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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ३७ ]

उत्तरतन्त्रम्

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वि० मन्तव्य—गुह अर्थात् कर्तिकेय की कथा शिवपुराण तथा कुमारसम्भव नामक काव्य में देखिये । संक्षेपतः यह शिव के पुत्र थे और इन्होंने तारकासुर का वध किया था । तारकासुर का वध करने के लिये ही भगवान् शिव ने कार्तिकेय को उत्पन्न किया था ॥४॥

श्रीविग्रहा प्रहा ये तु नानारूपा मयेरिताः ।

गङ्गोमाङ्गुत्तिकानां ते भागा राजसतामसाः ॥५॥

श्री शरीरवाले जो ये नानाप्रकार के ग्रह मैंने कहे हैं, जिनकी गंगा, पार्वती, और कृत्तिका ने बनाया है, ये ग्रह राजस एवं तामस हैं ( रजतमोष्य हैं ) ॥५॥

नेगमेपस्तु पार्वत्या सृष्टो भेषाननो ग्रहः ।

कुमारधारी देवस्य गुहस्यात्मसमः सखा ॥६॥

नेगमेष ग्रह को पार्वती ने बनाया है, इसका मुख मेष ( मेड़ ) के समान है, कुमार की रक्षा करनेवाला गुह ( कार्तिकेय ) देव का अभिन्न मित्र है ॥६॥

स्कन्दोपरस्मारसंज्ञो यः सोऽग्निनाऽग्निनसमद्यतिः ।

स च स्कन्दसखा नाम विशाख इति चाच्यते ॥७॥

स्कन्दोपरस्मारग्रह अग्नि से उत्पन्न हुआ है, इसकी बुद्धि अग्नि के समान है, यह स्कन्द का मित्र है, इसका दूसरा नाम विशाख है ॥७॥

स्कन्दः सृष्टो भगवता देवेन त्रिपुरारिणा ।

विभर्ति चापरां सञ्जां कुमार इति स ग्रहः ॥८॥

रुद्रदेवता ने स्कन्द को उत्पन्न किया है, इसी ग्रह को 'कुमार' इस नाम से भी कहते हैं ॥८॥

बाललोलाधरो योऽयं देवो रुद्राग्निनसम्भवः ।

मिथ्याचारेषु भगवान् स्वयं नैष प्रवतते ॥९॥

बालकों की लीला को धारण करनेवाला, रुद्र एवं अग्नि से उत्पन्न यह देव, मिथ्या आचरणों में स्वयं प्रवृत्त नहीं होता, ( भगवान् होने से ) अपितु इसके नोकर प्रविष्ट होते हैं । कहा भी है—

“तेषां ग्रहाणां परिचारका ये कोटीसहस्रायुतपद्मसंख्याः ।

असुरवसामसंभुजः सुभीमा निशाविहाराश्च तमाविशन्ति ॥” यु० अ० ६०।२२।

वि० मन्तव्य—तात्पर्य यह है कि कुमार अर्थात् कार्तिकेय स्वयं बालकों में आवेश नहीं करता अपितु उसके स्कन्द आदि अनुचर ही आवेश करते हैं ॥९॥

कुमारः स्कन्दसामान्यादत्र केचिदपण्डिताः ।

गृह्णातीत्यल्पविज्ञानां वृवते देहचिन्तकाः ॥१०॥

कार्तिकेय स्कन्दग्रह के नाम की समानता से बालक को आक्रान्त करते हैं, ऐसा कई अपण्डित, देहचिन्तक वैद्य कहते हैं, वे अल्प ज्ञानवाले और मूर्ख हैं ॥१०॥

