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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३८ ]

वक्तव्य—गीता में भगवान् ने कहा है—“देवान् भावयन्तानेन, ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः, श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥” चरक में कहा है—“विरुद्धदुष्टाशुचिभोजनानि, प्रवर्षणं देवगुरुद्विजानां। उन्मादहेतुः भयहर्षपूर्वो मनोऽभिधातो विषमाश्च चेष्टाः ॥” चरक ॥११-२०॥

वैकल्यं सरणं चापि ध्रुवं स्कन्दग्रहे मतम् ॥२१॥

स्कन्दग्रहोऽत्युग्रतमः सर्वध्वेव यतः स्मृतः।

अन्यो वा सर्वरूपस्तु न साध्यो ग्रह उच्यते ॥२२॥

स्कन्दग्रह के आक्रमण से विकलांगता और मृत्यु निश्चित हैं। क्योंकि इन सब में स्कन्दग्रह सबसे अधिक उग्र कहा है। दूसरे किसी ग्रह में सम्पूर्ण लक्षण होनेपर वह असाम्य होता है ॥ इति श्रीसुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तगते कुमारतन्त्र

ग्रहोत्पत्त्याध्यायो नाम (एकादशोऽध्यायः, आदितः)

सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥३७॥

अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः

अथातो योनिव्यापस्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे योनिव्यापस्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—योनि-भग (मैथुनोपयोगी अवयव) तथा गर्भाशय नामक अवयवों का सम्मिलित नाम योनि है इस अवयव के तीन आवर्त्त हैं—दो भग कहलाते हैं और तीसरे आवर्त्त में गर्भशय्या-गर्भाशय रहता है। इस अध्याय में भग एवं गर्भाशय को व्यापदों—विकृतियों का वर्णन तथा उनकी चिकित्सा का वर्णन है। व्यापद् शब्द रोग वाचक है ॥१,२॥

प्रवृद्धलिङ्गं पुरुषं याऽत्यर्थमुपसेवते।

रूक्षदुर्वलबाला या तस्या वायुः प्रकृध्यति ॥३॥

स दुष्टो योनिमासाद्य योनिरोगाय कल्पते।

अतिप्रलम्ब (अधिक पुष्ट एवं लम्बे) मेहनवाले पुरुष का जो रूक्ष, दुर्वल शरीरवाली स्त्री अथवा बालिका अतिशय सेवन करती है, उसमें वायु प्रकृपित हो जाती है, यह दूषित वायु योनि में पहुँचकर योनिरोगों को उत्पन्न करती है। चरक में—

“मिथ्याचारेण ताः स्त्रीणां प्रदुष्टेनावर्त्तवेन च।

जायन्ते वीजदोषाच्च देवाच्च ताः शृणु पृथक् ॥” ॥३॥

त्रयाणामपि दोषाणां यथास्वं लक्षणं तु ॥४॥

विशतित्व्यापदो योनेर्निर्दिष्टा रोगसंग्रहे।

मिथ्याचारेण या स्त्रीणां प्रदुष्टेनावर्त्तवेन च ॥५॥

जायन्ते वीजदोषाच्च देवाच्च शृणु ताः पृथक्।

वातादि तीनों दोषों के उनके अपने अपने लक्षणों के अनुसार वीस योनिरोग रोगसंग्रह में कहे हैं। जो कि स्त्रियों के मिथ्या आचार से, दूषित आर्य से, वीज दोष से और देव

(प्राक्तन कर्म) के कारण उत्पन्न होते हैं उनको पृथक्-पृथक् सुनो।

वि० मन्तव्य—इन वीस प्रकार की व्यापदों के चार कारण हैं—१ नारी का मिथ्या आचार अर्थात् प्रकृति विरुद्ध आहार एवं विहार। २—आर्यव अर्थात् रजस की विकृति—जैसा सु० शा० अ० २ सू० ५ में बतलाया गया है। ३—वीज दोष माता पिता के शोणित एवं शुक्र की विकृति—जैसे कुष्ठ, अर्श, प्रमेह एवं स्यौल्य आदि विकार सहज होते हैं वैसे योनिव्यापद् भी होती है—प्रायः—अत्यानन्दा योनिव्यापद्वाली माता की पुत्री भी अत्यानन्दा से पीड़ित देखी जाती है। ४—देवात्—देवयोग से—उक्त तीनों कारण न होने पर भी किसी को योनिव्यापद् हो जाती है ॥४,५॥

उदावर्त्ता तथा बन्ध्या विप्लुता च परिप्लुता ॥६॥

वातला चेति वातोत्थाः पिचोत्थाः रुधिरक्षरा।

वामिनो ऋसिनी चापि पुत्रधनी पिचला च या ॥७॥

अत्यानन्दा च या योनिः कर्णिनी चरणाद्वयम्।

श्लेष्मला च कफाञ्चैषा षण्डाख्या फलिनी तथा ॥८॥

महती सूचीवक्त्रा च सर्वजेति त्रिदोषजा।

वातज पाँच योनि रोग—उदावर्त्ता, बन्ध्या, विप्लुता, परिप्लुता और वातला। पिचज पाँच—रुधिरक्षरा, वामिनी, ऋसिनी, पुत्रधनी, पिचला। कफज पाँच—अत्यानन्दा, कर्णिनी, अचरणा, अतिचरणा, श्लेष्मला। षड्पातज पाँच—षण्डी, फलिनी, महती, सूचीवक्त्रा, सर्वजा ॥६-८॥

सफेनिलमुदावर्त्ता रजः कृच्छ्रेण मुखति ॥९॥

बन्ध्या नष्टार्तर्वा विद्याद्विप्लुतां नित्यवेदनाम्।

परिप्लुतायां भवति ग्राम्यधर्मं रुजा भ्रुगम् ॥१०॥

वातला कर्कशा स्तब्धा अल्लिन्स्तोदपीडिता।

चतसृष्वपि चाद्यासु भवन्त्यनिलवेदनाः ॥११॥

उदावर्त्ता योनि में क्षाण के साथ रज कठिनाई से आता है। बन्ध्या में आर्यव नष्ट होता है, विप्लुता में नित्य वेदना रहती है। परिप्लुता में—सहवास करते समय अतिशय पीड़ा होती है। वातला योनि-कर्कश, स्तब्ध (कठोर), शूल एवं दुर्भाने की वेदनावाली होती है। प्रथम चारों योनियों में वात की पीड़ायें रहती हैं ॥९-११॥

सदाहं प्रक्षरत्यस्वं यस्यां सा लोहितक्षरा।

सवातमुद्गिरिरेद्वीजं वामिनी रजसा युतम् ॥१२॥

प्रऋसिनीं स्यन्दते तु क्षोभिता दुःप्रसूश्च या।

स्थितं स्थितं हन्ति गर्भं पुत्रधनी रक्तसंखवात् ॥१३॥

अत्यर्थं पिचला योनिर्दाहपाकवरान्विता।

चतसृष्वपि चाद्यासु पिचलिल्लिङ्गोच्छयो भवेत् ॥१४॥

जिस योनि में से निरन्तर दाह के साथ थोड़ा थोड़ा रक्त बहता रहता है, वह लोहितक्षरा है। वामिनी योनि