सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३२ ]
न्तरि ने कहा—कि-सबसे प्रथम ज्वर को कहूँगा, क्योंकि वह ज्वर रोगसमूहों का राजा है, यह ज्वर रुद्र की कोपाग्नि से उत्पन्न हुआ है, सब प्राणियों को तपानेवाला है। हाथी, घोड़े आदि दूसरे प्राणियों में भिन्न-भिन्न नामों से कहा जाता है।
वक्तव्य—भिन्न-भिन्न नामों से ज्वर, यथा—हस्तिषु पाकलः, गोषु खैरिको, मत्स्यानामिद्र जालो, विहंगानां आमरकः इत्यादि शब्दों से कहा जाता है ॥८,९॥
जन्मादौ निधने चैव प्रायो विशति देहिनम्।
अतः सर्वविकाराणामस्य राजा प्रकीर्तितः ॥१०॥
यह ज्वर जन्म के प्रारम्भ में और मृत्यु काल में प्रायः करके प्राणियों में होता है, इसलिये सब रोगों का यह राजा कहा जाता है।
“ज्वरस्तु खलु महेश्वरकोपप्रभवः सर्वप्राणिनां प्राणहरः देहेन्द्रियमनस्तापकरः प्रज्ञावल्क्षणहर्षोत्साहहासकरः श्रमकूलममो-हाहारोपोषसंजननो, ज्वरयति शरीराणि इति ज्वरः स सर्वरो-गाधिपतिः नानातिर्यग्योनिषु च बहुविधैः शब्दैः अभिधीयते। सर्वे प्राणभूतश्च सज्जरा एव जायन्ते, सज्जरा एव म्रियन्ते च, स महामोहः”। चरक नि० अ० १-४० ॥१०॥
ऋते देवमनुष्येभ्यो नान्यो विषहते तु तम्।
कर्मणा लभते यस्मादेवत्वं मानुषादपि ॥११॥
पुनश्चैव न्युतः स्वर्गान्मानुष्यमनुवर्तते।
तस्मान्ते देवभावेन सहन्ते मानुषा ज्वरम् ॥१२॥
शेषाः सर्वे विपद्यन्ते तैर्यग्योना ज्वरादिताः।
देवताओं और मनुष्यों के बिना कोई भी प्राणी ज्वर को सहन नहीं करता। कर्म के कारण से ही मनुष्य देवत्व को प्राप्त करते हैं। और फिर ये ही स्वर्ग से न्युत होकर पृथ्वी पर मनुष्य रूप में लौट आते हैं। इसलिये देवत्व गुण के होने से मनुष्य ज्वर को सहन कर लेते हैं, शेष पशु-पक्षिपुनि के प्राणी ज्वर से पीड़ित होने पर नष्ट हो जाते हैं ॥११,१२॥
स्वेदावरोधः सन्तापः सर्वाङ्गग्रहणं तथा ॥१३॥
विकारा युगपद्यस्मिन् ज्वरः स परिकीर्तितः।
पसीने का अवरोध, सन्ताप, सब अंगों का पकड़ा जाना, ये सब लक्षण एक साथ-मिलित रूप से जिस रोग में होते हैं, उसे ज्वर कहते हैं।
वक्तव्य—स्वेदावरोध, यह लक्षण प्राथिक है, क्योंकि पिच्छ ज्वर में पसीना आता है। सन्ताप-शरीर और मन दोनों का होता है, यथा—“वैचित्र्यमरतिरल्लिनिः मनस्संतापलक्षणम्। इन्द्रियाणां च वैकृत्यं ज्ञेयं सन्तापलक्षणम्। ज्वरेणाविशता भूतं न हि किञ्चिन्न तप्यते। ज्वरप्रत्यात्मिकं लिंगं सन्तापो देह-मानसः ॥” शरीर और मन का सन्ताप होना ही, ज्वर का अपना विशेष लक्षण है ॥१३॥
