सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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जिजोश्च स्नपनं कुयात् सबेगन्धोदकैः ञ्जभेः ॥2॥
कराखा पिङ्गा मुण्डा कषायाम्बरवासिनो । देवी बामिमं प्रीता सरक्षत्वन्धपूतना ।॥९॥
, क्री, कोचः शिम्बी (सेम), सारिवा इनको धारण कराये । कच्चा जर पका मांस, रक्तं इनको चौराहे पर ओर ` ममन धर के अन्दर बच्चे की रक्षाके ल्थि बलि देवे। शिश
। को ओर धानी को, एलादि सवंगन् द्रव्यो से स्नान कराये | । रक्षामन््-कयाल, पिंगर, मुण्ड, कषाय वख को -धारण करने. । वाली, अन्धपूतना देवी इस बाक्क की रक्षा करे ॥७।
इति श्रीसुश्ुतसं हितायायुत्तरतन्बान्तगते कुमारतन्त्रेऽन्धपूतनाप्रतिषेषो नाम (सप्तमोऽध्यायः आदितः )
त्रयस्िशोऽध्याय्ः ॥३३॥ <
चपुखिशत्तमोऽ्यायः . `
अथातः शीतपूतनाप्रतिषधं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥(२॥
अब इसके आगे शीतपूतनाप्रतिषेध का व्याख्यान करंगे--
लेखा क्रि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१.२॥
कपित्थं सुवहा निम्बा तथा बिल्वं प्रचीबलम् |
नन्दीं भर्छातकं चापि परिषके प्रयोजयेत् ॥३॥
` बस्तमूत्रं गवां मूत्रं मुस्तं च सुरदारु च ।
कुष्ठं च सवगन्धांश्च तेखाथेमवचारयेत् ॥४॥ रोहिणीसजंखदिरपलाशककुभत्व चः। निष्क्वाथ्य तस्मिन्निष्काये सक्षीरं विपचेदुधृतम् ॥५॥ ग्रध्ोद्ूकपुरीषाणि वस्तगन्धानहेसूवचः निम्बपत्राणि मधुकं धपनाथं प्रयोजयेत् ॥६॥ , धारयेदपि छस्बां च गुज्जां काकादनी तथा ।
^ कैथ, सुवहा ( गोधापदी या रास्ना ) कन्दुरी, बिल्व, परचीबलम् (मदी या आंवला), नन्दी (अश्वत्थ, पारख पीपल)
भिलावा -इनका क्वाय परिषेकं मे ब्रते । बकरी का मू
मू, सुस्ता, देवदास कुष्ट ओर ` एलादिगण इनसे तेढ सिद्ध
| करे । रोहिणी (कटक), चीड, ' खेर, ठकि ओर अजन कौ
आ) इनका क्वाय करके इस ववाथ मेँ दधः मिलाकर धृत् ड करे | गौध, ` उल्द की निष्ठा, वस्तगन्धां (अजगन्व);
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सती) को धारण कराये ।
| पिप्य -ऋ्तव्य-उल्हण ने नः दौ भल्छातक णठ पदकर जठ
| हौ अथे क्रिया ई ॥२.६ : य
। मयां सुद्गङ्तेश्वान्नैस्तपयेष्छीतपूतनाम्॥७॥ देयश्चोपहारो वारुणी रुधिरं तथा।
५4. "> र.
ठत्तरतेन्् ` #
पिक कलुखी; नीम के पन्ते ओर सरेदठी इनसे धूपः देवे ।
(कड्वातुम्बा). रत्ती काकादनी (कोटी या -श्वेत
- ` | चील, सौप की जीम कोः णारण कराये । कसील; 5
६९७ मृग से बने मर्यो से नदी म बलि दैकर शीतपूतना को प्रसन्न करे । इस देवी के ल्थि वाणी (मदय) ओरं रक्तं का उपहार देना चाये । बाख्क को जलाशय के किनारे स्नान कराये । (नदी के समीप स्नान कराये) ॥७८्] सुद्गोदनाशना देवी सराोणिततपायिनी । जखाशयाख्या देवौ पातु स्वां जीतपूतना ॥€! रश्चामन्ब- मुंग ओर चावल को खानेवाखी, सुरा एं रक्त को पीनेवाली; जलाशय मे रदनेवाढी शीतपूतना देवी तेरी
रक्षा करे ।६॥) इति श्रयुश्ुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तगते कुमारतन्पे शीत- पूतनाप्रतिषेधो नाम (अष्टमोऽध्यायः, आदितः)
चठल्निशोऽध्यायः ॥३४1।
(ज म प्चाच्ररतमाऽव्पायः
अथातो मुखमण्डिकाप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥ `
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरेः ॥२॥
अब इसके आगे मुखमण्डिकाप्रतिषेध का व्याख्यान
कृरगे- जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कदा कदा था ॥२.२॥ _
कपित्थबिस्वतकौरीवांगीगन्ध वेहस्तकाः ।
कुबेराक्षी च योज्याः स्युबोखानां परिषचने ॥३॥ `.
कैथ, ब्रिल्व, अरणि (अग्निमन्थ), वंशरोचन, एरण्ड,
कुबेराक्षी (सद्रक्षा या काष्ठ वाटला) ईंनेके क्वाथ से बालक को
स्नान कराये ॥३॥
स्वरसैभेङ्घवृक्षाणां तथाऽजहरिगन्धयोः । तेर वसां च संयोञय पचेद्भ्यञ्जते जिजोः ॥भा
वातदर-एरण्ड आदि वृक्षों के कमर पत्तो के तथां अज- `
गन्धा ओर अश्वगन्धा के कषाय मे वसा ओर तेर को मिल कर सिद्धः करे | इस तेर से बच्चे का अभ्यंग करे । (भृगढक्षः `
| भृंगराज इति भी हदारणचन्द्रः ) ।॥४॥
मधलिकायां पयसि तुगाक्षीयां गणे तथा । - ~ `
मधुरे पच्चमूङे च कनीयसि घृतं पचेत् ॥५॥
मधृठिका-मूवां मे, दुष मे, - वंशलोचन काकोल्यादि सधुर `
` गण मे. शाल्पण्यांदि रधुः पंचमू मे धुत को सिद्ध करे ॥\५॥
वचा सजेरसः कुष्ठं सर्पिश्चोद्धुपनं दितम् ।
धारयेदपि जिह्वाश्च चाषचोरल्किसिपजाः ॥६॥
वणक चूणके माल्यभञ्जन पार्द वथा ।
मनःजिखं चोपहरेद्गोछमष्ये बड तथा ।७॥
पायसं सपुरोडाओं बल्यथंयुपखहरेत्) मन्त्रपूताभिरद्धि् तत्रैव स्नपनं दितम् ।८॥ ५
वच, राक, कूठ, षी श्नसे धूप देना उत्तम है. चाष, _ `
(. . नलाशयात्ते ब्राङखस्य स्नपन चोपदिश्यते ॥९॥ ` -॥ सुरमा भयः मनसिखः सीर) युरोडाशं न