सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 729, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३६ ]
८२
उत्तरतन्त्रम्
६७३
की चिकित्सा जो कही है, इन सबको योनिध्याप्त रोगों में बुझिमान् बरते। अकालप्रसूता के ज्वर आदि रोगों को वैद्य उत्तरतंत्र विधिसे चिकित्सा करे ॥३२॥
इति श्री सुश्रुतसंहितायासुत्तरतन्त्रान्तर्गते कुमारतन्त्रे योनि- व्यापत्प्रतिषेधो नाम (द्वादशोऽध्यायः, आदितः)
अष्टविंशतिसोऽध्यायः ॥३३॥
उत्तरतन्त्रे द्वितीयं कौमारतन्त्रं समाप्तम् ॥३४॥
एकोनचत्वारिंशत्सोऽध्यायः
अथातो ज्वरप्रतिषेधो व्याख्यास्यासमः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे ज्वर प्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे— जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—ज्वर प्रत्यात्मिक लिंगं सन्तापी देहमानसः। ज्वरेणाऽऽविशता भूतं न हि किञ्चित् न तप्यते। च० चि०।
अर्थात्—ज्वर का आत्मिक स्वीय लक्षण है देह एवं मनस का सन्ताप—स्वभाविक सन्ताप से शरीर में अधिक सन्ताप उण्णता हो जाना—क्योंकि प्राणी में ज्वर का आवेश-प्रवेश हो जाने पर कोई भी भाव तप्त हुए बिना नहीं रहता। तात्पर्य यह है कि समस्त शरीर पर ज्वर का प्रभाव होता है। अन्य सब रोगों का शरीर के भिन्न अवयवों पर ही प्रभाव पड़ता है। देह का सन्ताप स्पर्श से एवं थर्मामीटर से जाना जाता है और मनस का सन्ताप—वैचित्य अर्थात् ग्लानिः मनस्सन्तापलक्षणम्, और-इन्द्रियाणां च वैकृत्यं ज्ञेयं सन्तापलक्षणम् ॥१,२॥
येनामृतसर्पा मध्याहुदुधुत् पूर्वजन्मनि।
यतोऽमरत्वं संप्राप्नोद्भिद्भाच्छिद्विचेश्चरात् ॥३॥
शिक्ष्यास्तं देवमासीनं पप्रच्छुः सुश्रुतादयः।
व्रणस्योपद्रवाः प्रोक्ता व्रणिनामप्यतः परम् ॥४॥
समासाद् व्यासतश्चैव ब्रूहि नो भिषजांवर !।
जिसने पूर्वजन्म में समुद्र में से अमृत को निकाला, जिस धन्वन्तरि के कारण देवताओं ने अमरत्व प्राप्त किया, जैसे हुए उस देव धन्वन्तरि भगवान् से सुश्रुत आदि ने पूछा, आपने व्रण के उपद्रव तथा व्रणवाले पुरुष के उपद्रव संक्षेप में पहले कह दिये हैं, हे वैद्यों में श्रेष्ठ ! आप उनको विस्तार से कहो।
वक्तव्य—व्रण के उपद्रव-वेदना, वर्ण स्नाव आदि। व्रणवाले पुरुष के उपद्रव—
“विषर्पः पक्षपातश्च सिरास्तम्भोऽपतानकः।
मोहोन्मादो व्रणरुजा ज्वरस्तुष्णा हनुग्रहः ॥
कासरुच्छिदिरतीसारो हिक्का श्वासः सवेपथुः।
पोड्योपद्रवाः प्रोक्ताः व्रणिनां व्रणचित्तकैः” ॥३,४॥
उपद्रवेण जुष्टस्य व्रणः कृच्छ्रणे सिध्यति ॥५॥
उपद्रवास्तु व्रणिनः कृच्छ्रुसाध्याः प्रकीर्तिताः।
प्रक्षीणवलमांसस्य शेषधातुपरिक्षयान् ॥६॥
