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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुश्रुतसंहिता

[ अ० ३० ]

श्रीवा में लटका दिये जाते हैं अथवा बाहु आदि पर बांध दिये जाते हैं।

६—बलि देना—बलि का ही नाम उपहार तथा नैवेद्य है। इसमें—कुछ निर्दिष्ट भक्ष्य होते हैं और साथ में पुष्प, गन्ध (इत्र), पताका आदि रहते हैं। यह मन्दिर में, शून्य गृह में, चत्वर—चौरास्ता अथवा आंगन, किसी वृक्ष के नीचे तथा गोशाळा आदि निर्दिष्ट स्थान पर रख दी जाती है।

७—स्नान—औषधियों के क्वाथ से अथवा उसे अभि मन्त्रित करके बालक अथवा बालिका एवं श्रात्री (माता अथवा दूध पिलानेवाली, दोनों को नहलाया जाता है।

८—उत्सादन—उबटन लगाना तथा तिलक लगाना।

९—रक्षा मन्त्र—देखिये ऊपर श्लो० १४ का वि० व०। रक्षा मन्त्रों में ग्रहों का वर्णन होता है और उनसे बालक की रक्षा के लिये प्राथना रहती है तथा बालक के लिये आशीर्वाद रहता है ॥१०—१४॥

इति श्रीमुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गत कुमारतन्त्रे स्कन्दप्रतिषेधो नाम द्वितीयोऽध्यायः आदितो) ऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८॥

एकोन्नत्रिशत्तमोऽध्यायः।

अथातः स्कन्दापस्मारप्रतिषेधं व्याख्याख्यामः ॥११॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे स्कन्दापस्मारप्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥११,२॥

बिल्वः शिरीषो गोलोमी सुरसादिश्च यो गणः।

परिषेके प्रयोक्तव्यः स्कन्दापस्मारशान्तये ॥३॥

स्कन्दापस्मारक की शान्ति के लिये—बिल्व, शिरीष, दुर्वा, और सुरसादि गण का क्वाथ परिषेक में बरते ॥३॥

सर्वगन्धविपक्वं तु तैलमभ्यञ्जने हितम्।

क्षीरवृक्षकषाये च काकोल्यादी गणे तथा ॥४॥

विपक्तव्यं घृतं चापि पानीयं पयसा सह।

बिल्व, शिरीष आदि के क्वाथ में एलादिगण का कल्क मिलाकर तैल सिद्ध करना चाहिये। यह तैल अभ्यंग में बरते। बरगद आदि क्षीर वृक्षों के कषाय में काकोल्यादिगण का कल्क मिलाकर, दूध के साथ घृत सिद्ध करे, यही घृत दूध के साथ पीने को देवे ॥४॥

वत्सादनं वचा हिङ्गयुक्तं स्कन्दमहे हितम् ॥५॥

गृध्रलूकपुरोषाणि केशा हस्तिनखा घृतम्।

वृषभस्य च रोमाणि योव्यान्युदूषपनेऽपि च ॥६॥

स्कन्द ग्रह में उबटन के लिये उबटनों में वक्ष और हींग मिलाये। धपन के लिये गीध, उल्लू का मल, केश, हाथी के नख, घो, बैल के बालों को बरते ॥५,६॥

अनन्तां कुक्कुटीं विम्बीं मर्कटीं चापि धारयेत्।

सारिवा, कुक्कुटी औषध, कौंच की जड़ अथवा कन्दूरी इनकी माला पहनाये।

पक्वापक्वानि मांसाणि प्रसन्नता रुधिरं पयः ॥७॥

भूतौदनो निवेद्यश्च स्कन्दापस्मारिण्डवटे।

पक्व-अपक्व मांस, सुरा, रक्त, दूध, भूतौदन (जी के बिना भोजन या स्निग्धउड़द आदि), इनकी बलि स्कन्दापस्मार रोगी के हित के लिये गड़डे में देनी चाहिये ॥७॥

चतुष्षथे च कर्तव्यं स्नानमस्य यतात्मना ॥८॥

उपवास रखकर सावधानी से बच्चे को चौराहे पर लेजाकर स्नान कराये ॥८॥

स्कन्दापस्मारसंज्ञो यः स्कन्दस्य दयितः सखा।

विशाखसंज्ञश्च शिशोः शिवोऽस्तु विकृताननः ॥९॥

रक्षामन्त्र—स्कन्द का प्रिय मित्र, विशाख नामक विकृत मुखवाला स्कन्दापस्मार नामक ग्रह शिशु के लिये कल्याणकारी हो ॥९॥

इति मुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गत कुमारतन्त्रे स्कन्दापस्मारप्रतिषेधो नाम (तृतीयोऽध्यायः, आदितः)

एकोन्नत्रिशोऽध्यायः ॥२९॥

त्रिशत्तमोऽध्यायः

अथातः शकुनीप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥११॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे शकुनीप्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥११,२॥

शकुन्यभिपरीतस्य कायों वैद्येन जानता।

वेतसाश्रकपित्तानां निष्कवाथः परिषेचने ॥३॥

शकुनी ग्रह से पीड़ित बच्चे के लिये जाननेवाला वैद्य जलवेतस, आम, केश इनका क्वाथ परिषेचन में बरते ॥३॥

कषायमधुरैस्तैलं कार्यमभ्यञ्जने शिशोः।

बरगद आदि कषाय वृक्षों के क्वाथ में, काकोल्यादि मधुर द्रव्यों का कल्क मिलाकर तैल सिद्ध करे। यह तैल शिशु के लिये अभ्यंग में बरते।

मधुकोशीरहीबेरसारिचोत्पलपद्मकैः ॥४॥

रोधप्रियकुमलिष्ठगौरिकैः प्रदिहेच्छिञ्जुम।

मुलेहटो, खस, बालक, सारिवा, कमल, पद्माख, लोख, प्रियंगु, मजीठ, गेरु इनसे शिशु के शरीर पर लेप करे ॥४॥