सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० २७ ]
रक्तास्यो हरितमलोऽतिपाण्डुदेहः श्यावो वा ज्वरमुखपाकवेदनातः ।
रेवत्या व्यथिततनुश्च कर्णनासं सूदनाति ध्रुवसम्भिपीडितः कुमारः ॥११॥
रेवतीग्रह से पीड़ित शिशु का मुख लाल, मल हरा, शरीर अति पाण्डुवर्ण या काले रंग का होता है । बच्चे को ज्वर, मुखपाक, वेदना रहती है, बच्चा निरन्तर कान-नाक को मलता रहता है ॥११॥
सस्ताङ्गः स्वपिति मुखं दिवान रात्रौ विद्ध भिन्नं सूजति च काकतुल्यगन्धिः ।
छर्चाऽऽतो हृषिततनूरूहः कुमार-
स्तृष्णातुर्भवेति च पूतनागृहीतः ॥१२॥
पूतनाग्रह से पीड़ित शिशु के अङ्ग शिथिल रहते हैं, दिन में मुख से सोता है, रात्रि में नहीं सोता । मल पतला त्याग करता है । एवं शरीर में कौए के समान गन्ध, वमन से पीड़ित, शरीर के रोमों में रोमांच रहता है, बच्चे को प्यास बहुत रहती है ॥१२॥
यो द्वेष्टि स्तनमतिसारकासहिंका-
च्छर्द्वभिज्वरंसहिताभिरर्धमानः ।
दुर्वर्णः सततमधःशयोऽस्मृगन्धि-
स्तं ब्रूयुभिषञ्च इहान्धपूतनातैम् ॥१३॥
अन्धपूतना से पीड़ित शिशु स्तन से द्वेष करता है, यह अतिसार, कास, हिंका, वमन, ज्वर से पीड़ित रहता है, शरीर का रंग बदल जाता है, निरन्तर सदा उल्टा मुख रखकर (नीचे मुख करके) सोता है, शरीर से खड़ी गन्ध आती है, इस बच्चे को अन्धपूतना से पीड़ित जाने ॥१३॥
उद्भिद्यो भुशमतिषेपते प्ररुधात्
संलीनः स्वपिति च यस्य चान्नत्रकूजः ।
विस्त्राङ्गो भुशमतिसार्यते च यस्तं
जानीयाद्भिषगिह शीतपूतनातैम् ॥१४॥
शीतपूतना से पीड़ित बच्चा अतिशय बेचैन, बहुत कपिता रहता है, बहुत रोता है, खाट के एक पार्श्व पर लगा हुआ सोता है, आँखों में आवाज (गङ्गङ्गाहट) रहती है, अङ्गों में से सड़ी गन्ध आती है, और अतिसार रहता है, इस प्रकार का शिशु शीतपूतना से आक्रान्त होता है ॥१४॥
म्लानाङ्गः सुरचिरपाणपादवक्रत्रो
बद्धाशां कलुषसिराद्युतोदरो यः ।
सोद्रेगो भवति च मूत्रतुल्यगन्धिः
स ज्ञेयः शिशुरिह चक्रमण्डिकार्तः ॥१५॥
शरीर का मध्यभाग दुर्बल, हाथ-पैर-मुख सुन्दर, बहुत खानेवाला, उदर मलिन सिराओं से भरा, बेचैन, मूत्र के
समान गन्धवाला शिशु मुखमण्डिका से पीड़ित जानना चाहिये ॥१५॥
यः फेनं वमति विनम्यते च मध्ये सोद्रेगं विलपति चोर्ध्वंमोक्षमाणः ।
ज्वर्येत प्रततमयो वसासगन्धि-
निःसंज्ञो भवति हि नेगमेषजुष्टः ॥१६॥
जिसके मुख से क्षाम गिरती हो, मध्यभाग से झुका-मुड़ा रहता है, बेचैन एवं ऊपर को देखता हुआ जो रोता हो, सदा-निरन्तर ज्वर रहता हो, वसा के समान गन्ध जिसके शरीर से आती हो, संज्ञारहित-बेहोश जो हो जाता है, उसे नेगमेष से आक्रान्त जानना चाहिये ॥१६॥
प्रस्तब्धो यः स्तनद्वेषो मुखते चाविगन्तुमुहः ।
तं बालमचिराद्भुन्ति महः संपूर्णलक्षणः ॥१७॥
जो बच्चा अतिशय स्तन्ध (जड़ीभूत) अङ्गोंवाला, स्तन से द्वेष करनेवाला, बार-बार जो मूर्छित होता है, उस बालक में बार-बार आवेश करता हुआ ग्रह, सम्पूर्ण लक्षण उत्पन्न करके मार देता है ॥१७॥
विपरीतमतः साध्यं चिकित्सेदचिराद्वितम् ।
इससे विपरीत अवस्था में (असम्पूर्ण लक्षणों में) तथा रोग की नूतनावस्था में चिकित्सा करनी चाहिये ॥
गृहे पुराणहविषाभ्यञ्ज्य बालं गुचो गुचिः ॥१८॥
सर्षपान् प्रकिरेत्तर्चां तैलैर्द्वीपं च कारयेत् ।
सदा सन्निहितं चापि जुहुयाद्भ्यवाहनम् ॥१९॥
सर्वगन्धोषधीबीजैर्गन्धमाल्यैरलङ्कृतम् ।
अरनये कृत्तिकाभ्यञ्ज्य स्वाहा स्वाहेति संततम् ॥२०॥
वैद्य पवित्र होकर, बालक को पुरातन घृत से अभ्यंज करे, पवित्रस्थान पर सरसों को उसके चारों ओर बिखेरे, तैल का दिया जलावे । इस बच्चे के प.स. सदा अग्नि में एलादिगण में पठित औषधियों से, तिल, गेहूँ-उड़द आदि से, सुगन्ध (चन्दन-राल आदि) से हवन करे । बालक को गन्ध-माला से अलंकृत करे । अग्नि और कृत्तिका के लिये स्वाहा-स्वाहा इस उच्चारण से आहुतियाँ देवे ॥१८-२०॥
नमः स्कन्दाय देवाय प्रहाधिपतये नमः ।
शिरसा त्वाऽभिवन्देऽहं प्रतिगृह्णीष्व मे बलिम् ।
नीरुजो निर्विकारश्च शिशुमं जायतां नुतम् ॥२१॥
ग्रहों के स्वामी स्कन्ददेव के लिये मेरा नमस्कार है, मैं शिर झुकाकर आपको नमस्कार करता हूँ, मेरी बलि को आप ग्रहण करें । मेरा बच्चा वेदना रहित एवं रोग रहित जल्दी हो जाये ॥२१॥
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कुमारतन्त्रे नवग्रहाकृति विज्ञानीयो नाम(प्रथमोऽध्यायः, आदितः)सप्तविंशोऽध्यायः ॥२१॥