सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० २८ ]
वान् पुनर्वसु के कथनानुसार इस व्यापद् में बीज (माता पिता के शोणित एवं शुक्र) के दोष से गर्भ निर्माण काल में ही वायु द्वारा गर्भाशय का उपघात हो जाता है, और यह नारी नर से द्रेप रखती है, अर्थात् इसे मैथुन की अभिलाषा ही नहीं होती और इसके स्तन अपुष्ट होते हैं अथवा उभरते ही नहीं हैं, अर्थात् सर्वतो भाव से यह नारी अपूर्व नारी होती है। च० शा० स्था अ० ४ में भी यही कहा गया है। सच यह है, कि गर्भाशय तथा स्तन ही नारी के प्रधान-मुख्य लक्षण हैं, यह दोनों अवयव जितने अधिक पुष्ट होते हैं, उतने ही उत्तम नारीत्व के सूचक हैं। फलिनी—डरलना चार्य ने लिखा है, कि कुछ आचार्य फलिनी के स्थान में “अफलिनी” भी पढ़ते हैं, और व्याख्या करते हैं, अप्रजा अर्थात् इसमें गर्भाधान ही नहीं होता है। महायोगि—इस व्यापद् में गर्भाशय का मुख सर्वदा अत्यन्त विद्युत अर्थात् खुला ही रहता है, पुनर्वसु के कथनानुसार गर्भाशय पर मांस अधिक सन्नित हो जाता है, सर्वदा वेदना होती है, रूक्ष एवं क्षागुत्त रजः स्नाव होता है, तथा पोर २ एवं वंक्षण में शूल होता रहता है। देखिये च० चि० अ० ३०। सूचीवक्त्रा—इस व्यापद् में गर्भाशय का मुख अत्यन्त संवृत—बन्द रहता है। फलतः उसमें शुक्र का प्रवेश ही नहीं होता। इस व्यापद् को योनि छद कहना उचित नहीं प्रतीत होता। सर्वदोष प्रकोपजा—इस व्यापद् में पुनर्वसु के कथनानुसार 'धा भवेत् दाहशलात्ता श्वेतपिच्छलवाहिनी।
अर्थात् पित्त से दाह, वायु से शूल और कफ से श्वेत एवं पिच्छल स्नाव होता है। च० चि० अ० ३० में योनि व्यापदों के साथ २ शुक्र एवं शुक्रवह स्तोत्रों की विकृतियों का विशद वर्णन किया गया है ॥१८-२०॥
प्रतिदोषं तु साध्यासु स्नेहादिक्रम इष्यते। दद्यादुत्तरवस्तीश्च विशेषेण यथोदिताम् ॥२१॥
साध्य योनिरोगों में दोष के अनुसार स्नेहन आदि चिकित्सा करे। वातादि भेद से कहीं हुई उत्तर वस्तियों को विशेष रूप में बरते। (जो स्नेह जिस दोष से विपरीत हो, उससे स्नेहन करके वमनादि करे) ॥२१॥
कर्कशां शीतलां स्तब्धासल्पस्पर्शां च मैथुने। कुम्भीस्वेदौरुपचरेत् सान्नपौदकसंयुतैः ॥२२॥ मधुरौषधसंयुक्ताम् वेगवाराश्च योनिषु। निक्षिपेद्धारयेचापि पिचुतेल्लमतन्द्रितः ॥२३॥ धावनानि च पध्यानि कुर्वीतापूरणानि च।
कर्कश, शीतल, कठिन, मैथुन के स्पर्शसुख का पूर्ण अनुभव न करनेवाली योनि में—आन्नमांस और औदक मांस (कङ्कूप-मछली आदि का मांस) के साथ कुम्भीस्वेद देवे।
काकोत्त्यादि मधुर औषधियों से मिला कुडित मांस योनि में रखले। वातहर औषधियों से प्रक्षालन करे, इनसे भीगे वस्त्र योनि में रखले ॥२२,२३॥
ओषचोषान्वितासूक्तं कुर्याच्छीतं विधि भिषक् ॥२४॥ ओष—चोष (जलन, दाह) संयुक्त योनि में वैद्य कहीं हुई शीतल चिकित्सा (रक्त-पित्त, नाशक) बरते ॥२४॥ दुर्गन्धां पिच्छलां चापि चूर्णैः पञ्चकषायजैः। पूरयेद्वाजदुग्धादिकषायैश्चापि धावनम् ॥२५॥ दुर्गन्धित एवं पिच्छलयोनि में बरगद-पीपल-पिल्लवन आदि कषाय वृक्षों का चूर्ण भरे, और आरग्वधादि गन्ध के कषाय से योनि का प्रक्षालन करे ॥२५॥
योन्यां तु पूयत्वाविष्यां शोधनद्रव्यसंभूतैः। सगोमूत्रैः सलवणैः शोधनं हितमिष्यते ॥२६॥ पूयत्वाविष्योनि में मिश्रकोक्त शोधनद्रव्यों से, गोमूत्र से—थोड़ा नमक मिलाकर शोधन करना चाहिये ॥२६॥
बृहतीफलकलकस्य द्विहरिद्रायुतस्य च। कण्डूमतीमल्पस्पर्शां पूरयेद्घूपयेत्तथा ॥२७॥ वर्ति प्रदघात् कर्णिन्यां शोधनद्रव्यसंभूताम् ॥ प्रस्रसिनीं घृताभ्यर्त्तां क्षीरस्विन्नां प्रवेश्येत् ॥२८॥ पिधाय वेशवारेण ततो बन्धं समाचरेत्। प्रतिदोषं विदध्याच्च सुरारिष्टासवान् भिषक् ॥२९॥ प्रातः प्रातनिषेवेत् रसोत्पादुद्वृतं रसम्। क्षीरमांसरसप्रायमाहारं विदधीत च ॥३०॥
कण्डुयुक्त, अल्पस्पर्शावाली—योनि में बड़ी कठेरी के फल का कलक, हरदी, दारुहरदी इनसे योनि में धूप देवे, और इनसे योनि को भरे। कर्णिनी में शोधन द्रव्यों से बनी वर्ति योनि में रखले। प्रस्रसिनी (जो योनि बाहर आ जाती है) योनि में घी से अश्रंग करके, दूध से स्वेदन देकर इसे अन्दर प्रविष्ट करे, वेशवार (कुडित मांस) से बन्द करके, पट्टी बाँध देवे। दोष के अनुकूल-सुरा, आसव, अरिष्टों को बरते। प्रतिदिन प्रातःकाल लहसुन का निकाला रस पीये। दूध, मांसरसवाले अन्न का सेवन करे ॥२७-३०॥
शुक्रान्तवाद्यो दोषाः स्तनरोगाश्च कीर्तिताः। कल्लेवस्थानानि मूढस्य गर्भस्य विधिरेव च ॥३१॥ गर्भिणीप्रतिरोगेषु चिकित्सा चाभ्युदाहता। सर्वथा तां प्रयुञ्जीत योनिव्यापत्सु बुद्धिमान्। अपप्रजातारोगाश्च चिकित्सेदुत्तराद्विषक् ॥३२॥ शुक्र-आतंवा आदि दोष, स्तनरोग, जो कहे हैं, कल्लेव के कारण, मूढगर्भ के कारण और इनकी चिकित्सा, गर्भवती की मासानुमासिक एवं रक्तस्त्राव