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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 719

अ० २८ ]

उत्तरतन्त्रम्

६६३

अष्टाविंशतितमोऽध्यायः

अथातः स्कन्दग्रहप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥

अब इसके आगे स्कन्दग्रह प्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे—

जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

स्कन्दग्रहोपसृष्टानां कुमाराणां प्रशस्यते ।

वातघ्नदुष्पत्राणां निष्क्रवाथः परिषेचने ॥३॥

स्कन्दग्रह से आक्रान्त वच्चों के लिये ऐरण्ड आदि वातघ्न वृक्षों के पत्तों का क्वाथ परिषेचन में उत्तम है ॥३॥

तेषां मूलेषु सिद्धं च तैलमभ्यजने हितम् ।

सर्वगन्धसुराणमण्डकैडयोंवापमिष्यते ॥४॥

वातघ्न वृक्षों के मूलों में (बिल्वादि महापंचमूल) के क्वाथ में, ऐलादिगण का, सुरा मण्ड और पर्वत निम्ब (बकायन) का कल्क मिलाकर तैल सिद्धकरे । इस तैलका अभ्यंग उत्तम है ॥४॥

देवदारुणि रास्तायां मधुरेषु दुमेषु च ।

सिद्धं सर्पिश्च सखीरं पानमस्मै प्रयोजयेत् ॥५॥

देवदारु, रास्ता, राजादन (खिरनी आदि) आदि मधुर वृक्षों के क्वाथ में दूध के साथ सिद्ध किया घृत इसे पीने को देवे ॥५॥

सर्षपाः सर्पनिर्माको वचा काकादनी घृतम् ।

उष्ट्राजाविगवां चैव रोमाण्युद्धूपनं शिशोः ॥६॥

सरसों, सर्पनिर्माक (केंचुला), बच, काकादनी, घी, ऊंट, वकरी, भेड़ तथा गौ के बालों की बालकों को धूप देवे ॥६॥

सोमवल्लोमिन्द्रवल्लो शमी विल्वस्य कण्टकान् ।

मुगादन्याश्च मूलाणि प्रथितान्येव धारयेत् ॥७॥

गिलोय, हन्द्रवल्लो, शमी (जड़), विल्व के काटे, हन्द्रा-यण की जड़ इनकी माला बनाकर पहनाये ॥७॥

रक्तानि माल्यानि तथा पताका

रक्ताश्च गन्धा विविधाश्च भद्र्याः ।

घण्टा च देवाय बलिनिवेद्यः

सकुक्कुटः स्कन्दग्रहे हिताय ॥८॥

पवित्र वैद्य स्नान करके, रात्रि में स्कन्दग्रह के लिये लाल-फल की मालाएँ, लाल पताकाएँ, केसर आदि लालमुगन्ध, नानाप्रकार के भद्र्य, घंटा, सुग्री-इनकी बलि को बालक के हित के लिये स्कन्द ग्रह को देवे ।

वि० मन्तव्य—यह बलि चौरास्ते पर देनी चाहिये अथवा स्कन्द के मन्दिर में ॥८॥

स्नानं त्रिरात्रं निशि चत्वरेषु

कुर्यात् पुनः शालियैर्नैवेस्तु

अद्विश्च गायज्यभिमन्त्रिताभिः

प्रणवालनं व्याहृतिभिश्च बह्वः ॥९॥

चौरस्ते पर त्रिरात्र स्नान करके नूतन शाली (वान्य) यव से गायज्याभिमन्त्रित जल से व्याहृति पूर्वक अग्नि में डबन करे ॥९॥

रक्षामतः प्रवक्ष्यामि बालानां पापनाशिनीम् ।

अहन्यहृति कर्तव्या या भिषग्भिरतन्द्रितैः ॥१०॥

तपसा तेजसां चैव यशसां वपुषां तथा ।

निधानं योऽव्ययो देवः स ते स्कन्दः प्रसीदतु ॥११॥

ग्रहसेनापतिर्देवो देवसेनापतिर्विभुः

देवदेवस्य महतः पावकस्य च यः सुतः ।

गङ्गोमाकृतिकानां च स ते शर्म प्रयच्छतु ॥१२॥

रक्तमाल्याम्बरः श्रीमान् रक्तचन्द्रनभूषितः ।

रक्तदिव्यवपुर्देवः पातु त्वां कौश्लमूढनः ॥१३॥

इसके आगे बालकों की रक्षाविधि को कहता हूँ, जिसे सावधान रहते हुए वैद्य प्रतिदिन करे, यह रक्षाविधि पाप (दुर्भाग्य) को नष्ट करती है । तप, तेज, यश, सुन्दरता का जो घर है, जो कभी विकृत होनेवाला न हो, वह स्कन्ददेव प्रसन्न हो । स्कन्ददेव, ग्रहों का सेनापति, देवताओं का सेनापति, विभु, देवताओं की सेना के शत्रुओं को नष्ट करनेवाला, स्कन्ददेव तुम्हारी रक्षा करे । भगवान् शंकर का, और बड़ी अग्नि का जो पुत्र है, गंगा, पार्वती-कृतिका का जो पुत्र है, वह तेरा मंगल करे । लाल-माला-बल्ल धारण किये, श्रीयुक्त, रक्तचन्द्रन से शोभित, लालदिव्य शरीर, कौंच को नष्ट करनेवाले (कौंच नामक पर्वत को) देव (स्कन्ददेव) तुम्हारी रक्षा करें ।

वि० मन्तव्य—इन मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण बालक के पास होना चाहिये अथवा लोहे का चिमटा अथवा दाती अथवा झाड़ू अथवा चमर अथवा मोर के पंखों द्वारा मन्त्रोच्चारण पूर्वक झाड़ना चाहिये । अथवा इन मन्त्रों से अभिमन्त्रित जल से प्रोक्षण करना चाहिये । स्मरणीय-प्रत्येक ग्रह की शान्ति के लिये—१—परिषेचन-प्रोक्षण—छोटे मारना-देना—जल छिड़कना । यह कार्य—औषधों के क्वाथ से अथवा उसे अभिमन्त्रित करके अथवा शुद्ध जल को अभिमन्त्रित करके किया जाता है अथवा मन्त्रोच्चारण पूर्वक किया जाता है । २—अभ्यंग के लिये तैल सिद्ध किये जाते हैं । ३—खाने के लिये घृत सिद्ध किये जाते हैं । बालकों के वपुः, सेधा, बल एवं बुद्धि के विवर्धनार्थ (शा० अ० १० श्लो० ७०) भी घृत का प्रयोग बतलाया है उसमें भी इन घृतों का प्रयोग किया जा सकता है । ४—धूपन किया जाता है—निर्दिष्ट द्रव्य अग्नि पर डालकर धूप दी जाती है । ५—द्रव्योषधी धारण—निर्दिष्ट द्रव्य श्राया में पिरौकर अथवा बांधकर अथवा पोटली बनाकर