विकारश्च शिशुमं जायतां नुतम् ॥२१॥
ग्रहों के स्वामी स्कन्ददेव के लिये मेरा नमस्कार है, मैं शिर झुकाकर आपको नमस्कार करता हूँ, मेरी बलि को आप ग्रहण करें । मेरा बच्चा वेदना रहित एवं रोग रहित जल्दी हो जाये ॥२१॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कुमारतन्त्रे नवग्रहाकृति विज्ञानीयो नाम(प्रथमोऽध्यायः, आदितः)सप्तविंशोऽध्यायः ॥२१॥
अ० २८ ]
उत्तरतन्त्रम्
६६३
अष्टाविंशतितमोऽध्यायः
अथातः स्कन्दग्रहप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥
अब इसके आगे स्कन्दग्रह प्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे—
जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
स्कन्दग्रहोपसृष्टानां कुमाराणां प्रशस्यते ।
वातघ्नदुष्पत्राणां निष्क्रवाथः परिषेचने ॥३॥
स्कन्दग्रह से आक्रान्त वच्चों के लिये ऐरण्ड आदि वातघ्न वृक्षों के पत्तों का क्वाथ परिषेचन में उत्तम है ॥३॥
तेषां मूलेषु सिद्धं च तैलमभ्यजने हितम् ।
सर्वगन्धसुराणमण्डकैडयोंवापमिष्यते ॥४॥
वातघ्न वृक्षों के मूलों में (बिल्वादि महापंचमूल) के क्वाथ में, ऐलादिगण का, सुरा मण्ड और पर्वत निम्ब (बकायन) का कल्क मिलाकर तैल सिद्धकरे । इस तैलका अभ्यंग उत्तम है ॥४॥
देवदारुणि रास्तायां मधुरेषु दुमेषु च ।
सिद्धं सर्पिश्च सखीरं पानमस्मै प्रयोजयेत् ॥५॥
देवदारु, रास्ता, राजादन (खिरनी आदि) आदि मधुर वृक्षों के क्वाथ में दूध के साथ सिद्ध किया घृत इसे पीने को देवे ॥५॥
सर्षपाः सर्पनिर्माको वचा काकादनी घृतम् ।
उष्ट्राजाविगवां चैव रोमाण्युद्धूपनं शिशोः ॥६॥
सरसों, सर्पनिर्माक (केंचुला), बच, काकादनी, घी, ऊंट, वकरी, भेड़ तथा गौ के बालों की बालकों को धूप देवे ॥६॥
सोमवल्लोमिन्द्रवल्लो शमी विल्वस्य कण्टकान् ।
मुगादन्याश्च मूलाणि प्रथितान्येव धारयेत् ॥७॥
गिलोय, हन्द्रवल्लो, शमी (जड़), विल्व के काटे, हन्द्रा-यण की जड़ इनकी माला बनाकर पहनाये ॥७॥
रक्तानि माल्यानि तथा पताका
रक्ताश्च गन्धा विविधाश्च भद्र्याः ।
घण्टा च देवाय बलिनिवेद्यः
सकुक्कुटः स्कन्दग्रहे हिताय ॥८॥
पवित्र वैद्य स्नान करके, रात्रि में स्कन्दग्रह के लिये लाल-फल की मालाएँ, लाल पताकाएँ, केसर आदि लालमुगन्ध, नानाप्रकार के भद्र्य, घंटा, सुग्री-इनकी बलि को बालक के हित के लिये स्कन्द ग्रह को देवे ।
वि० मन्तव्य—यह बलि चौरास्ते पर देनी चाहिये अथवा स्कन्द के मन्दिर में ॥८॥
स्नानं त्रिरात्रं निशि चत्वरेषु
कुर्यात् पुनः शालियैर्नैवेस्तु
अद्विश्च गायज्यभिमन्त्रिताभिः
प्रणवालनं व्याहृतिभिश्च बह्वः ॥९॥
चौरस्ते पर त्रिरात्र स्नान करके नूतन शाली (वान्य) यव से गायज्याभिमन्त्रित जल से व्याहृति पूर्वक अग्नि में डबन करे ॥९॥
रक्षामतः प्रवक्ष्यामि बालानां पापनाशिनीम् ।
अहन्यहृति कर्तव्या या भिषग्भिरतन्द्रितैः ॥१०॥
तपसा तेजसां चैव यशसां वपुषां तथा ।
निधानं योऽव्ययो देवः स ते स्कन्दः प्रसीदतु ॥११॥
ग्रहसेनापतिर्देवो देवसेनापतिर्विभुः
देवदेवस्य महतः पावकस्य च यः सुतः ।
गङ्गोमाकृतिकानां च स ते शर्म प्रयच्छतु ॥१२॥
रक्तमाल्याम्बरः श्रीमान् रक्तचन्द्रनभूषितः ।
रक्तदिव्यवपुर्देवः पातु त्वां कौश्लमूढनः ॥१३॥
इसके आगे बालकों की रक्षाविधि को कहता हूँ, जिसे सावधान रहते हुए वैद्य प्रतिदिन करे, यह रक्षाविधि पाप (दुर्भाग्य) को नष्ट करती है । तप, तेज, यश, सुन्दरता का जो घर है, जो कभी विकृत होनेवाला न हो, वह स्कन्ददेव प्रसन्न हो । स्कन्ददेव, ग्रहों का सेनापति, देवताओं का सेनापति, विभु, देवताओं की सेना के शत्रुओं को नष्ट करनेवाला, स्कन्ददेव तुम्हारी रक्षा करे । भगवान् शंकर का, और बड़ी अग्नि का जो पुत्र है, गंगा, पार्वती-कृतिका का जो पुत्र है, वह तेरा मंगल करे । लाल-माला-बल्ल धारण किये, श्रीयुक्त, रक्तचन्द्रन से शोभित, लालदिव्य शरीर, कौंच को नष्ट करनेवाले (कौंच नामक पर्वत को) देव (स्कन्ददेव) तुम्हारी रक्षा करें ।
वि० मन्तव्य—इन मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण बालक के पास होना चाहिये अथवा लोहे का चिमटा अथवा दाती अथवा झाड़ू अथवा चमर अथवा मोर के पंखों द्वारा मन्त्रोच्चारण पूर्वक झाड़ना चाहिये । अथवा इन मन्त्रों से अभिमन्त्रित जल से प्रोक्षण करना चाहिये । स्मरणीय-प्रत्येक ग्रह की शान्ति के लिये—१—परिषेचन-प्रोक्षण—छोटे मारना-देना—जल छिड़कना । यह कार्य—औषधों के क्वाथ से अथवा उसे अभिमन्त्रित करके अथवा शुद्ध जल को अभिमन्त्रित करके किया जाता है अथवा मन्त्रोच्चारण पूर्वक किया जाता है । २—अभ्यंग के लिये तैल सिद्ध किये जाते हैं । ३—खाने के लिये घृत सिद्ध किये जाते हैं । बालकों के वपुः, सेधा, बल एवं बुद्धि के विवर्धनार्थ (शा० अ० १० श्लो० ७०) भी घृत का प्रयोग बतलाया है उसमें भी इन घृतों का प्रयोग किया जा सकता है । ४—धूपन किया जाता है—निर्दिष्ट द्रव्य अग्नि पर डालकर धूप दी जाती है । ५—द्रव्योषधी धारण—निर्दिष्ट द्रव्य श्राया में पिरौकर अथवा बांधकर अथवा पोटली बनाकर
६६४
मुश्रुतसंहिता
[ अ० ३० ]
श्रीवा में लटका दिये जाते हैं अथवा बाहु आदि पर बांध दिये जाते हैं।
६—बलि देना—बलि का ही नाम उपहार तथा नैवेद्य है। इसमें—कुछ निर्दिष्ट भक्ष्य होते हैं और साथ में पुष्प, गन्ध (इत्र), पताका आदि रहते हैं। यह मन्दिर में, शून्य गृह में, चत्वर—चौरास्ता अथवा आंगन, किसी वृक्ष के नीचे तथा गोशाळा आदि निर्दिष्ट स्थान पर रख दी जाती है।
७—स्नान—औषधियों के क्वाथ से अथवा उसे अभि मन्त्रित करके बालक अथवा बालिका एवं श्रात्री (माता अथवा दूध पिलानेवाली, दोनों को नहलाया जाता है।
८—उत्सादन—उबटन लगाना तथा तिलक लगाना।
९—रक्षा मन्त्र—देखिये ऊपर श्लो० १४ का वि० व०। रक्षा मन्त्रों में ग्रहों का वर्णन होता है और उनसे बालक की रक्षा के लिये प्राथना रहती है तथा बालक के लिये आशीर्वाद रहता है ॥१०—१४॥
इति श्रीमुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गत कुमारतन्त्रे स्कन्दप्रतिषेधो नाम द्वितीयोऽध्यायः आदितो) ऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८॥
एकोन्नत्रिशत्तमोऽध्यायः।
अथातः स्कन्दापस्मारप्रतिषेधं व्याख्याख्यामः ॥११॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे स्कन्दापस्मारप्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥११,२॥
बिल्वः शिरीषो गोलोमी सुरसादिश्च यो गणः।
परिषेके प्रयोक्तव्यः स्कन्दापस्मारशान्तये ॥३॥
स्कन्दापस्मारक की शान्ति के लिये—बिल्व, शिरीष, दुर्वा, और सुरसादि गण का क्वाथ परिषेक में बरते ॥३॥
सर्वगन्धविपक्वं तु तैलमभ्यञ्जने हितम्।
