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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 717

अ० २७ ]

उत्तरतन्त्रम्

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हुए बच्चों में पूजा प्राप्ति के उद्देश्य से या मारने की इच्छा से ये ग्रह आविष्ट होते हैं।

वक्तव्य—चरक में इसी से कहा है—“नक्षस्य विज्ञासनं वायु, तस्मात्तस्मिन् सदस्यभुंजानेवाऽन्यत्र वाऽविधेयतां गच्छति राक्षसपिशाचपूतनाद्यानां नामानि चाहृत्यता कुमारस्य विज्ञासनाथं नाम ग्रहणं न कार्यं स्यात् ॥” हिंसा या पूजा के लिये आक्रमण करते हैं—“त्रिविधं तून्मादकराणां भूतानामुन्मादने प्रयोजनम्। तद्यथा—हिंसारतिरस्यचर्चं चेति तेषां तत्प्रयोजनमुन्मत्ताचारविशेषलक्षणैः विद्यात्। तत्र हिंसार्थमुन्मद्यमानोऽर्गिन प्रविशति। अप्तु निमञ्जति, स्थानात् श्वत्रे वा निपतति, शस्त्र-काष्ठलोघमुष्टिभिर्हन्ति आत्मानमन्यच्च, प्राणवधार्थमारभते।”

चरक नि० अ० ७।१८।६॥

ऐश्वर्यस्थितास्ते न शक्या विशन्तो

देहं द्रष्टुं मानुषैर्विश्वरूपाः।

आत्मं वाक्यं तत्तस्मौह्याभिधाम्ये

लिङ्गान्येषां यानि देहे भवन्ति ॥७॥

वे ग्रह संसार के रूपवाले एवं अणिमा आदि ऐश्वर्य से युक्त होने के कारण शरीर में प्रविष्ट होते हुए मनुष्यों से नहीं देखे जा सकते। इसलिये इन ग्रहों के जो लक्षण होते हैं, उनको प्राप्त पुरुषों के कथनों के अनुसार कहेंगे।

वि० मन्तव्य—विश्वरूपाः—देवों के एक गण ( समूह-जाति ) का नाम “विश्व” है विशन्ति इति विश्वे—अर्थात् जो प्रवेश करते हैं विश्वप्रवेशने धातुः तुदादिगणीयः। इस धातु से आगे उणादि गण के १।२५१ सूत्रानुसार वनन् प्रत्यय लगाने पर विश्व शब्द निष्पन्न होता है। अस्तु। वेदों में अनेक स्थलों पर ॐ स्वस्ति नः इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्वेदेवाः स्वस्ति नः………तथा ॐ अग्निर्देवता वातो, देवता………विश्वेदेवा देवता………आदि वैदिक ऋचाओं में—विश्वेदेवा नामक देवताओं का नाम आया है। विश्वरूप अर्थात् देवरूप दिव्य-शक्ति सम्पन्न देवता हैं। अतएव ऐश्वर्य—ईश्वरता से युक्त अणिमा आदि सिद्धियों से युक्त हैं। यद्यपि वे प्रवेश-आवेश करते हुए देखे नहीं जा सकते तथापि आसजनों के वाक्यों की समीक्षा करके उनके लक्षण कहे गये हैं केवल अन्धविश्वास करके नहीं। समीक्षा-सम्यक्-समीचीन प्रकार से ईक्षा-दर्शन-देखना। आस-यथार्थ वादो-ठोक २-सत्यर कहनेवाले, भगवान् पुनर्वसु के शब्दों में—तप एवं ज्ञान की शक्ति द्वारा रजस् एवं तमसु (राग एवं द्वेष) से पूर्ण रूप से मुक्त, व्यवधान रहित निर्मल एवं त्रिकाल ज्ञान से युक्त आस होते हैं और वे शिष्ट समस्त संसार को कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक देनेवाले तथा विबुद्ध परम ज्ञान-जागरूक होते हैं उनका वाक्य संशय हीन एवं सत्य होता है। ऐसे जन असत्य क्यों बोलेंगे जब कि वे रजस् एवं तमसु से सर्वथा मुक्त हैं। ( च० सू० अ० ११ )

ईश्वर तथा अन्यान्य वे भाव जो चक्षुःआदि इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष नहीं किये जा सकते उन सबको आसवाक्यों के आधार पर ही माना जाता है। तात्पर्य यह है कि वे चेतना धातु-आत्मा के समान अत्यन्त सूक्ष्म हैं अतएव देखे नहीं जा सकते। आयुर्वेद के विद्वानों को चाहिये कि वे उन लेखकों को समझावें जो देव, गन्धर्व आदि को कृमि लिखने का साहस करते हैं ॥

अवूषयन्तः पुरुषस्य देहं

देवादयःस्वैश्चैव गुणप्रभावैः।

विशन्त्यहश्यास्तरसां यथैव-

च्छायातपो दर्पणसूर्यकान्तो ॥

चरक नि० अ० ६।१८ ॥७॥

शूनान्नः क्षतजसगन्धिकः स्तनद्विद्

वक्रास्यो हतचलितैकपदमनेत्रः।

उद्विग्नः मुलुलितचतुरूपरोदी

स्कन्दातो भवति च गाढमुष्टिवर्चाः ॥८॥

स्कन्द ग्रह से पीड़ित शिशु—की आँखें सूजी, रक्त के समान शरीर से सूड़ी गन्ध आती है, बच्चा स्तन नहीं पीता, मुख टेढ़ा हो जाता है, एक आँख और उसके पलक, किया रहित हिलते रहते हैं, बच्चा उद्विग्न ( बेचैन ), आँखें थोड़ी खुली, थोड़ा रोनेवाला मुड़ी जोर से बाँधे, सख्त मल आता है।

वक्तव्य—आँख से दीवता कम है, पलक हिलती है, यह एक आँख में होता है ॥८॥

निःसंज्ञो भवति पुनर्भवेत्ससंज्ञः

संरुधः करचरणैश्च नृत्यतीव ।

विग्मूत्रे सृजति विनद्य जूम्भमाणः

फेनं च प्रसृजति तत्सखाभिपन्नः ॥९॥

स्कन्दापस्मार से पीड़ित शिशु-बेहोश हो जाता है, परन्तु कुछ समय पीछे चेतन हो जाता है, अच्छी प्रकार आवाज करता हुआ हाथ-पैर को नचाता सा प्रतीत होता है, शब्द करता हुआ मल मूत्र त्याग करता है, जम्भाई लेता हुआ मुख से झाग गिराता है ॥९॥

अस्ताङ्गो भयचकितो विहङ्गगन्धिः

संसावित्रणपरिपीडितः समन्तात् ।

स्फोटेश्च प्रचिततंतुः सदाहपाकै-

विञ्च्यो भवति शिशुः क्षतः शकुन्या ॥१०॥

शकुनिग्रह से पीड़ित शिशु के अंग ढीले पड़ जाते हैं, भय से घबराया प्रतीत होता है, शरीर से मांस खानेवाले या जल-चर पक्षियों की गन्ध आती है। शरीर पर सब और खाववाले व्रणों से पीड़ित रहता है, जलन और पकनेवाले छालों से शरीर भरा रहता है, यह शिशु शकुनिग्रह से पीड़ित जानता ॥

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