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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 727

अ० ३८]

उत्तरतन्त्रम्

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बीज को (शुक्कीट को) वायु के साथ रजःकाल में बाहर कर देती है। प्रसंखिनी-योनि में विश्लोभ होने पर (सहवास में) बहुत खाव होता है, और कटिनाई से प्रसव होता है। पुत्रधनी योनि में—रक्त के खाव होने से गर्भ रह कर नष्ट हो जाता है। पिच्छा योनि में अतिशय दाह, पाक, ज्वर रहता है। प्रथम चार योनि रोगों में पिच्छा के लक्षणों की अधिकता रहती है।

वि० मन्तव्य—प्रसंखिनी—इस योनि व्यापद में गर्भाशय खिसककर नीचे आ जाता है। इसे (धरा गिरना) कहते हैं। धरा गर्भाशय का नाम है ॥१२-१४॥

अत्यानन्दा न सन्तोषं ग्राम्यधर्मण गच्छति।

कर्णिन्यां कर्णिका योनीं श्लेष्मासूग्ध्यां प्रजायते ॥१५॥

मैथुनेऽचरणा पूर्वं पुरुषादतिरिच्यते।

बहुशश्चातिचरणाद्वन्या बीजं न विन्दति ॥१६॥

श्लेष्मला पिच्छला योनिः कण्डयुक्ताऽतिगीतला।

चतसूख्यपि चाद्यासु श्लेष्मलिक्लोच्छित्तिर्भवेत् ॥१७॥

अत्यानन्दायोनि में—मैथुन से कभी तृप्ति नहीं होती।

कर्णिनीयोनि में कफ रक्त के कारण योनि में कर्णिका उत्पन्न हो जाती है। अचरणायोनि में मैथुन क्रिया में—पुरुष से पूर्व ही खाव हो जाता है। अतिचरणायोनि—बहुत मैथुन करने से बीज (गर्भ) को ग्रहण नहीं करती (यथा-वेश्याओं में) श्लेष्मला योनि—पिच्छल, कण्डयुक्त और अति शीतल रहती है (प्रायः मोटी-फैट वाली औरतों में ऐसा दीखता है)। प्रथम चारों में कफ के लक्षणों की अधिकता रहती है।

वि० मन्तव्य—बहुशश्चाति चरणा-अतिचरणा नामक योनि व्यापद में—बहुत बार खलन हो जाता है और इन अचरणा तथा अतिचरणा में गर्भाधान नहीं होता। योनि खाव वस्तुतः नारी का शुक्र है और शुक्र कफ वर्ग का पदार्थ है अतः कफजनित योनि व्यापद में ऐसा होता है। अत्यानन्दा नामक योनि व्यापद का भी यही कारण है और कर्णिनी तथा श्लेष्मला का भी यही कारण है। इन रोगों से पीड़ित नारियाँ इन रोगों के कारण बहुपुरुष गामिनी हो जाती हैं, इस दशा में सदुपदेश के साथ २ उचित चिकित्सा भी होनी चाहिये। “बहुशश्चाति चरणाद्वन्या बीजं न विन्दति” के स्थान पर “बहुशश्चाति चरणा तयोर्बीजं न तिष्ठति” पाठान्तर है, दे० डल्लन टीका। इसी पाठान्तर को भावमिश्र तथा माधवाचार्य ने उत्तम समझा है। अतः अपने ग्रन्थों में इसी पाठ को उद्धृत किया है ॥

वक्तव्य—अचरणा-पुरुषात् पूर्वमतिरिच्यते-अत्यर्थ कण्डूयते। वात्स्यायन ने स्त्री पुरुष की प्रकृति का भेद किया है—यथा पुरुष में काम की अधिकता प्रथम अधिक होती है, फिर उत्तरोत्तर घटती जाती है, स्त्री में इससे विपरीत रहता है,

उनमें पहले कम रहती है फिर उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है। उनके मानसिक भाव पुरुष से सब अवस्थाओं में विपरीत हैं, यथा: “स्त्रियः कामयंते, न तु प्राथयंते,” स्त्री पुरुष की कामना करती है, परन्तु प्रेम या विवाह का प्रस्ताव पेश नहीं करती, पुरुष चाहना भी करता है और प्रेम या विवाह की मंगनी भी करता है। इसी प्रकार मैथुन में होता है। इसी से कहा है कि न स्त्रीपुरुषवदेवभावमधिगच्छति। (२) दूसरा पक्ष चिरवेने नायके स्त्रियोंऽनुरज्यन्ते। शीघ्रवेगस्य भावमनासाद्यावसानेऽभ्यस्यिन्यो भवन्ति। तत्सर्वभावप्राप्तेऽप्राप्तिश्च लक्षणम् ॥ सातत्यात् युवतिरारम्भात्प्रभृति भावमधिगच्छति, पुरुषःपुनरन्त एव। “सुरतान्ते सुखं पुष्पां स्त्रीणां तु सततं सुखम्। यातुक्षयनिमित्ता च विरामाच्चोपजायते ॥” वात्स्यायन कामसूत्र ॥१५-१७॥

अनार्तवस्तना षण्डी खरस्पर्शा च मैथुने।

अतिकायगृहीतायास्तसृण्याः फलिन्तो भवेत् ॥१८॥

विद्युताऽतिमहायोनिः सूचीवक्त्राऽतिसंबृता।

सर्वलिङ्गसंमुखानां सर्वदोषप्रकोपजा ॥१९॥

चतसूख्यपि चाद्यासु सर्वलिङ्गोच्छित्तिर्भवेत्।

पश्चासाध्या भवन्तीमा योतयः सर्वदोषजाः ॥२०॥

षण्डी योनि में न तो आर्तव आता है, और न स्तन ही उभरे होते हैं, मैथुन में कठोर स्पर्शवाली होती है। अति लम्बे या पुष्ट मेहनवाले पुरुष के साथ छोटी उमर की स्त्री के मैथुन करने से फलिनी योनि होती है। अतिविद्युता को ही महायोनि कहते हैं, सूचिवक्त्रा योनि अतिशय सूक्ष्म मुखवाली होती है (इनमें योनि पटल-योनिविवर पर रहता है, उसका छेद बहुत छोटा या सदा बन्द होता है)। सन्निपातज योनि में—सब दोषों के लक्षण रहते हैं। प्रथम चारों में तीनों दोषों के लक्षण अधिकता से रहते हैं। सन्निपातज ये पांचों योनिरोग असाध्य हैं।

वक्तव्य—वात्स्यायन में इसी से कहा है—न प्रसन्न किंचिदाचरेत्। “इसी विचार से कामशास्त्र से श्यादि भेद पुरुषों के एवं स्त्रियों के किये हैं। जिससे मेहन के दोषजन्य, या योनि-दोषजन्य रोग उत्पन्न न हों। योनि विवर पर योनिछद्द कई कई बार बिल्कुल बन्द ही रहता है, या इसका मुख तंग रहता है, जिससे आर्तव नहीं आता—उस समय चिकित्सक इसको काट देता है”।

वि० मन्तव्य—षण्डी नामक योनिव्यापद में आर्तव नहीं होता। फलतः उससे पीड़ित नारी वन्या होती है, क्योंकि भग-

१ शशो वृषोऽख इति लिंगतो नायक विशेषः।

नायिका पुनः मृगी बहवा हस्तिनी चेति ॥

स्त्रीणां साधनमार्गोऽपि तद्वदेव प्रभिद्यते।

आयामपरिणाहृम्यां मृगदोनां शशादिवत् ॥

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