क्षीरवृक्षकषाये च काकोल्यादी गणे तथा ॥४॥
विपक्तव्यं घृतं चापि पानीयं पयसा सह।
बिल्व, शिरीष आदि के क्वाथ में एलादिगण का कल्क मिलाकर तैल सिद्ध करना चाहिये। यह तैल अभ्यंग में बरते। बरगद आदि क्षीर वृक्षों के कषाय में काकोल्यादिगण का कल्क मिलाकर, दूध के साथ घृत सिद्ध करे, यही घृत दूध के साथ पीने को देवे ॥४॥
वत्सादनं वचा हिङ्गयुक्तं स्कन्दमहे हितम् ॥५॥
गृध्रलूकपुरोषाणि केशा हस्तिनखा घृतम्।
वृषभस्य च रोमाणि योव्यान्युदूषपनेऽपि च ॥६॥
स्कन्द ग्रह में उबटन के लिये उबटनों में वक्ष और हींग मिलाये। धपन के लिये गीध, उल्लू का मल, केश, हाथी के नख, घो, बैल के बालों को बरते ॥५,६॥
अनन्तां कुक्कुटीं विम्बीं मर्कटीं चापि धारयेत्।
सारिवा, कुक्कुटी औषध, कौंच की जड़ अथवा कन्दूरी इनकी माला पहनाये।
पक्वापक्वानि मांसाणि प्रसन्नता रुधिरं पयः ॥७॥
भूतौदनो निवेद्यश्च स्कन्दापस्मारिण्डवटे।
पक्व-अपक्व मांस, सुरा, रक्त, दूध, भूतौदन (जी के बिना भोजन या स्निग्धउड़द आदि), इनकी बलि स्कन्दापस्मार रोगी के हित के लिये गड़डे में देनी चाहिये ॥७॥
चतुष्षथे च कर्तव्यं स्नानमस्य यतात्मना ॥८॥
उपवास रखकर सावधानी से बच्चे को चौराहे पर लेजाकर स्नान कराये ॥८॥
स्कन्दापस्मारसंज्ञो यः स्कन्दस्य दयितः सखा।
विशाखसंज्ञश्च शिशोः शिवोऽस्तु विकृताननः ॥९॥
रक्षामन्त्र—स्कन्द का प्रिय मित्र, विशाख नामक विकृत मुखवाला स्कन्दापस्मार नामक ग्रह शिशु के लिये कल्याणकारी हो ॥९॥
इति मुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गत कुमारतन्त्रे स्कन्दापस्मारप्रतिषेधो नाम (तृतीयोऽध्यायः, आदितः)
एकोन्नत्रिशोऽध्यायः ॥२९॥
त्रिशत्तमोऽध्यायः
अथातः शकुनीप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥११॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे शकुनीप्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥११,२॥
शकुन्यभिपरीतस्य कायों वैद्येन जानता।
वेतसाश्रकपित्तानां निष्कवाथः परिषेचने ॥३॥
शकुनी ग्रह से पीड़ित बच्चे के लिये जाननेवाला वैद्य जलवेतस, आम, केश इनका क्वाथ परिषेचन में बरते ॥३॥
कषायमधुरैस्तैलं कार्यमभ्यञ्जने शिशोः।
बरगद आदि कषाय वृक्षों के क्वाथ में, काकोल्यादि मधुर द्रव्यों का कल्क मिलाकर तैल सिद्ध करे। यह तैल शिशु के लिये अभ्यंग में बरते।
मधुकोशीरहीबेरसारिचोत्पलपद्मकैः ॥४॥
रोधप्रियकुमलिष्ठगौरिकैः प्रदिहेच्छिञ्जुम।
मुलेहटो, खस, बालक, सारिवा, कमल, पद्माख, लोख, प्रियंगु, मजीठ, गेरु इनसे शिशु के शरीर पर लेप करे ॥४॥
४ ० ३१ |] 1
त्रणिषूक्तानि चूणोनि पथ्यानि विविधानि च ॥१॥ दवि्िणीय ओर मिश्रकोक्त नाना प्रकार के चूण शकरुनीग्रद
ते यक्त बच्चे के लिए युक्त हँ ।॥५॥
। स्कन्दग्रहे धूपनानि तानीहापि प्रयोजयेत् ।
„ , स्कन्दग्रह स कदे धूपन द्रव्यो को इसमे मी वरते ।
शतावरीमगेवीरुनागदन्तीनिदि गधिकाः | २॥
छदमणां सहदेवीं च बृहतौ चापि घारयेत् ।
शतावरी, इन्द्रायण, वृड़्ीदन्ती, कटेरी, सहदेवी, ल्द॑मणा
- ओर बदड़ीकटेरी इनको धारण केरे ।६॥
। . ' . तिहतण्डढक माल्यं ह रिताङं मनःज्िखा ॥अ७॥ । छरेष करज्जेषु निवेद्यो नियतात्मना ।
। ४
` नदिय होकर करंजो मे देवे । (करंज बृ्षो मे बलि देने के स्थान 5
निष्कुटे च प्रयोक्तभ्यं स्नानमस्य यथाविधि ॥2॥
( निष्छुट का अथं कई घना जंगल करते दै ) ॥८॥ स्कन्द्ापस्मारशमनं श्रतं चापीह पूजितम् । |
¶ कन्दापस्मारनाश्क घृत भमी (क्चीरिदृक्च इत्यादिवाला) । उत्तम हे।
[च विविधां पूजां शङ्कन्याः कुघुमेः अभेः ॥६॥ चमेली या कमल जैसे शुभ पुष्यो से शकुनीग्रह कौ नाना -प्रकार क पूजा करनी चाहिये ॥६॥ । ^ अन्तरिक्षचरा देवी सबाख््कारभूषिता। । . अयोमुखी तीदणदुण्डा गङ्कनी ते प्रसीदतु ॥१०॥ दुदडना महाकाया पिङ्गाक्षी भेरवस्वरा। रम्बोदरी शङ्ककणीं शङ्खनी ते प्रसीदतु ॥१९१॥ । „ र्षामन्न-अन्तरिक्च मे विचरनेवाली, सम्पूण. अलंकारो
से शोभित लोहे के मुख को, तौद्ण मुखवाली शकुनी तु [क्क | कै व्थि प्रसन्न हो । दूषित विकराल दातों्ाली, बडे शरीर की पिंगल आंखों कौ, भैरवश्वर की, लम्बे पेख्वारी, शं क् (कीला) समान कानवाटी शङकुनी देवी वश्च पर प्रसन्न हो ॥१०॥
इति सुशुतसंहितायामुत्तरतन्वान्तगंति कुमारतन्त्रे शकुनी ४ प्रतिषेषो नाम॒ (चतुर्थोऽध्यायः, -आदितः ) 3 तिंशोऽध्यायः॥|२०॥ ५९
। `. . .रकत्रिशत्तमोऽ्यायः अथातो रेवतीप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः॥१॥ ~
1 न क ४
जर किक
: ॥ 1 क ` च्छ + 1
`उत्तरतन्त्रम्
। तिर-तण्डुढ, माला, हतार, मैनखिछ इनकी वि संयते
। पर निकरुञजो मे बलि देना ठीक हे, पाठ भी निङुजेषु ई) ॥॥ ।
बालक को विधिपूवंक स्नान घर के बगीचेमे कराये.|
या जीया पोता-की लकड़ी का मना ख्चक (आमूषण ) संदा
| -छम्बा करारा विनता तथव बहुपुश्रिका ॥ . .. रेवती शष्कनामा यासा ते देव प्रसीदतु ॥११॥ | ` दो नदियों के संगम में वेय षाम .ओर बालक को स्नान =
` | कराये । रक्षासन््-न
| ६९१.
अश्वगन्धाऽजश्ङ्गी च सारिवा संपुननवा । सहे तथा विदारी च कषायाः सेचने दिताः ॥३॥ अश्वगन्धा, काकड़ाश्वज्गी, सारिवा, पुननवा, -सृद्गपर्णी माषपर्णी, विदारी इनका कषाय परिषेक मेँ उत्तम ई । ८ इनको अलग अल्ग या समरदाय स्पे बरते)॥३ ~ तरमभ्यज्जने काय कुष्ठे सजरसेऽपि च । पठङ्कषायां न्द् तथा गिरिकदम्बके ।।२। ८, राठ, गुग्ुक, जटार्मासी ओर गिरिकदम्ब ( अपरा- जिता ) इनके कल्क से अभ्यङ्ग के ल्थि तै सिद्ध करे। ( द्रव्यकरायं पानी से करना चाहिथे ) 1४1 धवाश्वकणकङुम्भधातकोतिन्दुकोषु च । काकोल्यादिगणे चैव पानीयं सर्पिरिष्यते ॥५॥ घव, अरवकण, अजुन, धातकी, तिन्दुक इनके कषाय मे
काकोल्यादि गण के कल्क से. घत चिद्ध-करे यह घत षपीनेके ` लिये देवे । .
वक्तव्य -कोई आचाय धव अश्वकण आदि कषाय उपरोक्त ` तेरपाक के श्यि गिनते ई ॥५॥ कुखत्था शङ्कचणं च प्रदेहः सावंगन्धिकः।
गृधोलूकपुरीषाणि यवां यव्खो घृतम् ।६॥ सन्ध्ययोरुभयोः कायमेतदुद्धूपनं शिशोः। वरुणारिष्ठकमयं रुचकं सेन्दुकं तथा ॥७॥ सततं धारयेच्चापि छृतं वा पौत्रजीविकम् । - ज्ुश्छाः सुमनसो खछाजाः पयः शाल्योदनं वथा ॥2॥ वल्निविधो गोतीथ रेवल्ये प्रयतात्मना। कुख्त्थी, शंख का चण ओर एलादि.गण की ओषधयो का सब शरीर पर प्रदेह करे । गीष; उन्द् का मल,. जो, वाख
| ओर घी इनसे दोनों संध्या कारूमें बच्चे को घप देव ] वारणा
ओर नीम की खकडी का बना, सेन्दु ( निर्गण्डी ) का बना `
धारण कराये । श्वेतफूढ, लाजा, दूष, शालीमात ` इनकी नखि
गोतीथ में ( जहां गयं पानी पीती हो ) उपवासादि से पवित्र होकर रेबतीग्रह के ठि देवे ॥६-८॥ _ ~.
