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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 722

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प्रकार के मूषण पहने हए जिस देवी कौ निरन्तर उपाखना

करते है, लम्ब्री-कराल ( विकट दान्तो कौ ), विनता ( कुबड़ी )

बहप वाली, शुष्क नाम की जो रेवती देवी हं, वह तुक्च पर

प्रसन्न हो ।६-१९।)

` इति धीसुश्रतसंदहितायायुत्तरतन्तरान्तगंते ङुमारतन्तरे रेवती

प्रतिषेधोनामं ८ पञ्चमोऽयायः, आदितः )

एकत्रिशोऽध्यायः ॥२३९१॥

द्राधिशत्तमोऽध्यायः

अथातः पूतनाप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान्‌ धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे पूतनप्रतिषेष का व्याख्यान करगे जेखा- भगवान्‌ धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १,२॥ ` कृपोतवङ्काऽरल्को वरुणः पारिभद्रकः ।

आस्फोता चैव योभ्याः स्युबाखानां परिषेचने ॥२॥

वचा वयःस्था गोखोमी हरितां मनःजिला ।

कुष्ठं सजेरसङचेव तैखाथ वग इष्यते ॥४॥ वाक्कों को स्नान करने के लिये कपोतवंका ( ब्राह्मी ) अरलु, वरना, बकायन, सारिवा-इनका क्वाथ वरतना चाहिये अभ्यङ्ग करने के व्यि वच, गिलोय ( या हरड़ ), दवा, हरताल

, मेनसिल, कुष्ठ ओर रार इनका कल्क ओर कषाय इनमे तेल

सिद्ध करे ( हरतार मनसि का कषाय नही होगा इसलिये

इनका कल्क ही लेकर द्रव कायं जल से करे ) ।(३,४॥

हितं घृतं तुगाक्षीयो सिद्धं मधघुरकेषु च । कु्ठताखीशख दिर चन्दनस्यन्दने तथा ॥५॥ देवदारुव बार्दिगुङकष्ठ गिरिकम्बकः

` एखाहरेणवरश्चापि योऽ्या उद्धपने सद्‌ा ॥६॥

. गन्धनाङ्ल्िङ्धम्भीके मञ्जानो बदरस्य च ।

` ककटास्थि घृतं चापि धनं, सष्पेः सह ।(७॥ वृंशद्धोचन, काकोल्यादि मधुरगण, इनके क्वाथमें कुष्ठ

तादश, खेर, चन्दन ओर सदन इनके कल्क से सिद्ध घत

. पीने मे बरते । देवदार, वच, हींग, कृठ, कोयल, इलायची

ओर हरेण इनसे सदा धम देवे । गन्धनाकुखी (रासना), कुमिका

| ` (जल कुभ्मि ), वेरकी भज्जा, केकडे की अस्थि, घी ओर सरलो इनसे सदा धूप देवे ॥५-७॥

“ ` काकादनीं चित्रफल। विम्बं गु्ञां च धारयेत्‌ । ~ मस्स्यौदनं च कुर्वीत कश्या पटलं तथा ॥

शरावसंपुटे त्वा बि न्यगृदे हरेत्‌ ॥८॥ |

` . काकादन (वायसी. या कौआ टूटी); चित्रफला (इन्द्रायण)

कन्दुरी ओर रत्ती बच्चे को धारण कराये। मछली. ओर भात

तिलतण्डूढ की खिचड़ी, तिलकल्क इनको एक शराव सम्पुट ( दोहने ) में रखकर शूल्यघर म ( जह कोई नदीं रहता हो वहिदेवे॥त॥ ` व

सुश्रतसंहिता

| ओर आंखो पर केप करना चाहिये ॥१॥

पुरानी कन्था (गदी ) इनसे धूपदेवे। . ५ ^

[ अ०३२ ३३ । उच्छिष्टेनाभिषेकेण शिशोः स्नपनमिष्यते। । पूञ्या च पूतना देवी बकिभिः सोपहारफैः ॥6॥

मछिनास्बरसंबीता सङ्ना रूक्षमूधजा

रन्यागाराश्चिता देवी दारक पातु पृतना ॥१०॥ दुदशेना सुदुगन्धा कराखा मेवकालिका।

भिन्नागाराश्रया देवी दारकं पातु पृतना ॥११॥ जठ पानौ से बच्चे को स्नान कराये । वकि एवं उपहार ।

से पूतना देवी का पूजन करना चाहिये । रक्षामन्तर-मेले बघ्ौ

को धारण किये हए, मलिन, रूक् बा की, शूट्यघर मे रहने वाली, पूतना देवी बच्चे की रक्षा करे । देखने मे भह, दुग॑नध

वारी, कराख, मेघ के समान काली, टूटे घर मे रदनेवादी

पूतना देबी बच्चे कौ रक्षा करे ॥६-११॥

इति श्रीसुश्रतसंहितायामुत्तरतन्ान्तगते कुमारतन्तरे `

पूतना प्रतिषेधो नाम ( षष्ठोऽध्यायः, आदितः)

दरात्रिशोऽध्यायः ॥३२॥

अ्रयखिशत्तमोऽध्यायः

अथातोऽन्धपतनाप्रतिषेधं उयाख्यास्यामः ॥९॥

यथोवाच भगवान्‌ धन्वन्तरिः ॥२॥

अब्र इसके आगे अन्धपूतना प्रतिषेध का व्याख्यान कस्य

जैसा कि भगवान धन्वन्तरि ने कहाथा ॥ ९२॥ .

तिक्तकदरुमपत्राणां कायं क्वाथोऽबसेचने ।

बच्चे कौ स्नान कराने के लिएःनीम आदि तिक्त. 0. पत्तों का क्वाथ बरतना चाहिये । िः ,

सुरा सौवीरकं कुष्ठं हरितारं मनःजिखा ॥२॥

तथा सजेरसश्चेव तेङाथमुपदिश्यते । त

पिप्पल्यः पिप्पलीमूलं बर्गो मधुरको मधु ॥४॥ =

शार्पणीं जरहत्यौ च घ॒ताथसुपदिश्यते (

सुरा, काञ्जी, कूठ, हरताल, मैनसिल ओर रार €

तै सिद्ध करे । पिप्मी, पिपलीमूल, काकोल्यादिमधु, °

पर्णी, कटेरी, बड़ी कटेरी, इनमे घत सिद्ध करे ॥२४४॥ ..

सबेगन्थे ग्रदेहश्च गातरेष्वदणोश्च गीतः ॥९॥ _ ..

एलादि सर्वगन्धद्रव्यो से तथा शीतल द्रनयो से शरर^ |

पुरीषं कौक्छुटं केशश्च सपवचं तथा । |

जीणौ' च भिद्धसंघाटीं धूषनायोपकल्पयेत्‌ ॥५

मुगे का. मर, केश,. चम॑, सापि की. केचुली भि

, वक्तव्य-““भिन्लसंबारी भिकषुखशाक्यमिह्ुवौ <

वराजकञ्च, तयोः जीणसंघारी जीणवस्वम्‌ ॥६॥

कुक्छुदीं मकंटो निम्बीमनन्ता चापि धार ~ मासमामं तथा पक्वं जोणितं च चदुष्पये ॥०। .

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