तस्मादुपद्रवान् कृत्स्नान् ब्रूहि नः सचिकित्सितान्।
सर्वकायचिकित्सासु ये दृष्टाः परमविधिः ॥७॥
उपद्रव से युक्त रोगों का व्रण कठिनाई से अच्छा होता है, व्रणरोगी के उपद्रव कष्टसाध्य होते हैं, क्योंकि व्रणरोगी का बल (उत्साह) और मांस क्षीण हो जाता है, मेद आदि दूसरे धातु भी क्षीण हो जाते हैं। इसलिये आप सब उपद्रवों को चिकित्सा के साथ हमको कहिये, जिन उपद्रवों को सम्पूर्ण काय-चिकित्सा में परमर्षि (भारद्वाज या आत्रेय) ने देखा है—कहा है।
वि० मन्तव्य—ईसवी सन् १६३६-३७ की बात है श्री दुर्गा-प्रसाद जी दी० ए० कलाविशारद श्री अर्जुन आयुर्वेद विद्यालय काशी के समापति थे। मैं कार्यवश प्रायः उनके निवास स्थान (लकडा) पर जाया-आया करता था, विद्यालय के कार्यों के अतिरिक्त अन्य विषयों पर भी वात्साल्य हुआ करता था। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि वैद्यजन ज्वर को मूल व्याधि मानते हैं, परन्तु अमेरिका के एक विद्वान् ने सिद्ध कर दिया है कि ज्वर कोई मूल व्याधि नहीं है, अपितु—किसी न किसी अन्य मूल व्याधि का लक्षण है। मैंने उनसे निवेदन किया कि यह कोई नई वस्तु नहीं है। प्राचीन शल्य-शालाक्य तन्त्रों में भी ज्वर को उपद्रव माना गया है यह सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए और तत्काल उन्होंने अपने पुस्तकालय से सुश्रुत निकालकर मेरे सामने रख दिया, मैंने यही पाठ उनको सुनाए और वे चकित होकर कहने लगे कि वह सब तो सुश्रुत के इन्हीं पाठों का अनुवाद या भावार्थ प्रतीत होता है। अस्तु, बाबू दुर्गाप्रसाद जी खत्री अपने समय के बहुत बड़े विद्वान् माने जाते थे। काशीस्थ भारत माता के मन्दिर में जो कुछ भी है वह सब उनकी ही कलाकौशल की देन है। अस्तु तात्पर्य यह है कि—काय चिकित्सा के ग्रन्थों में ज्वर आदि को मूल व्याधियाँ माना गया है और आयुर्वेद के अन्य अङ्गों में—शल्य तथा शालाक्य नामक अंगों में उसको उपद्रव माना गया है और उपद्रव का लक्षण काय चिकित्सा (चरक संहिता) में—उपद्रवस्तु खलु रोगोत्तरकालजो रोगाश्रयो रोग एव स्थूलोऽणुरा रोगात् पश्चात् जायते इति उपद्रवसंज्ञः (च० चि० अ० २१-४०) तथा शल्यतन्त्र (सुश्रुत) में—औपसर्गिको नाम यः पूर्वोत्पन्नं व्याधि जघन्यकालजातो व्याधिः उपसृजति स तन्मूल एव उपद्रवसंज्ञः (सु० सू० अ० ३५।१८)। दोनों में एक समान माना गया है। उपसर्ग का पर्याय ही उपद्रव है ॥५-७॥
तेषां तद्बचनं श्रत्वा प्राज्ञवोद्धिभषजांवरः।
ज्वरमादौ प्रवक्ष्यामि स रोगान्नीकराट् स्मृतः ॥८॥
रुद्रकोपाग्निंसंभूतः सर्वभूतप्रतापनः।
तैस्तैर्नामभिरन्येषां सत्त्वानां परिकीर्त्यते ॥९॥
सुश्रुत आदि के इन वचनों को सुनकर वैद्यों में श्रेष्ठ धन्व-