सङ्गमे चं भिषक. स्नानं ऊयाद्धात्रीक्कमारयोः ॥€॥ : .नानावद्परा देवी चित्रमाल्याचुख्ेपना। =~ चख््कुण्डडिनी स्यामा रेवती ते प्रसीदतु ॥१०॥ _ -उपासते यां सततं देव्यो विविषभूषणाः । : __
-नाना प्रकार के वस्नं को पारण करनेवाली. ˆ
माला णवं अनुप बालो, हिते इए ङ
देवी तेरे प्र प्रसन्नो + नातप
५ एः + 9 2
&९&& `
प्रकार के मूषण पहने हए जिस देवी कौ निरन्तर उपाखना
करते है, लम्ब्री-कराल ( विकट दान्तो कौ ), विनता ( कुबड़ी )
बहप वाली, शुष्क नाम की जो रेवती देवी हं, वह तुक्च पर
प्रसन्न हो ।६-१९।)
` इति धीसुश्रतसंदहितायायुत्तरतन्तरान्तगंते ङुमारतन्तरे रेवती
प्रतिषेधोनामं ८ पञ्चमोऽयायः, आदितः )
एकत्रिशोऽध्यायः ॥२३९१॥
द्राधिशत्तमोऽध्यायः
अथातः पूतनाप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे पूतनप्रतिषेष का व्याख्यान करगे जेखा- भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १,२॥ ` कृपोतवङ्काऽरल्को वरुणः पारिभद्रकः ।
आस्फोता चैव योभ्याः स्युबाखानां परिषेचने ॥२॥
वचा वयःस्था गोखोमी हरितां मनःजिला ।
कुष्ठं सजेरसङचेव तैखाथ वग इष्यते ॥४॥ वाक्कों को स्नान करने के लिये कपोतवंका ( ब्राह्मी ) अरलु, वरना, बकायन, सारिवा-इनका क्वाथ वरतना चाहिये अभ्यङ्ग करने के व्यि वच, गिलोय ( या हरड़ ), दवा, हरताल
, मेनसिल, कुष्ठ ओर रार इनका कल्क ओर कषाय इनमे तेल
सिद्ध करे ( हरतार मनसि का कषाय नही होगा इसलिये
इनका कल्क ही लेकर द्रव कायं जल से करे ) ।(३,४॥
हितं घृतं तुगाक्षीयो सिद्धं मधघुरकेषु च । कु्ठताखीशख दिर चन्दनस्यन्दने तथा ॥५॥ देवदारुव बार्दिगुङकष्ठ गिरिकम्बकः
` एखाहरेणवरश्चापि योऽ्या उद्धपने सद्ा ॥६॥
. गन्धनाङ्ल्िङ्धम्भीके मञ्जानो बदरस्य च ।
` ककटास्थि घृतं चापि धनं, सष्पेः सह ।(७॥ वृंशद्धोचन, काकोल्यादि मधुरगण, इनके क्वाथमें कुष्ठ
तादश, खेर, चन्दन ओर सदन इनके कल्क से सिद्ध घत
. पीने मे बरते । देवदार, वच, हींग, कृठ, कोयल, इलायची
ओर हरेण इनसे सदा धम देवे । गन्धनाकुखी (रासना), कुमिका
| ` (जल कुभ्मि ), वेरकी भज्जा, केकडे की अस्थि, घी ओर सरलो इनसे सदा धूप देवे ॥५-७॥
“ ` काकादनीं चित्रफल। विम्बं गु्ञां च धारयेत् । ~ मस्स्यौदनं च कुर्वीत कश्या पटलं तथा ॥
शरावसंपुटे त्वा बि न्यगृदे हरेत् ॥८॥ |
` . काकादन (वायसी. या कौआ टूटी); चित्रफला (इन्द्रायण)
कन्दुरी ओर रत्ती बच्चे को धारण कराये। मछली. ओर भात
तिलतण्डूढ की खिचड़ी, तिलकल्क इनको एक शराव सम्पुट ( दोहने ) में रखकर शूल्यघर म ( जह कोई नदीं रहता हो वहिदेवे॥त॥ ` व
सुश्रतसंहिता
| ओर आंखो पर केप करना चाहिये ॥१॥
पुरानी कन्था (गदी ) इनसे धूपदेवे। . ५ ^
[ अ०३२ ३३ । उच्छिष्टेनाभिषेकेण शिशोः स्नपनमिष्यते। । पूञ्या च पूतना देवी बकिभिः सोपहारफैः ॥6॥
मछिनास्बरसंबीता सङ्ना रूक्षमूधजा
रन्यागाराश्चिता देवी दारक पातु पृतना ॥१०॥ दुदशेना सुदुगन्धा कराखा मेवकालिका।
भिन्नागाराश्रया देवी दारकं पातु पृतना ॥११॥ जठ पानौ से बच्चे को स्नान कराये । वकि एवं उपहार ।
से पूतना देवी का पूजन करना चाहिये । रक्षामन्तर-मेले बघ्ौ
को धारण किये हए, मलिन, रूक् बा की, शूट्यघर मे रहने वाली, पूतना देवी बच्चे की रक्षा करे । देखने मे भह, दुग॑नध
वारी, कराख, मेघ के समान काली, टूटे घर मे रदनेवादी
पूतना देबी बच्चे कौ रक्षा करे ॥६-११॥
इति श्रीसुश्रतसंहितायामुत्तरतन्ान्तगते कुमारतन्तरे `
पूतना प्रतिषेधो नाम ( षष्ठोऽध्यायः, आदितः)
दरात्रिशोऽध्यायः ॥३२॥
अ्रयखिशत्तमोऽध्यायः
अथातोऽन्धपतनाप्रतिषेधं उयाख्यास्यामः ॥९॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब्र इसके आगे अन्धपूतना प्रतिषेध का व्याख्यान कस्य
जैसा कि भगवान धन्वन्तरि ने कहाथा ॥ ९२॥ .
तिक्तकदरुमपत्राणां कायं क्वाथोऽबसेचने ।
बच्चे कौ स्नान कराने के लिएःनीम आदि तिक्त. 0. पत्तों का क्वाथ बरतना चाहिये । िः ,
सुरा सौवीरकं कुष्ठं हरितारं मनःजिखा ॥२॥
तथा सजेरसश्चेव तेङाथमुपदिश्यते । त
पिप्पल्यः पिप्पलीमूलं बर्गो मधुरको मधु ॥४॥ =
शार्पणीं जरहत्यौ च घ॒ताथसुपदिश्यते (
सुरा, काञ्जी, कूठ, हरताल, मैनसिल ओर रार €
तै सिद्ध करे । पिप्मी, पिपलीमूल, काकोल्यादिमधु, °
पर्णी, कटेरी, बड़ी कटेरी, इनमे घत सिद्ध करे ॥२४४॥ ..
सबेगन्थे ग्रदेहश्च गातरेष्वदणोश्च गीतः ॥९॥ _ ..
एलादि सर्वगन्धद्रव्यो से तथा शीतल द्रनयो से शरर^ |
पुरीषं कौक्छुटं केशश्च सपवचं तथा । |
जीणौ' च भिद्धसंघाटीं धूषनायोपकल्पयेत् ॥५
मुगे का. मर, केश,. चम॑, सापि की. केचुली भि
, वक्तव्य-““भिन्लसंबारी भिकषुखशाक्यमिह्ुवौ <
वराजकञ्च, तयोः जीणसंघारी जीणवस्वम् ॥६॥
कुक्छुदीं मकंटो निम्बीमनन्ता चापि धार ~ मासमामं तथा पक्वं जोणितं च चदुष्पये ॥०। .
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जिजोश्च स्नपनं कुयात् सबेगन्धोदकैः ञ्जभेः ॥2॥
कराखा पिङ्गा मुण्डा कषायाम्बरवासिनो । देवी बामिमं प्रीता सरक्षत्वन्धपूतना ।॥९॥
, क्री, कोचः शिम्बी (सेम), सारिवा इनको धारण कराये । कच्चा जर पका मांस, रक्तं इनको चौराहे पर ओर ` ममन धर के अन्दर बच्चे की रक्षाके ल्थि बलि देवे। शिश
। को ओर धानी को, एलादि सवंगन् द्रव्यो से स्नान कराये | । रक्षामन््-कयाल, पिंगर, मुण्ड, कषाय वख को -धारण करने. । वाली, अन्धपूतना देवी इस बाक्क की रक्षा करे ॥७।
इति श्रीसुश्ुतसं हितायायुत्तरतन्बान्तगते कुमारतन्त्रेऽन्धपूतनाप्रतिषेषो नाम (सप्तमोऽध्यायः आदितः )
त्रयस्िशोऽध्याय्ः ॥३३॥ <
चपुखिशत्तमोऽ्यायः . `
अथातः शीतपूतनाप्रतिषधं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥(२॥
अब इसके आगे शीतपूतनाप्रतिषेध का व्याख्यान करंगे--
लेखा क्रि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१.२॥
कपित्थं सुवहा निम्बा तथा बिल्वं प्रचीबलम् |
नन्दीं भर्छातकं चापि परिषके प्रयोजयेत् ॥३॥
` बस्तमूत्रं गवां मूत्रं मुस्तं च सुरदारु च ।
कुष्ठं च सवगन्धांश्च तेखाथेमवचारयेत् ॥४॥ रोहिणीसजंखदिरपलाशककुभत्व चः। निष्क्वाथ्य तस्मिन्निष्काये सक्षीरं विपचेदुधृतम् ॥५॥ ग्रध्ोद्ूकपुरीषाणि वस्तगन्धानहेसूवचः निम्बपत्राणि मधुकं धपनाथं प्रयोजयेत् ॥६॥ , धारयेदपि छस्बां च गुज्जां काकादनी तथा ।
^ कैथ, सुवहा ( गोधापदी या रास्ना ) कन्दुरी, बिल्व, परचीबलम् (मदी या आंवला), नन्दी (अश्वत्थ, पारख पीपल)
भिलावा -इनका क्वाय परिषेकं मे ब्रते । बकरी का मू
मू, सुस्ता, देवदास कुष्ट ओर ` एलादिगण इनसे तेढ सिद्ध
| करे । रोहिणी (कटक), चीड, ' खेर, ठकि ओर अजन कौ
आ) इनका क्वाय करके इस ववाथ मेँ दधः मिलाकर धृत् ड करे | गौध, ` उल्द की निष्ठा, वस्तगन्धां (अजगन्व);
{१
सती) को धारण कराये ।
| पिप्य -ऋ्तव्य-उल्हण ने नः दौ भल्छातक णठ पदकर जठ
| हौ अथे क्रिया ई ॥२.६ : य
। मयां सुद्गङ्तेश्वान्नैस्तपयेष्छीतपूतनाम्॥७॥ देयश्चोपहारो वारुणी रुधिरं तथा।
५4. "> र.
