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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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४ ० ३१ |] 1

त्रणिषूक्तानि चूणोनि पथ्यानि विविधानि च ॥१॥ दवि्िणीय ओर मिश्रकोक्त नाना प्रकार के चूण शकरुनीग्रद

ते यक्त बच्चे के लिए युक्त हँ ।॥५॥

। स्कन्दग्रहे धूपनानि तानीहापि प्रयोजयेत्‌ ।

„ , स्कन्दग्रह स कदे धूपन द्रव्यो को इसमे मी वरते ।

शतावरीमगेवीरुनागदन्तीनिदि गधिकाः | २॥

छदमणां सहदेवीं च बृहतौ चापि घारयेत्‌ ।

शतावरी, इन्द्रायण, वृड़्ीदन्ती, कटेरी, सहदेवी, ल्द॑मणा

  • ओर बदड़ीकटेरी इनको धारण केरे ।६॥

। . ' . तिहतण्डढक माल्यं ह रिताङं मनःज्िखा ॥अ७॥ । छरेष करज्जेषु निवेद्यो नियतात्मना ।

। ४

` नदिय होकर करंजो मे देवे । (करंज बृ्षो मे बलि देने के स्थान 5

निष्कुटे च प्रयोक्तभ्यं स्नानमस्य यथाविधि ॥2॥

( निष्छुट का अथं कई घना जंगल करते दै ) ॥८॥ स्कन्द्‌ापस्मारशमनं श्रतं चापीह पूजितम्‌ । |

¶ कन्दापस्मारनाश्क घृत भमी (क्चीरिदृक्च इत्यादिवाला) । उत्तम हे।

[च विविधां पूजां शङ्कन्याः कुघुमेः अभेः ॥६॥ चमेली या कमल जैसे शुभ पुष्यो से शकुनीग्रह कौ नाना -प्रकार क पूजा करनी चाहिये ॥६॥ । ^ अन्तरिक्षचरा देवी सबाख््कारभूषिता। । . अयोमुखी तीदणदुण्डा गङ्कनी ते प्रसीदतु ॥१०॥ दुदडना महाकाया पिङ्गाक्षी भेरवस्वरा। रम्बोदरी शङ्ककणीं शङ्खनी ते प्रसीदतु ॥१९१॥ । „ र्षामन्न-अन्तरिक्च मे विचरनेवाली, सम्पूण. अलंकारो

से शोभित लोहे के मुख को, तौद्ण मुखवाली शकुनी तु [क्क | कै व्थि प्रसन्न हो । दूषित विकराल दातों्ाली, बडे शरीर की पिंगल आंखों कौ, भैरवश्वर की, लम्बे पेख्वारी, शं क्‌ (कीला) समान कानवाटी शङकुनी देवी वश्च पर प्रसन्न हो ॥१०॥

इति सुशुतसंहितायामुत्तरतन्वान्तगंति कुमारतन्त्रे शकुनी ४ प्रतिषेषो नाम॒ (चतुर्थोऽध्यायः, -आदितः ) 3 तिंशोऽध्यायः॥|२०॥ ५९

। `. . .रकत्रिशत्तमोऽ्यायः अथातो रेवतीप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः॥१॥ ~

1 न क ४

जर किक

: ॥ 1 क ` च्छ + 1

`उत्तरतन्त्रम्‌

। तिर-तण्डुढ, माला, हतार, मैनखिछ इनकी वि संयते

। पर निकरुञजो मे बलि देना ठीक हे, पाठ भी निङुजेषु ई) ॥॥ ।

बालक को विधिपूवंक स्नान घर के बगीचेमे कराये.|

या जीया पोता-की लकड़ी का मना ख्चक (आमूषण ) संदा

| -छम्बा करारा विनता तथव बहुपुश्रिका ॥ . .. रेवती शष्कनामा यासा ते देव प्रसीदतु ॥११॥ | ` दो नदियों के संगम में वेय षाम .ओर बालक को स्नान =

` | कराये । रक्षासन््-न

| ६९१.

अश्वगन्धाऽजश्ङ्गी च सारिवा संपुननवा । सहे तथा विदारी च कषायाः सेचने दिताः ॥३॥ अश्वगन्धा, काकड़ाश्वज्गी, सारिवा, पुननवा, -सृद्गपर्णी माषपर्णी, विदारी इनका कषाय परिषेक मेँ उत्तम ई । ८ इनको अलग अल्ग या समरदाय स्पे बरते)॥३ ~ तरमभ्यज्जने काय कुष्ठे सजरसेऽपि च । पठङ्कषायां न्द्‌ तथा गिरिकदम्बके ।।२। ८, राठ, गुग्ुक, जटार्मासी ओर गिरिकदम्ब ( अपरा- जिता ) इनके कल्क से अभ्यङ्ग के ल्थि तै सिद्ध करे। ( द्रव्यकरायं पानी से करना चाहिथे ) 1४1 धवाश्वकणकङुम्भधातकोतिन्दुकोषु च । काकोल्यादिगणे चैव पानीयं सर्पिरिष्यते ॥५॥ घव, अरवकण, अजुन, धातकी, तिन्दुक इनके कषाय मे

काकोल्यादि गण के कल्क से. घत चिद्ध-करे यह घत षपीनेके ` लिये देवे । .

वक्तव्य -कोई आचाय धव अश्वकण आदि कषाय उपरोक्त ` तेरपाक के श्यि गिनते ई ॥५॥ कुखत्था शङ्कचणं च प्रदेहः सावंगन्धिकः।

गृधोलूकपुरीषाणि यवां यव्खो घृतम्‌ ।६॥ सन्ध्ययोरुभयोः कायमेतदुद्धूपनं शिशोः। वरुणारिष्ठकमयं रुचकं सेन्दुकं तथा ॥७॥ सततं धारयेच्चापि छृतं वा पौत्रजीविकम्‌ । - ज्ुश्छाः सुमनसो खछाजाः पयः शाल्योदनं वथा ॥2॥ वल्निविधो गोतीथ रेवल्ये प्रयतात्मना। कुख्त्थी, शंख का चण ओर एलादि.गण की ओषधयो का सब शरीर पर प्रदेह करे । गीष; उन्द्‌ का मल,. जो, वाख

| ओर घी इनसे दोनों संध्या कारूमें बच्चे को घप देव ] वारणा

ओर नीम की खकडी का बना, सेन्दु ( निर्गण्डी ) का बना `

धारण कराये । श्वेतफूढ, लाजा, दूष, शालीमात ` इनकी नखि

गोतीथ में ( जहां गयं पानी पीती हो ) उपवासादि से पवित्र होकर रेबतीग्रह के ठि देवे ॥६-८॥ _ ~.

सङ्गमे चं भिषक. स्नानं ऊयाद्धात्रीक्कमारयोः ॥€॥ : .नानावद्परा देवी चित्रमाल्याचुख्ेपना। =~ चख््कुण्डडिनी स्यामा रेवती ते प्रसीदतु ॥१०॥ _ -उपासते यां सततं देव्यो विविषभूषणाः । : __

-नाना प्रकार के वस्नं को पारण करनेवाली. ˆ

माला णवं अनुप बालो, हिते इए ङ

देवी तेरे प्र प्रसन्नो + नातप

५ एः + 9 2