ततो भगवति स्कन्दे सुरसेनापतौ कृते ।

उपतस्थुर्ग्रहाः सर्वे दीप्तशक्तिधरं गुहम् ॥११॥

कृत्तुः प्राङ्गुल्यश्चैनं वृत्तिं नः संविधत्स्व वै ।

तेषामर्थं ततः स्कन्दः शिवं देवमचोदयत् ॥१२॥

ततो ग्रहास्तानुवाच भगवान् भगनेत्रहत् ।

तिर्यग्योनि मानुषं च देवं च त्रितयं जगत् ॥१३॥

परस्परोपकारेण वर्तते धार्यतेऽपि च ।

देवां मनुष्यान् प्रीणन्ति तैर्यग्योनीस्तथैव च ॥१४॥

वर्तमानैर्यथाकालं शीतवर्षोष्णमारुतेः ।

इव्याङ्गलिनमस्कारजपहोमव्रतादिभिः ॥१५॥

नराः सम्यक् प्रयुक्तैश्च प्रीणन्ति त्रिदिनेऽस्वरात् ।

भागधेयं विभक्तं च शेषं किञ्चित् विद्यते ॥१६॥

तद्युष्माकं शुभा वृत्तिबोलेऽथैव भविष्यति ।

कुलेषु येषु नेत्रयन्ते देवाः पितर एव च ॥१७॥

ब्राह्मणाः साधवश्चैव गुरवोऽतिथयस्तथा ।

निवृत्ताचारशीलेषु परपाकोपजीविषु ॥१८॥

उत्सन्नबलिभिर्चोषु भिन्नकास्योपभोजिषु ।

गृहेषु तेषु ये बालास्तान् गृह्णीध्वमशाङ्किताः ॥१९॥

तत्र वो विपुला वृत्तिः पूजा चैव भविष्यति ।

एवं ग्रहाः समुत्पन्ना बालान् गृह्णन्ति चाप्यतः ॥२०॥

ग्रहोपसृष्टा बालास्तु दुःखिकित्यतमा मताः ।

फिर देवताओं के सेनापति बना देने पर भगवान् स्कन्द, चमकती हुई शक्ति को धारण करनेवाले गुह के पास पहुँचकर सब ग्रहोंने हाथ जोड़कर कहा कि, आप हमारी बुद्धि (जीविका) का प्रबन्ध करो । इनके लिये तब स्कन्द ने महादेव जी को कहा—भगनेत्र का नाश करनेवाले भगवान् शम्भु ने तब उन ग्रहों को कहा कि—तिर्यग्योनि ( पश्चि, पशु आदि ), मानुष, और देव यह तीनों प्रकार का जगत् एक दूसरे के उपकार से धारण किया जाता है, और स्थिर रहता है । देवता मनुष्यों का और तिर्यग योनि का पोषण करते हैं, यथा समय पर शीत, वर्षा, ग्रीष्म और वायु से इस जगत् की रक्षा करते हैं । मनुष्य यज्ञ, अंजलि नमस्कार ( हाथ जोड़ना ), जप, होम, व्रत आदि को भलीप्रकार करके देवताओं को प्रसन्न करते हैं । इस अंश समूह को देवता, मनुष्य तिर्यग्योनि ने आपस में बाँट लिया है, इस लिये इससे तो कुछ बचना नहीं । इसलिये तुम्हारी उत्तम जीविका बालकों में ही होगी । उनमें भी जित कुलों में देवताओं और पितरों के लिये यज्ञ नहीं होता, ब्राह्मण, साधु, (सज्जन पुरुष), गुरु, एवं अतिथियों की जहाँ पूजा नहीं होती, आचार-पवित्रता जहाँ नष्ट हो गई, दूसरे के ऊपर जीनेवाले, जहाँ बलि एवं मिश्रा नष्ट हो गई हो, दूते-पात्रों में भोजन करनेवाले, घरों में जो बालक हों उनको तुम बिना शंका के आक्रान्त करो । वहाँ तुमको प्रचुर जीविका मिलेगी और तुम्हारी पूजा भी होगी । इस प्रकार से उत्पन्न ग्रह बालकों को पीड़ित करते हैं, ग्रह से आक्रान्त बच्चे-कष्ट साध्य माने गये हैं ॥