ठत्तरतेन्् ` #
पिक कलुखी; नीम के पन्ते ओर सरेदठी इनसे धूपः देवे ।
(कड्वातुम्बा). रत्ती काकादनी (कोटी या -श्वेत
- ` | चील, सौप की जीम कोः णारण कराये । कसील; 5
६९७ मृग से बने मर्यो से नदी म बलि दैकर शीतपूतना को प्रसन्न करे । इस देवी के ल्थि वाणी (मदय) ओरं रक्तं का उपहार देना चाये । बाख्क को जलाशय के किनारे स्नान कराये । (नदी के समीप स्नान कराये) ॥७८्] सुद्गोदनाशना देवी सराोणिततपायिनी । जखाशयाख्या देवौ पातु स्वां जीतपूतना ॥€! रश्चामन्ब- मुंग ओर चावल को खानेवाखी, सुरा एं रक्त को पीनेवाली; जलाशय मे रदनेवाढी शीतपूतना देवी तेरी
रक्षा करे ।६॥) इति श्रयुश्ुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तगते कुमारतन्पे शीत- पूतनाप्रतिषेधो नाम (अष्टमोऽध्यायः, आदितः)
चठल्निशोऽध्यायः ॥३४1।
(ज म प्चाच्ररतमाऽव्पायः
अथातो मुखमण्डिकाप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥ `
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरेः ॥२॥
अब इसके आगे मुखमण्डिकाप्रतिषेध का व्याख्यान
कृरगे- जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कदा कदा था ॥२.२॥ _
कपित्थबिस्वतकौरीवांगीगन्ध वेहस्तकाः ।
कुबेराक्षी च योज्याः स्युबोखानां परिषचने ॥३॥ `.
कैथ, ब्रिल्व, अरणि (अग्निमन्थ), वंशरोचन, एरण्ड,
कुबेराक्षी (सद्रक्षा या काष्ठ वाटला) ईंनेके क्वाथ से बालक को
स्नान कराये ॥३॥
स्वरसैभेङ्घवृक्षाणां तथाऽजहरिगन्धयोः । तेर वसां च संयोञय पचेद्भ्यञ्जते जिजोः ॥भा
वातदर-एरण्ड आदि वृक्षों के कमर पत्तो के तथां अज- `
गन्धा ओर अश्वगन्धा के कषाय मे वसा ओर तेर को मिल कर सिद्धः करे | इस तेर से बच्चे का अभ्यंग करे । (भृगढक्षः `
| भृंगराज इति भी हदारणचन्द्रः ) ।॥४॥
मधलिकायां पयसि तुगाक्षीयां गणे तथा । - ~ `
मधुरे पच्चमूङे च कनीयसि घृतं पचेत् ॥५॥
मधृठिका-मूवां मे, दुष मे, - वंशलोचन काकोल्यादि सधुर `
` गण मे. शाल्पण्यांदि रधुः पंचमू मे धुत को सिद्ध करे ॥\५॥
वचा सजेरसः कुष्ठं सर्पिश्चोद्धुपनं दितम् ।
धारयेदपि जिह्वाश्च चाषचोरल्किसिपजाः ॥६॥
वणक चूणके माल्यभञ्जन पार्द वथा ।
मनःजिखं चोपहरेद्गोछमष्ये बड तथा ।७॥
पायसं सपुरोडाओं बल्यथंयुपखहरेत्) मन्त्रपूताभिरद्धि् तत्रैव स्नपनं दितम् ।८॥ ५
वच, राक, कूठ, षी श्नसे धूप देना उत्तम है. चाष, _ `
(. . नलाशयात्ते ब्राङखस्य स्नपन चोपदिश्यते ॥९॥ ` -॥ सुरमा भयः मनसिखः सीर) युरोडाशं न
५ +
ट सश्रतसं हिता [ ० २९१५ |
देवे। संतर से पवित्र कयि जरसे बच्चेको गोशारामेंदी सरसो, वच, हींग, कूट, अक्षत (जो), भिलावा, अजवायन्
स्नान कराये }} इनसे बच्चे को धूप देवे ।॥७॥! ।
वक्तव्य पुरोडाश-अष्टाकपालः पिष्टमयः कपाठोपरिपक्रः मकरोटकगृध्राणां पुरोषाणि नवग्रह ।
` तृणाग्नि 11” मन से- पवित्रगायत्री मंत्र से अभिमन्त्रित जल धूपः सुपे जने कार्यो वारस्य हितमिच्छता ८ । से स्नान कराये । गोष्ठ का अथं-जहाँ गाये वेठकर मध्या मं बन्दर, उल्ल, गीष इनकी विष्ठा का अक्षत (जौ) के साथ
जुगाढी या आराम करती दै--उस स्थान से हे ॥६-८ ` नवग्रह मे वच्च को रात्रि मे धूप देवे |
अलङ्कृता रूपवती सुभगा कामरूपिणी । तिखतण्ड्टकं माल्यं भद्यांश्च विविधानपि ।
गोष्ठमध्याख्यरता पातु त्वां युखमण्डिका ॥&! ङमारपिदमेषाय वृक्षमूठे निवेदयेत् ॥€॥
| रक्षामन्र--अटेङककत, रूपवती सौभाग्यवती, कामरूपी तिक, तण्डुल, माला (पुष्प), नाना प्रकारके भ्रच्यपद्ाथाँ
गोशाला के बीच मे रहनेवारी मुखमण्डिका देवी तेरी रक्षा | की कुमारपिवूमेष रह के च्य दृ्षमूर म बलि देवे ॥६॥
करे |! ६॥ अधस्ताद्रटवृक्षस्य स्नपनं चोपदिङ्यते। `
इति श्रीयुश्टतसहितायायततरतन्तरान्तगते कुमारतन््र बर न्यभ्रोधवृ्तेष तिथौ पष्ठयां निवेदयेत् ॥१०।
मुखमण्डिकाप्रतिषेघौ नाम (नवमोऽध्यायः) अजाननश्चरखाक्षिभ्रः कामरूपी सहायाः! = |
आदितः) पञ्च्चिशत्तमोऽध्यायः ।[३५॥ बार बारुपिता देवो नगमेषोऽभिरश्चतु ॥ *९॥
८ बस्चे को बरगद के बृक्ष के नीचे स्नान कराये] बरगद
५ द के वरक्षोंमे छठी तिथिमें बलि देवे। रक्चामन्र-बकरीके .
परूनिशत्तमोऽध्यायः समान मुख को, चंचल ओंख एवं भ्रुवाखा, कामरूप, बड़े यश- ..
अथातो नेगमेषप्रतिषेधं ्यास्यास्यामः॥९॥ वाला, बाककों का पिता नेगमेष देव, बालक की रक्षा करे॥ `
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥ ` | इति भीसुश्रतसंहितायाय॒त्तसतन्तरान्तगंते कुमारतन्त्रे नेग-
. अव इसके आगे नेगमेषप्रतिषेध का. व्याख्यान करैगे-- मेषप्रतिषेषो नाम (दशमोऽध्यायः आदितः) ५
। जेसा.कि मगवान् षन्वन्तरि ने क्हाथा॥१,२| षटूतियोऽ्ष्यायः ॥३६॥ = ।
बिस्वाग्निमन्थपूतीकाः का स्युः परिषेचने। - ॥,
सुरा सबीजं धान्याम्छं परिषेके च शस्यते ॥३॥ | 9
प्रियङ्गुसरखानन्वाशतयुष्पाङ्टन्नटेः । सप्तबरिशत्तमोश्ध्यायः
पचेत्तेरं सगोमूत्र द्धमस्स्वम्डकालिजकेः।॥४॥ | „` वच्चे को स्नान कराने के ठ्यि बिल्व, अग्निमन्थ, करंज यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥ ष ~ का कषाय बरते । सुरा, सुराबीज. (किण्व) ओर कांजी से परिष्क अब इसके आगे ग्रहोत्पत्ति अध्याय का व्याख्यान कर्ण. ~
करना उत्तम दै ।. प्रियंगु, चीड _(बिरोजा);, सारिवा, सोफ, | जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
केवड़ी मोथा इनके कल्क से, गोमू, दही, मस्तु, विजोरे का वि० मन्तव्य- इस अध्याय मँ भूतविद्या के अनुखार शद ज
रस, काजी इनमे ते काये (गोमूत्र आदि तैकके बराबरढे) ॥ | कौ उद्यत्ति आदि कावणन दहै ॥१२॥ = ~ _ ~ पञ्चमूखदरयक्वाये क्षीरे मधुरकेषु च| ` |. नव खकन्दादयः प्रोक्ताः वाङानां य इमे रहः
पचेदुशतं च मेधावी खजृरीमस्तकेऽपि वा ॥५॥ श्रीमन्तो दिग्यवपुषो नारीपुरुष विग्रहाः ॥२॥ ५ दशमूल का क्वाय, दूष, इनमे काकोल्यादिगण ओर |. गाल्को के स्कन्दादि जो ये सौ अह के ह, ये सब ए4^ `
खजुर का शियोमाग इनके कल्क से बुद्धिमान् घृतपाक करे । | शाली. दिष्य तनु एवं खरी पुरुष शरीरबाछे दै ॥२॥ छ.
