सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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ट सश्रतसं हिता [ ० २९१५ |
देवे। संतर से पवित्र कयि जरसे बच्चेको गोशारामेंदी सरसो, वच, हींग, कूट, अक्षत (जो), भिलावा, अजवायन्
स्नान कराये }} इनसे बच्चे को धूप देवे ।॥७॥! ।
वक्तव्य पुरोडाश-अष्टाकपालः पिष्टमयः कपाठोपरिपक्रः मकरोटकगृध्राणां पुरोषाणि नवग्रह ।
` तृणाग्नि 11” मन से- पवित्रगायत्री मंत्र से अभिमन्त्रित जल धूपः सुपे जने कार्यो वारस्य हितमिच्छता ८ । से स्नान कराये । गोष्ठ का अथं-जहाँ गाये वेठकर मध्या मं बन्दर, उल्ल, गीष इनकी विष्ठा का अक्षत (जौ) के साथ
जुगाढी या आराम करती दै--उस स्थान से हे ॥६-८ ` नवग्रह मे वच्च को रात्रि मे धूप देवे |
अलङ्कृता रूपवती सुभगा कामरूपिणी । तिखतण्ड्टकं माल्यं भद्यांश्च विविधानपि ।
गोष्ठमध्याख्यरता पातु त्वां युखमण्डिका ॥&! ङमारपिदमेषाय वृक्षमूठे निवेदयेत् ॥€॥
| रक्षामन्र--अटेङककत, रूपवती सौभाग्यवती, कामरूपी तिक, तण्डुल, माला (पुष्प), नाना प्रकारके भ्रच्यपद्ाथाँ
गोशाला के बीच मे रहनेवारी मुखमण्डिका देवी तेरी रक्षा | की कुमारपिवूमेष रह के च्य दृ्षमूर म बलि देवे ॥६॥
करे |! ६॥ अधस्ताद्रटवृक्षस्य स्नपनं चोपदिङ्यते। `
इति श्रीयुश्टतसहितायायततरतन्तरान्तगते कुमारतन््र बर न्यभ्रोधवृ्तेष तिथौ पष्ठयां निवेदयेत् ॥१०।
मुखमण्डिकाप्रतिषेघौ नाम (नवमोऽध्यायः) अजाननश्चरखाक्षिभ्रः कामरूपी सहायाः! = |
आदितः) पञ्च्चिशत्तमोऽध्यायः ।[३५॥ बार बारुपिता देवो नगमेषोऽभिरश्चतु ॥ *९॥
८ बस्चे को बरगद के बृक्ष के नीचे स्नान कराये] बरगद
५ द के वरक्षोंमे छठी तिथिमें बलि देवे। रक्चामन्र-बकरीके .
परूनिशत्तमोऽध्यायः समान मुख को, चंचल ओंख एवं भ्रुवाखा, कामरूप, बड़े यश- ..
अथातो नेगमेषप्रतिषेधं ्यास्यास्यामः॥९॥ वाला, बाककों का पिता नेगमेष देव, बालक की रक्षा करे॥ `
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥ ` | इति भीसुश्रतसंहितायाय॒त्तसतन्तरान्तगंते कुमारतन्त्रे नेग-
. अव इसके आगे नेगमेषप्रतिषेध का. व्याख्यान करैगे-- मेषप्रतिषेषो नाम (दशमोऽध्यायः आदितः) ५
। जेसा.कि मगवान् षन्वन्तरि ने क्हाथा॥१,२| षटूतियोऽ्ष्यायः ॥३६॥ = ।
बिस्वाग्निमन्थपूतीकाः का स्युः परिषेचने। - ॥,
सुरा सबीजं धान्याम्छं परिषेके च शस्यते ॥३॥ | 9
प्रियङ्गुसरखानन्वाशतयुष्पाङ्टन्नटेः । सप्तबरिशत्तमोश्ध्यायः
पचेत्तेरं सगोमूत्र द्धमस्स्वम्डकालिजकेः।॥४॥ | „` वच्चे को स्नान कराने के ठ्यि बिल्व, अग्निमन्थ, करंज यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥ ष ~ का कषाय बरते । सुरा, सुराबीज. (किण्व) ओर कांजी से परिष्क अब इसके आगे ग्रहोत्पत्ति अध्याय का व्याख्यान कर्ण. ~
करना उत्तम दै ।. प्रियंगु, चीड _(बिरोजा);, सारिवा, सोफ, | जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
केवड़ी मोथा इनके कल्क से, गोमू, दही, मस्तु, विजोरे का वि० मन्तव्य- इस अध्याय मँ भूतविद्या के अनुखार शद ज
रस, काजी इनमे ते काये (गोमूत्र आदि तैकके बराबरढे) ॥ | कौ उद्यत्ति आदि कावणन दहै ॥१२॥ = ~ _ ~ पञ्चमूखदरयक्वाये क्षीरे मधुरकेषु च| ` |. नव खकन्दादयः प्रोक्ताः वाङानां य इमे रहः
पचेदुशतं च मेधावी खजृरीमस्तकेऽपि वा ॥५॥ श्रीमन्तो दिग्यवपुषो नारीपुरुष विग्रहाः ॥२॥ ५ दशमूल का क्वाय, दूष, इनमे काकोल्यादिगण ओर |. गाल्को के स्कन्दादि जो ये सौ अह के ह, ये सब ए4^ `
खजुर का शियोमाग इनके कल्क से बुद्धिमान् घृतपाक करे । | शाली. दिष्य तनु एवं खरी पुरुष शरीरबाछे दै ॥२॥ छ.
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अथातो अ्रदोत्पत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥९॥
< (द्यम् का क्वाय तीन माग, दुघ एक भाग ठेकर पकाये)॥५॥|| ` एते गुहस्य रक्षाथं कृत्तिकोमाग्निशूल्भिः।
. वचां वयःस्थां गोखोमीं जटिलां चापि धारयेत् | सटाः जरबणस्थस्य रक्षित स्यात्मतेजसा ॥|४॥
, उत्सादनं हितं चात्र स्छन्दापस्मारनाशनम् ।।&॥ |. शरबणरथ एवं अपनी शक्ति से `रश्चित होने पर ८
वच) गिलो (याहरढ़), दां ओर जटामाखीं इनको | (कार्तिकेय) की-रश्ा के च्यि कृत्तिका पावती -अग्नि ०
घारण कराय । स्वन्दापस्मार नाकं कटी ओषधियो से वन्वे | महादेव ने इन अरहो को उत्पन्नः क्रियाः । 4 द क को उत्सादन करे ॥६॥ प | | वक्तव्य --लिस प्रकार . अपनी शक्ति से रक्त £ 1
` || दुसरे देव रश्चा करते ह उसी. प्रकार कार्तिकेय कीय ८ क
क ९ “~ चूक ` । करते हं । क क क = „१ ^ । - ट भनि. क । + +त + "~ स ~ -" [न 44) ५) ४ = भकः = क 4
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सिद्धाथकवचादिङ्गषटं त्यर्मानं
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