दोषैः पृथक् समससौरुच इन्द्रैरागन्तुरेव च ॥१४॥
अनेककारणोत्पन्नः स्मृतस्त्वष्टविधो ज्वरः।
ज्वर आठ प्रकार का है, यथा-पृथग् दोषों से तीन, सन्नि-पातज एक, दो-दो दोषों से तीन, आगन्तुज एक, इस प्रकार से ज्वर आठ प्रकार का है ॥१४॥
दोषाः प्रकृपिताः स्वेषु कालेषु स्वेः प्रकोपणैः ॥१५॥
न्याप्य देहमशेषेण ज्वरमापादयन्ति हि।
दुष्टाः स्वेहेतुभिर्दोषाः प्राप्यामाशयमूढमणा ॥१६॥
सहिता रसमागत्य रसस्वेदप्रवाहिणाम्।
क्षोतसां मार्गमावृत्य मन्दीकृत्य हुताशनम् ॥१७॥
निरस्य बहिरूष्माणि पक्किस्थानाच्छु केवलम्।
शरीरं समभिन्व्याप्य स्वकालेषु ज्वरागमम् ॥१८॥
जनयन्त्यथ वृद्धिं वा स्ववर्णं च त्वगाद्विषु।
सम्प्राप्ति—प्रावृद्ध शरद्- वसन्त ऋतु अथवा दिन रात के अपने-अपने समय में अपने प्रकोपक कारणों से प्रकृपित हुए दोष सम्पूर्ण शरीर में फैलकर ज्वर को उत्पन्न करते हैं। क्योंकि अपने कारणों से दूषित हुए दोष आमाशय में पहुँचकर उष्णमा के साथ मिलकर रस (हृदय) में आकर, रस एवं स्वेदवह क्षोतों के मार्गों को बन्द करके, अग्नि को मन्द बनाकर, और पक्किस्थान (अग्निस्थान) से उष्णमा को बाहर निकालकर सम्पूर्ण शरीर में फैलाकर अपने समय में (वातादि के प्रकोपक समय पर) ज्वर के वेग को उत्पन्न करते हैं, अथवा अपने समय में ज्वर को बढ़ाते हैं, और त्वचा, नख, नयन, मूत्र आदि में अपना वर्ण (दोष का वर्ण) उत्पन्न करते हैं।
“स यदा प्रकृपितः प्रविश्यामाशयमूषणः स्थानमुष्मणा सह मिश्रीभूयाद्यमाहारपरिणामं धातुं रसनामानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि क्षोतांसि पिषायाग्निमुपहस्य पक्किस्थानादुष्माणं बहिः निरस्य केवलं शरीरमनुपपद्यते, तदा ज्वरसमिन्निवर्त्यति ॥”
चरक नि० अ० १-३०
वातज्वर—“जरणान्ते दिवसान्ते निशान्ते घर्मान्ते ज्वराभ्या-गमनमभिबृद्धिर्वा ज्वरस्य, विशेषेण पश्चाक्षणवर्णस्वं, नखनयन-वदनमूत्रपुरीषत्वचामत्यर्थकलुसीभावश्च अनेकविधोष्माणश्च-लाश्व वेदानस्तेषां तेषामंगावयवानाम् ॥”
पिच्छज्वर—“युगपदेव केवलं शरीरेज्वरस्यागमनमभि-बृद्धिर्वा मुक्तस्य विदाहकाले मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे शरदि वा विशे-षेण, कटुकास्यात्” “हरितहारित्वं नखनयनवदनमूत्रपुरीषत्व-चामत्यर्थमुष्मणस्तीव्रभावोऽतिमार्त्रं चदाहः ॥”
कफज्वर—“युगपदेव शरीरे ज्वरस्यागमनमभिबृद्धिर्वा, मुक्तमात्रे, पूर्वार्द्धे, पूर्वरात्रे, वसन्तकाले वा विशेषेण गुरुमात्र-त्वम्, “.....श्वेत्ये च नखनयनवदनमूत्रपुरीषत्वचामत्यर्थं च ॥”
चरक नि० अ० १ ॥१५-१८॥