|
५ र ॐ += जवं
अथातो अ्रदोत्पत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥९॥
< (द्यम् का क्वाय तीन माग, दुघ एक भाग ठेकर पकाये)॥५॥|| ` एते गुहस्य रक्षाथं कृत्तिकोमाग्निशूल्भिः।
. वचां वयःस्थां गोखोमीं जटिलां चापि धारयेत् | सटाः जरबणस्थस्य रक्षित स्यात्मतेजसा ॥|४॥
, उत्सादनं हितं चात्र स्छन्दापस्मारनाशनम् ।।&॥ |. शरबणरथ एवं अपनी शक्ति से `रश्चित होने पर ८
वच) गिलो (याहरढ़), दां ओर जटामाखीं इनको | (कार्तिकेय) की-रश्ा के च्यि कृत्तिका पावती -अग्नि ०
घारण कराय । स्वन्दापस्मार नाकं कटी ओषधियो से वन्वे | महादेव ने इन अरहो को उत्पन्नः क्रियाः । 4 द क को उत्सादन करे ॥६॥ प | | वक्तव्य --लिस प्रकार . अपनी शक्ति से रक्त £ 1
` || दुसरे देव रश्चा करते ह उसी. प्रकार कार्तिकेय कीय ८ क
क ९ “~ चूक ` । करते हं । क क क = „१ ^ । - ट भनि. क । + +त + "~ स ~ -" [न 44) ५) ४ = भकः = क 4
सः 1 9 +. ~ 4 + स. अ 2 ¬ ^ 4: ~ 4.
क द पी = २44
सिद्धाथकवचादिङ्गषटं त्यर्मानं
1 (५ = ऋ “~
अ० ३७ ]
उत्तरतन्त्रम्
६६७
वि० मन्तव्य—गुह अर्थात् कर्तिकेय की कथा शिवपुराण तथा कुमारसम्भव नामक काव्य में देखिये । संक्षेपतः यह शिव के पुत्र थे और इन्होंने तारकासुर का वध किया था । तारकासुर का वध करने के लिये ही भगवान् शिव ने कार्तिकेय को उत्पन्न किया था ॥४॥
श्रीविग्रहा प्रहा ये तु नानारूपा मयेरिताः ।
गङ्गोमाङ्गुत्तिकानां ते भागा राजसतामसाः ॥५॥
श्री शरीरवाले जो ये नानाप्रकार के ग्रह मैंने कहे हैं, जिनकी गंगा, पार्वती, और कृत्तिका ने बनाया है, ये ग्रह राजस एवं तामस हैं ( रजतमोष्य हैं ) ॥५॥
नेगमेपस्तु पार्वत्या सृष्टो भेषाननो ग्रहः ।
कुमारधारी देवस्य गुहस्यात्मसमः सखा ॥६॥
नेगमेष ग्रह को पार्वती ने बनाया है, इसका मुख मेष ( मेड़ ) के समान है, कुमार की रक्षा करनेवाला गुह ( कार्तिकेय ) देव का अभिन्न मित्र है ॥६॥
स्कन्दोपरस्मारसंज्ञो यः सोऽग्निनाऽग्निनसमद्यतिः ।
स च स्कन्दसखा नाम विशाख इति चाच्यते ॥७॥
स्कन्दोपरस्मारग्रह अग्नि से उत्पन्न हुआ है, इसकी बुद्धि अग्नि के समान है, यह स्कन्द का मित्र है, इसका दूसरा नाम विशाख है ॥७॥
स्कन्दः सृष्टो भगवता देवेन त्रिपुरारिणा ।
विभर्ति चापरां सञ्जां कुमार इति स ग्रहः ॥८॥
रुद्रदेवता ने स्कन्द को उत्पन्न किया है, इसी ग्रह को 'कुमार' इस नाम से भी कहते हैं ॥८॥
बाललोलाधरो योऽयं देवो रुद्राग्निनसम्भवः ।
मिथ्याचारेषु भगवान् स्वयं नैष प्रवतते ॥९॥
बालकों की लीला को धारण करनेवाला, रुद्र एवं अग्नि से उत्पन्न यह देव, मिथ्या आचरणों में स्वयं प्रवृत्त नहीं होता, ( भगवान् होने से ) अपितु इसके नोकर प्रविष्ट होते हैं । कहा भी है—
“तेषां ग्रहाणां परिचारका ये कोटीसहस्रायुतपद्मसंख्याः ।
असुरवसामसंभुजः सुभीमा निशाविहाराश्च तमाविशन्ति ॥” यु० अ० ६०।२२।
वि० मन्तव्य—तात्पर्य यह है कि कुमार अर्थात् कार्तिकेय स्वयं बालकों में आवेश नहीं करता अपितु उसके स्कन्द आदि अनुचर ही आवेश करते हैं ॥९॥
कुमारः स्कन्दसामान्यादत्र केचिदपण्डिताः ।
गृह्णातीत्यल्पविज्ञानां वृवते देहचिन्तकाः ॥१०॥
कार्तिकेय स्कन्दग्रह के नाम की समानता से बालक को आक्रान्त करते हैं, ऐसा कई अपण्डित, देहचिन्तक वैद्य कहते हैं, वे अल्प ज्ञानवाले और मूर्ख हैं ॥१०॥
ततो भगवति स्कन्दे सुरसेनापतौ कृते ।
उपतस्थुर्ग्रहाः सर्वे दीप्तशक्तिधरं गुहम् ॥११॥
कृत्तुः प्राङ्गुल्यश्चैनं वृत्तिं नः संविधत्स्व वै ।
तेषामर्थं ततः स्कन्दः शिवं देवमचोदयत् ॥१२॥
ततो ग्रहास्तानुवाच भगवान् भगनेत्रहत् ।
तिर्यग्योनि मानुषं च देवं च त्रितयं जगत् ॥१३॥
परस्परोपकारेण वर्तते धार्यतेऽपि च ।
देवां मनुष्यान् प्रीणन्ति तैर्यग्योनीस्तथैव च ॥१४॥
वर्तमानैर्यथाकालं शीतवर्षोष्णमारुतेः ।
इव्याङ्गलिनमस्कारजपहोमव्रतादिभिः ॥१५॥
नराः सम्यक् प्रयुक्तैश्च प्रीणन्ति त्रिदिनेऽस्वरात् ।
भागधेयं विभक्तं च शेषं किञ्चित् विद्यते ॥१६॥
तद्युष्माकं शुभा वृत्तिबोलेऽथैव भविष्यति ।
कुलेषु येषु नेत्रयन्ते देवाः पितर एव च ॥१७॥
ब्राह्मणाः साधवश्चैव गुरवोऽतिथयस्तथा ।
निवृत्ताचारशीलेषु परपाकोपजीविषु ॥१८॥
उत्सन्नबलिभिर्चोषु भिन्नकास्योपभोजिषु ।
गृहेषु तेषु ये बालास्तान् गृह्णीध्वमशाङ्किताः ॥१९॥
तत्र वो विपुला वृत्तिः पूजा चैव भविष्यति ।
एवं ग्रहाः समुत्पन्ना बालान् गृह्णन्ति चाप्यतः ॥२०॥
ग्रहोपसृष्टा बालास्तु दुःखिकित्यतमा मताः ।
फिर देवताओं के सेनापति बना देने पर भगवान् स्कन्द, चमकती हुई शक्ति को धारण करनेवाले गुह के पास पहुँचकर सब ग्रहोंने हाथ जोड़कर कहा कि, आप हमारी बुद्धि (जीविका) का प्रबन्ध करो । इनके लिये तब स्कन्द ने महादेव जी को कहा—भगनेत्र का नाश करनेवाले भगवान् शम्भु ने तब उन ग्रहों को कहा कि—तिर्यग्योनि ( पश्चि, पशु आदि ), मानुष, और देव यह तीनों प्रकार का जगत् एक दूसरे के उपकार से धारण किया जाता है, और स्थिर रहता है । देवता मनुष्यों का और तिर्यग योनि का पोषण करते हैं, यथा समय पर शीत, वर्षा, ग्रीष्म और वायु से इस जगत् की रक्षा करते हैं । मनुष्य यज्ञ, अंजलि नमस्कार ( हाथ जोड़ना ), जप, होम, व्रत आदि को भलीप्रकार करके देवताओं को प्रसन्न करते हैं । इस अंश समूह को देवता, मनुष्य तिर्यग्योनि ने आपस में बाँट लिया है, इस लिये इससे तो कुछ बचना नहीं । इसलिये तुम्हारी उत्तम जीविका बालकों में ही होगी । उनमें भी जित कुलों में देवताओं और पितरों के लिये यज्ञ नहीं होता, ब्राह्मण, साधु, (सज्जन पुरुष), गुरु, एवं अतिथियों की जहाँ पूजा नहीं होती, आचार-पवित्रता जहाँ नष्ट हो गई, दूसरे के ऊपर जीनेवाले, जहाँ बलि एवं मिश्रा नष्ट हो गई हो, दूते-पात्रों में भोजन करनेवाले, घरों में जो बालक हों उनको तुम बिना शंका के आक्रान्त करो । वहाँ तुमको प्रचुर जीविका मिलेगी और तुम्हारी पूजा भी होगी । इस प्रकार से उत्पन्न ग्रह बालकों को पीड़ित करते हैं, ग्रह से आक्रान्त बच्चे-कष्ट साध्य माने गये हैं ॥
६७०
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३८ ]
वक्तव्य—गीता में भगवान् ने कहा है—“देवान् भावयन्तानेन, ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः, श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥” चरक में कहा है—“विरुद्धदुष्टाशुचिभोजनानि, प्रवर्षणं देवगुरुद्विजानां। उन्मादहेतुः भयहर्षपूर्वो मनोऽभिधातो विषमाश्च चेष्टाः ॥” चरक ॥११-२०॥
वैकल्यं सरणं चापि ध्रुवं स्कन्दग्रहे मतम् ॥२१॥
स्कन्दग्रहोऽत्युग्रतमः सर्वध्वेव यतः स्मृतः।
अन्यो वा सर्वरूपस्तु न साध्यो ग्रह उच्यते ॥२२॥
स्कन्दग्रह के आक्रमण से विकलांगता और मृत्यु निश्चित हैं। क्योंकि इन सब में स्कन्दग्रह सबसे अधिक उग्र कहा है। दूसरे किसी ग्रह में सम्पूर्ण लक्षण होनेपर वह असाम्य होता है ॥ इति श्रीसुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तगते कुमारतन्त्र
ग्रहोत्पत्त्याध्यायो नाम (एकादशोऽध्यायः, आदितः)
सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥३७॥
अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः
अथातो योनिव्यापस्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे योनिव्यापस्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—योनि-भग (मैथुनोपयोगी अवयव) तथा गर्भाशय नामक अवयवों का सम्मिलित नाम योनि है इस अवयव के तीन आवर्त्त हैं—दो भग कहलाते हैं और तीसरे आवर्त्त में गर्भशय्या-गर्भाशय रहता है। इस अध्याय में भग एवं गर्भाशय को व्यापदों—विकृतियों का वर्णन तथा उनकी चिकित्सा का वर्णन है। व्यापद् शब्द रोग वाचक है ॥१,२॥
प्रवृद्धलिङ्गं पुरुषं याऽत्यर्थमुपसेवते।
रूक्षदुर्वलबाला या तस्या वायुः प्रकृध्यति ॥३॥
स दुष्टो योनिमासाद्य योनिरोगाय कल्पते।
अतिप्रलम्ब (अधिक पुष्ट एवं लम्बे) मेहनवाले पुरुष का जो रूक्ष, दुर्वल शरीरवाली स्त्री अथवा बालिका अतिशय सेवन करती है, उसमें वायु प्रकृपित हो जाती है, यह दूषित वायु योनि में पहुँचकर योनिरोगों को उत्पन्न करती है। चरक में—
“मिथ्याचारेण ताः स्त्रीणां प्रदुष्टेनावर्त्तवेन च।
जायन्ते वीजदोषाच्च देवाच्च ताः शृणु पृथक् ॥” ॥३॥
त्रयाणामपि दोषाणां यथास्वं लक्षणं तु ॥४॥
विशतित्व्यापदो योनेर्निर्दिष्टा रोगसंग्रहे।
मिथ्याचारेण या स्त्रीणां प्रदुष्टेनावर्त्तवेन च ॥५॥
जायन्ते वीजदोषाच्च देवाच्च शृणु ताः पृथक्।
वातादि तीनों दोषों के उनके अपने अपने लक्षणों के अनुसार वीस योनिरोग रोगसंग्रह में कहे हैं। जो कि स्त्रियों के मिथ्या आचार से, दूषित आर्य से, वीज दोष से और देव
(प्राक्तन कर्म) के कारण उत्पन्न होते हैं उनको पृथक्-पृथक् सुनो।
वि० मन्तव्य—इन वीस प्रकार की व्यापदों के चार कारण हैं—१ नारी का मिथ्या आचार अर्थात् प्रकृति विरुद्ध आहार एवं विहार। २—आर्यव अर्थात् रजस की विकृति—जैसा सु० शा० अ० २ सू० ५ में बतलाया गया है। ३—वीज दोष माता पिता के शोणित एवं शुक्र की विकृति—जैसे कुष्ठ, अर्श, प्रमेह एवं स्यौल्य आदि विकार सहज होते हैं वैसे योनिव्यापद् भी होती है—प्रायः—अत्यानन्दा योनिव्यापद्वाली माता की पुत्री भी अत्यानन्दा से पीड़ित देखी जाती है। ४—देवात्—देवयोग से—उक्त तीनों कारण न होने पर भी किसी को योनिव्यापद् हो जाती है ॥४,५॥
उदावर्त्ता तथा बन्ध्या विप्लुता च परिप्लुता ॥६॥
वातला चेति वातोत्थाः पिचोत्थाः रुधिरक्षरा।
वामिनो ऋसिनी चापि पुत्रधनी पिचला च या ॥७॥
अत्यानन्दा च या योनिः कर्णिनी चरणाद्वयम्।
श्लेष्मला च कफाञ्चैषा षण्डाख्या फलिनी तथा ॥८॥
महती सूचीवक्त्रा च सर्वजेति त्रिदोषजा।
वातज पाँच योनि रोग—उदावर्त्ता, बन्ध्या, विप्लुता, परिप्लुता और वातला। पिचज पाँच—रुधिरक्षरा, वामिनी, ऋसिनी, पुत्रधनी, पिचला। कफज पाँच—अत्यानन्दा, कर्णिनी, अचरणा, अतिचरणा, श्लेष्मला। षड्पातज पाँच—षण्डी, फलिनी, महती, सूचीवक्त्रा, सर्वजा ॥६-८॥
सफेनिलमुदावर्त्ता रजः कृच्छ्रेण मुखति ॥९॥
बन्ध्या नष्टार्तर्वा विद्याद्विप्लुतां नित्यवेदनाम्।
परिप्लुतायां भवति ग्राम्यधर्मं रुजा भ्रुगम् ॥१०॥
वातला कर्कशा स्तब्धा अल्लिन्स्तोदपीडिता।
चतसृष्वपि चाद्यासु भवन्त्यनिलवेदनाः ॥११॥
उदावर्त्ता योनि में क्षाण के साथ रज कठिनाई से आता है। बन्ध्या में आर्यव नष्ट होता है, विप्लुता में नित्य वेदना रहती है। परिप्लुता में—सहवास करते समय अतिशय पीड़ा होती है। वातला योनि-कर्कश, स्तब्ध (कठोर), शूल एवं दुर्भाने की वेदनावाली होती है। प्रथम चारों योनियों में वात की पीड़ायें रहती हैं ॥९-११॥
सदाहं प्रक्षरत्यस्वं यस्यां सा लोहितक्षरा।
सवातमुद्गिरिरेद्वीजं वामिनी रजसा युतम् ॥१२॥
प्रऋसिनीं स्यन्दते तु क्षोभिता दुःप्रसूश्च या।
स्थितं स्थितं हन्ति गर्भं पुत्रधनी रक्तसंखवात् ॥१३॥
अत्यर्थं पिचला योनिर्दाहपाकवरान्विता।
चतसृष्वपि चाद्यासु पिचलिल्लिङ्गोच्छयो भवेत् ॥१४॥
जिस योनि में से निरन्तर दाह के साथ थोड़ा थोड़ा रक्त बहता रहता है, वह लोहितक्षरा है। वामिनी योनि
अ० ३८]
उत्तरतन्त्रम्
६७१
बीज को (शुक्कीट को) वायु के साथ रजःकाल में बाहर कर देती है। प्रसंखिनी-योनि में विश्लोभ होने पर (सहवास में) बहुत खाव होता है, और कटिनाई से प्रसव होता है। पुत्रधनी योनि में—रक्त के खाव होने से गर्भ रह कर नष्ट हो जाता है। पिच्छा योनि में अतिशय दाह, पाक, ज्वर रहता है। प्रथम चार योनि रोगों में पिच्छा के लक्षणों की अधिकता रहती है।
वि० मन्तव्य—प्रसंखिनी—इस योनि व्यापद में गर्भाशय खिसककर नीचे आ जाता है। इसे (धरा गिरना) कहते हैं। धरा गर्भाशय का नाम है ॥१२-१४॥
अत्यानन्दा न सन्तोषं ग्राम्यधर्मण गच्छति।
कर्णिन्यां कर्णिका योनीं श्लेष्मासूग्ध्यां प्रजायते ॥१५॥
मैथुनेऽचरणा पूर्वं पुरुषादतिरिच्यते।
बहुशश्चातिचरणाद्वन्या बीजं न विन्दति ॥१६॥
श्लेष्मला पिच्छला योनिः कण्डयुक्ताऽतिगीतला।
चतसूख्यपि चाद्यासु श्लेष्मलिक्लोच्छित्तिर्भवेत् ॥१७॥
अत्यानन्दायोनि में—मैथुन से कभी तृप्ति नहीं होती।
कर्णिनीयोनि में कफ रक्त के कारण योनि में कर्णिका उत्पन्न हो जाती है। अचरणायोनि में मैथुन क्रिया में—पुरुष से पूर्व ही खाव हो जाता है। अतिचरणायोनि—बहुत मैथुन करने से बीज (गर्भ) को ग्रहण नहीं करती (यथा-वेश्याओं में) श्लेष्मला योनि—पिच्छल, कण्डयुक्त और अति शीतल रहती है (प्रायः मोटी-फैट वाली औरतों में ऐसा दीखता है)। प्रथम चारों में कफ के लक्षणों की अधिकता रहती है।
वि० मन्तव्य—बहुशश्चाति चरणा-अतिचरणा नामक योनि व्यापद में—बहुत बार खलन हो जाता है और इन अचरणा तथा अतिचरणा में गर्भाधान नहीं होता। योनि खाव वस्तुतः नारी का शुक्र है और शुक्र कफ वर्ग का पदार्थ है अतः कफजनित योनि व्यापद में ऐसा होता है। अत्यानन्दा नामक योनि व्यापद का भी यही कारण है और कर्णिनी तथा श्लेष्मला का भी यही कारण है। इन रोगों से पीड़ित नारियाँ इन रोगों के कारण बहुपुरुष गामिनी हो जाती हैं, इस दशा में सदुपदेश के साथ २ उचित चिकित्सा भी होनी चाहिये। “बहुशश्चाति चरणाद्वन्या बीजं न विन्दति” के स्थान पर “बहुशश्चाति चरणा तयोर्बीजं न तिष्ठति” पाठान्तर है, दे० डल्लन टीका। इसी पाठान्तर को भावमिश्र तथा माधवाचार्य ने उत्तम समझा है। अतः अपने ग्रन्थों में इसी पाठ को उद्धृत किया है ॥
वक्तव्य—अचरणा-पुरुषात् पूर्वमतिरिच्यते-अत्यर्थ कण्डूयते। वात्स्यायन ने स्त्री पुरुष की प्रकृति का भेद किया है—यथा पुरुष में काम की अधिकता प्रथम अधिक होती है, फिर उत्तरोत्तर घटती जाती है, स्त्री में इससे विपरीत रहता है,
उनमें पहले कम रहती है फिर उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है। उनके मानसिक भाव पुरुष से सब अवस्थाओं में विपरीत हैं, यथा: “स्त्रियः कामयंते, न तु प्राथयंते,” स्त्री पुरुष की कामना करती है, परन्तु प्रेम या विवाह का प्रस्ताव पेश नहीं करती, पुरुष चाहना भी करता है और प्रेम या विवाह की मंगनी भी करता है। इसी प्रकार मैथुन में होता है। इसी से कहा है कि न स्त्रीपुरुषवदेवभावमधिगच्छति। (२) दूसरा पक्ष चिरवेने नायके स्त्रियोंऽनुरज्यन्ते। शीघ्रवेगस्य भावमनासाद्यावसानेऽभ्यस्यिन्यो भवन्ति। तत्सर्वभावप्राप्तेऽप्राप्तिश्च लक्षणम् ॥ सातत्यात् युवतिरारम्भात्प्रभृति भावमधिगच्छति, पुरुषःपुनरन्त एव। “सुरतान्ते सुखं पुष्पां स्त्रीणां तु सततं सुखम्। यातुक्षयनिमित्ता च विरामाच्चोपजायते ॥” वात्स्यायन कामसूत्र ॥१५-१७॥
अनार्तवस्तना षण्डी खरस्पर्शा च मैथुने।
अतिकायगृहीतायास्तसृण्याः फलिन्तो भवेत् ॥१८॥
विद्युताऽतिमहायोनिः सूचीवक्त्राऽतिसंबृता।
सर्वलिङ्गसंमुखानां सर्वदोषप्रकोपजा ॥१९॥
चतसूख्यपि चाद्यासु सर्वलिङ्गोच्छित्तिर्भवेत्।
पश्चासाध्या भवन्तीमा योतयः सर्वदोषजाः ॥२०॥
षण्डी योनि में न तो आर्तव आता है, और न स्तन ही उभरे होते हैं, मैथुन में कठोर स्पर्शवाली होती है। अति लम्बे या पुष्ट मेहनवाले पुरुष के साथ छोटी उमर की स्त्री के मैथुन करने से फलिनी योनि होती है। अतिविद्युता को ही महायोनि कहते हैं, सूचिवक्त्रा योनि अतिशय सूक्ष्म मुखवाली होती है (इनमें योनि पटल-योनिविवर पर रहता है, उसका छेद बहुत छोटा या सदा बन्द होता है)। सन्निपातज योनि में—सब दोषों के लक्षण रहते हैं। प्रथम चारों में तीनों दोषों के लक्षण अधिकता से रहते हैं। सन्निपातज ये पांचों योनिरोग असाध्य हैं।
वक्तव्य—वात्स्यायन में इसी से कहा है—न प्रसन्न किंचिदाचरेत्। “इसी विचार से कामशास्त्र से श्यादि भेद पुरुषों के एवं स्त्रियों के किये हैं। जिससे मेहन के दोषजन्य, या योनि-दोषजन्य रोग उत्पन्न न हों। योनि विवर पर योनिछद्द कई कई बार बिल्कुल बन्द ही रहता है, या इसका मुख तंग रहता है, जिससे आर्तव नहीं आता—उस समय चिकित्सक इसको काट देता है”।
वि० मन्तव्य—षण्डी नामक योनिव्यापद में आर्तव नहीं होता। फलतः उससे पीड़ित नारी वन्या होती है, क्योंकि भग-
१ शशो वृषोऽख इति लिंगतो नायक विशेषः।
नायिका पुनः मृगी बहवा हस्तिनी चेति ॥
स्त्रीणां साधनमार्गोऽपि तद्वदेव प्रभिद्यते।
आयामपरिणाहृम्यां मृगदोनां शशादिवत् ॥
६७२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० २८ ]
वान् पुनर्वसु के कथनानुसार इस व्यापद् में बीज (माता पिता के शोणित एवं शुक्र) के दोष से गर्भ निर्माण काल में ही वायु द्वारा गर्भाशय का उपघात हो जाता है, और यह नारी नर से द्रेप रखती है, अर्थात् इसे मैथुन की अभिलाषा ही नहीं होती और इसके स्तन अपुष्ट होते हैं अथवा उभरते ही नहीं हैं, अर्थात् सर्वतो भाव से यह नारी अपूर्व नारी होती है। च० शा० स्था अ० ४ में भी यही कहा गया है। सच यह है, कि गर्भाशय तथा स्तन ही नारी के प्रधान-मुख्य लक्षण हैं, यह दोनों अवयव जितने अधिक पुष्ट होते हैं, उतने ही उत्तम नारीत्व के सूचक हैं। फलिनी—डरलना चार्य ने लिखा है, कि कुछ आचार्य फलिनी के स्थान में “अफलिनी” भी पढ़ते हैं, और व्याख्या करते हैं, अप्रजा अर्थात् इसमें गर्भाधान ही नहीं होता है। महायोगि—इस व्यापद् में गर्भाशय का मुख सर्वदा अत्यन्त विद्युत अर्थात् खुला ही रहता है, पुनर्वसु के कथनानुसार गर्भाशय पर मांस अधिक सन्नित हो जाता है, सर्वदा वेदना होती है, रूक्ष एवं क्षागुत्त रजः स्नाव होता है, तथा पोर २ एवं वंक्षण में शूल होता रहता है। देखिये च० चि० अ० ३०। सूचीवक्त्रा—इस व्यापद् में गर्भाशय का मुख अत्यन्त संवृत—बन्द रहता है। फलतः उसमें शुक्र का प्रवेश ही नहीं होता। इस व्यापद् को योनि छद कहना उचित नहीं प्रतीत होता। सर्वदोष प्रकोपजा—इस व्यापद् में पुनर्वसु के कथनानुसार 'धा भवेत् दाहशलात्ता श्वेतपिच्छलवाहिनी।
अर्थात् पित्त से दाह, वायु से शूल और कफ से श्वेत एवं पिच्छल स्नाव होता है। च० चि० अ० ३० में योनि व्यापदों के साथ २ शुक्र एवं शुक्रवह स्तोत्रों की विकृतियों का विशद वर्णन किया गया है ॥१८-२०॥
प्रतिदोषं तु साध्यासु स्नेहादिक्रम इष्यते। दद्यादुत्तरवस्तीश्च विशेषेण यथोदिताम् ॥२१॥
साध्य योनिरोगों में दोष के अनुसार स्नेहन आदि चिकित्सा करे। वातादि भेद से कहीं हुई उत्तर वस्तियों को विशेष रूप में बरते। (जो स्नेह जिस दोष से विपरीत हो, उससे स्नेहन करके वमनादि करे) ॥२१॥
कर्कशां शीतलां स्तब्धासल्पस्पर्शां च मैथुने। कुम्भीस्वेदौरुपचरेत् सान्नपौदकसंयुतैः ॥२२॥ मधुरौषधसंयुक्ताम् वेगवाराश्च योनिषु। निक्षिपेद्धारयेचापि पिचुतेल्लमतन्द्रितः ॥२३॥ धावनानि च पध्यानि कुर्वीतापूरणानि च।
कर्कश, शीतल, कठिन, मैथुन के स्पर्शसुख का पूर्ण अनुभव न करनेवाली योनि में—आन्नमांस और औदक मांस (कङ्कूप-मछली आदि का मांस) के साथ कुम्भीस्वेद देवे।
काकोत्त्यादि मधुर औषधियों से मिला कुडित मांस योनि में रखले। वातहर औषधियों से प्रक्षालन करे, इनसे भीगे वस्त्र योनि में रखले ॥२२,२३॥
ओषचोषान्वितासूक्तं कुर्याच्छीतं विधि भिषक् ॥२४॥ ओष—चोष (जलन, दाह) संयुक्त योनि में वैद्य कहीं हुई शीतल चिकित्सा (रक्त-पित्त, नाशक) बरते ॥२४॥ दुर्गन्धां पिच्छलां चापि चूर्णैः पञ्चकषायजैः। पूरयेद्वाजदुग्धादिकषायैश्चापि धावनम् ॥२५॥ दुर्गन्धित एवं पिच्छलयोनि में बरगद-पीपल-पिल्लवन आदि कषाय वृक्षों का चूर्ण भरे, और आरग्वधादि गन्ध के कषाय से योनि का प्रक्षालन करे ॥२५॥
योन्यां तु पूयत्वाविष्यां शोधनद्रव्यसंभूतैः। सगोमूत्रैः सलवणैः शोधनं हितमिष्यते ॥२६॥ पूयत्वाविष्योनि में मिश्रकोक्त शोधनद्रव्यों से, गोमूत्र से—थोड़ा नमक मिलाकर शोधन करना चाहिये ॥२६॥
बृहतीफलकलकस्य द्विहरिद्रायुतस्य च। कण्डूमतीमल्पस्पर्शां पूरयेद्घूपयेत्तथा ॥२७॥ वर्ति प्रदघात् कर्णिन्यां शोधनद्रव्यसंभूताम् ॥ प्रस्रसिनीं घृताभ्यर्त्तां क्षीरस्विन्नां प्रवेश्येत् ॥२८॥ पिधाय वेशवारेण ततो बन्धं समाचरेत्। प्रतिदोषं विदध्याच्च सुरारिष्टासवान् भिषक् ॥२९॥ प्रातः प्रातनिषेवेत् रसोत्पादुद्वृतं रसम्। क्षीरमांसरसप्रायमाहारं विदधीत च ॥३०॥
कण्डुयुक्त, अल्पस्पर्शावाली—योनि में बड़ी कठेरी के फल का कलक, हरदी, दारुहरदी इनसे योनि में धूप देवे, और इनसे योनि को भरे। कर्णिनी में शोधन द्रव्यों से बनी वर्ति योनि में रखले। प्रस्रसिनी (जो योनि बाहर आ जाती है) योनि में घी से अश्रंग करके, दूध से स्वेदन देकर इसे अन्दर प्रविष्ट करे, वेशवार (कुडित मांस) से बन्द करके, पट्टी बाँध देवे। दोष के अनुकूल-सुरा, आसव, अरिष्टों को बरते। प्रतिदिन प्रातःकाल लहसुन का निकाला रस पीये। दूध, मांसरसवाले अन्न का सेवन करे ॥२७-३०॥
शुक्रान्तवाद्यो दोषाः स्तनरोगाश्च कीर्तिताः। कल्लेवस्थानानि मूढस्य गर्भस्य विधिरेव च ॥३१॥ गर्भिणीप्रतिरोगेषु चिकित्सा चाभ्युदाहता। सर्वथा तां प्रयुञ्जीत योनिव्यापत्सु बुद्धिमान्। अपप्रजातारोगाश्च चिकित्सेदुत्तराद्विषक् ॥३२॥ शुक्र-आतंवा आदि दोष, स्तनरोग, जो कहे हैं, कल्लेव के कारण, मूढगर्भ के कारण और इनकी चिकित्सा, गर्भवती की मासानुमासिक एवं रक्तस्त्राव
अ० ३६ ]
८२
उत्तरतन्त्रम्
६७३
की चिकित्सा जो कही है, इन सबको योनिध्याप्त रोगों में बुझिमान् बरते। अकालप्रसूता के ज्वर आदि रोगों को वैद्य उत्तरतंत्र विधिसे चिकित्सा करे ॥३२॥
इति श्री सुश्रुतसंहितायासुत्तरतन्त्रान्तर्गते कुमारतन्त्रे योनि- व्यापत्प्रतिषेधो नाम (द्वादशोऽध्यायः, आदितः)
अष्टविंशतिसोऽध्यायः ॥३३॥
उत्तरतन्त्रे द्वितीयं कौमारतन्त्रं समाप्तम् ॥३४॥
एकोनचत्वारिंशत्सोऽध्यायः
अथातो ज्वरप्रतिषेधो व्याख्यास्यासमः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे ज्वर प्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे— जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—ज्वर प्रत्यात्मिक लिंगं सन्तापी देहमानसः। ज्वरेणाऽऽविशता भूतं न हि किञ्चित् न तप्यते। च० चि०।
अर्थात्—ज्वर का आत्मिक स्वीय लक्षण है देह एवं मनस का सन्ताप—स्वभाविक सन्ताप से शरीर में अधिक सन्ताप उण्णता हो जाना—क्योंकि प्राणी में ज्वर का आवेश-प्रवेश हो जाने पर कोई भी भाव तप्त हुए बिना नहीं रहता। तात्पर्य यह है कि समस्त शरीर पर ज्वर का प्रभाव होता है। अन्य सब रोगों का शरीर के भिन्न अवयवों पर ही प्रभाव पड़ता है। देह का सन्ताप स्पर्श से एवं थर्मामीटर से जाना जाता है और मनस का सन्ताप—वैचित्य अर्थात् ग्लानिः मनस्सन्तापलक्षणम्, और-इन्द्रियाणां च वैकृत्यं ज्ञेयं सन्तापलक्षणम् ॥१,२॥
येनामृतसर्पा मध्याहुदुधुत् पूर्वजन्मनि।
यतोऽमरत्वं संप्राप्नोद्भिद्भाच्छिद्विचेश्चरात् ॥३॥
शिक्ष्यास्तं देवमासीनं पप्रच्छुः सुश्रुतादयः।
व्रणस्योपद्रवाः प्रोक्ता व्रणिनामप्यतः परम् ॥४॥
समासाद् व्यासतश्चैव ब्रूहि नो भिषजांवर !।
जिसने पूर्वजन्म में समुद्र में से अमृत को निकाला, जिस धन्वन्तरि के कारण देवताओं ने अमरत्व प्राप्त किया, जैसे हुए उस देव धन्वन्तरि भगवान् से सुश्रुत आदि ने पूछा, आपने व्रण के उपद्रव तथा व्रणवाले पुरुष के उपद्रव संक्षेप में पहले कह दिये हैं, हे वैद्यों में श्रेष्ठ ! आप उनको विस्तार से कहो।
वक्तव्य—व्रण के उपद्रव-वेदना, वर्ण स्नाव आदि। व्रणवाले पुरुष के उपद्रव—
“विषर्पः पक्षपातश्च सिरास्तम्भोऽपतानकः।
मोहोन्मादो व्रणरुजा ज्वरस्तुष्णा हनुग्रहः ॥
कासरुच्छिदिरतीसारो हिक्का श्वासः सवेपथुः।
पोड्योपद्रवाः प्रोक्ताः व्रणिनां व्रणचित्तकैः” ॥३,४॥
उपद्रवेण जुष्टस्य व्रणः कृच्छ्रणे सिध्यति ॥५॥
उपद्रवास्तु व्रणिनः कृच्छ्रुसाध्याः प्रकीर्तिताः।
प्रक्षीणवलमांसस्य शेषधातुपरिक्षयान् ॥६॥
तस्मादुपद्रवान् कृत्स्नान् ब्रूहि नः सचिकित्सितान्।
सर्वकायचिकित्सासु ये दृष्टाः परमविधिः ॥७॥
उपद्रव से युक्त रोगों का व्रण कठिनाई से अच्छा होता है, व्रणरोगी के उपद्रव कष्टसाध्य होते हैं, क्योंकि व्रणरोगी का बल (उत्साह) और मांस क्षीण हो जाता है, मेद आदि दूसरे धातु भी क्षीण हो जाते हैं। इसलिये आप सब उपद्रवों को चिकित्सा के साथ हमको कहिये, जिन उपद्रवों को सम्पूर्ण काय-चिकित्सा में परमर्षि (भारद्वाज या आत्रेय) ने देखा है—कहा है।
वि० मन्तव्य—ईसवी सन् १६३६-३७ की बात है श्री दुर्गा-प्रसाद जी दी० ए० कलाविशारद श्री अर्जुन आयुर्वेद विद्यालय काशी के समापति थे। मैं कार्यवश प्रायः उनके निवास स्थान (लकडा) पर जाया-आया करता था, विद्यालय के कार्यों के अतिरिक्त अन्य विषयों पर भी वात्साल्य हुआ करता था। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि वैद्यजन ज्वर को मूल व्याधि मानते हैं, परन्तु अमेरिका के एक विद्वान् ने सिद्ध कर दिया है कि ज्वर कोई मूल व्याधि नहीं है, अपितु—किसी न किसी अन्य मूल व्याधि का लक्षण है। मैंने उनसे निवेदन किया कि यह कोई नई वस्तु नहीं है। प्राचीन शल्य-शालाक्य तन्त्रों में भी ज्वर को उपद्रव माना गया है यह सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए और तत्काल उन्होंने अपने पुस्तकालय से सुश्रुत निकालकर मेरे सामने रख दिया, मैंने यही पाठ उनको सुनाए और वे चकित होकर कहने लगे कि वह सब तो सुश्रुत के इन्हीं पाठों का अनुवाद या भावार्थ प्रतीत होता है। अस्तु, बाबू दुर्गाप्रसाद जी खत्री अपने समय के बहुत बड़े विद्वान् माने जाते थे। काशीस्थ भारत माता के मन्दिर में जो कुछ भी है वह सब उनकी ही कलाकौशल की देन है। अस्तु तात्पर्य यह है कि—काय चिकित्सा के ग्रन्थों में ज्वर आदि को मूल व्याधियाँ माना गया है और आयुर्वेद के अन्य अङ्गों में—शल्य तथा शालाक्य नामक अंगों में उसको उपद्रव माना गया है और उपद्रव का लक्षण काय चिकित्सा (चरक संहिता) में—उपद्रवस्तु खलु रोगोत्तरकालजो रोगाश्रयो रोग एव स्थूलोऽणुरा रोगात् पश्चात् जायते इति उपद्रवसंज्ञः (च० चि० अ० २१-४०) तथा शल्यतन्त्र (सुश्रुत) में—औपसर्गिको नाम यः पूर्वोत्पन्नं व्याधि जघन्यकालजातो व्याधिः उपसृजति स तन्मूल एव उपद्रवसंज्ञः (सु० सू० अ० ३५।१८)। दोनों में एक समान माना गया है। उपसर्ग का पर्याय ही उपद्रव है ॥५-७॥
तेषां तद्बचनं श्रत्वा प्राज्ञवोद्धिभषजांवरः।
ज्वरमादौ प्रवक्ष्यामि स रोगान्नीकराट् स्मृतः ॥८॥
रुद्रकोपाग्निंसंभूतः सर्वभूतप्रतापनः।
तैस्तैर्नामभिरन्येषां सत्त्वानां परिकीर्त्यते ॥९॥
सुश्रुत आदि के इन वचनों को सुनकर वैद्यों में श्रेष्ठ धन्व-