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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० २६ ]

उत्तरतन्त्रम्

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मिथ्यातिषु कैरपि च स्नेहाद्यैः कर्मभिर्नृणाम् ॥१६॥ विविधादभिघाताच्च रोगोत्थानात् प्रपाकतः । श्रमात् क्षयादजीर्णान्च विघात्सत्स्यतुर्पर्ययात् ॥२०॥ औषधीपुष्पगन्धान्च शोकाश्वत्रपीडया । अभिचाराभिज्ञापार्थ्या मनोभूताभिज्ञङ्क्या ॥२१॥ क्षीणामपप्रजातानां प्रजातानां तथाऽहिदैः । स्तन्यावतरणे चैव ज्वरो दोषैः प्रवर्तते ॥२२॥

स्नेहन-वमन आदि कार्यों के मिथ्यारूप में या अतिमात्रा में सेवन करने से, नानाप्रकार के अभिघात से, विद्रधि आदि रोगों के कारणों से तथा विद्रधि आदि रोगों के प्रपाक से, श्रम से, क्षय से, आम-अजीर्ण से, त्रिष से, सात्त्व्य या श्रुतु के परिवर्तन से, औषधि पुष्प की गन्ध से, शोक से, जन्म नक्षत्र की क्रूर पीड़ा से, अभिचार (कृत्या-या मंत्रादि जनित पीड़ा) से, अभिशाप से (देवता-गुरु-बुद्ध आदि के शाप से), मन के अभिषंग से (काम-क्रोधादि से), भूताभिषंग से (देवादि ग्रह से), असम्यक् प्रसूता स्त्रियों के भी मिथ्या आहार-विहार से, धावन के उत्तरने के समय दोषजन्य ज्वर होता है।

वक्तव्य—औषधिपुष्प गन्धक ज्वर—जैसे 'हे फीवर' (Hay Fever) अभिषंग-सम्बन्ध, श्रुतु विपर्यय, से यथा— Summer diarhold (ग्रोष्मातीसार), धावन का ज्वर— Milk fever ॥१६-२२॥

तैर्वंगवद्धिर्बहुधा समुद्रभ्रान्तैर्विमागंगैः । विश्विष्यमाणोऽन्तरग्नितैर्भवत्याशु बहिश्चरः ॥२३॥ रूणद्धि चाप्यपां धातुं यस्मात्सस्माज्ज्वरातुरः । भवत्यत्युष्णगात्रश्च ज्वरितस्तेन चोच्यते ॥२४॥

उन वेगवाले, इधर-उधर विश्विष्य हुए, विमागंगामि (तिर्गंगामि) बने दोषों से बहुत प्रकार से प्रेरित की हुई अन्तरग्न शीघ्र ही बाहर आ जाती है, और स्वेद को रोक देती है, इसलिये ज्वर रोगी का सारा शरीर गरम हो जाता है, इससे उसे 'ज्वरित' ज्वरवाला कहा जाता है।

वक्तव्य—अन्तरग्न रोमकूपों में बाहर आ जाती है, परन्तु स्वेदवह क्षोतों के बन्द होने से पसीना नहीं होता ॥२३,२४॥ श्रमोऽरतिर्विर्णत्वं वैरस्यं नयनप्लवः । इच्छाद्वेषौ मुहुश्चापि शीतवातात्पादिषु ॥२५॥ जूष्माऽङ्गमर्दां गुरुता रोमहर्षोऽरुचिस्तमः । अग्रहर्षश्च शीतं च भवत्युत्पत्त्यति ज्वरे ॥२६॥ सामान्यतो विशेषात्तु जूष्माऽत्यर्थं समीरणात् । पित्तान्नयनयोर्द्विहः कफाज्ज्ञान्ताभिनन्दनम् ॥२७॥ सर्वल्लिङ्गसमवायः सर्वदोषप्रकोपजे । द्वयोर्द्वयोस्तु रूपेण संसृतं द्रन्द्वजं विदुः ॥२८॥

पूर्वरूप—थकान, बेचैनी, विवर्णता, विरसता आंतों में आंसू, शीत-वायु-धूप आदि में बार-बार कभी इच्छा और कभी द्वेष होना, जम्भाई, अंगों का दूटना, भारीपन, रोमांचता, अरुचि, अन्धकार (मन में तमोभाव-बुद्धि का काम न करना), आनन्द का अभाव, शीत की प्रतीति होना—ये लक्षण उत्पन्न होनेवाले ज्वर में होते हैं। ये सामान्य पूर्वरूप के लक्षण हैं। विशेष पूर्वरूप के लक्षण-वात में जम्भाई विशेषकर आती है, पित्त से आंतों में दाह, कफ से अन्न में अरुचि होती है, तीनों दोषों का प्रकोप होने पर तीनों दोषों के लक्षण मिले रहते हैं। दो-दो दोषों के संसर्ग से, दो-दो दोषों के सम्मिलित लक्षण द्रन्द्व ज्वरों में होते हैं ॥२५-२८॥

वेपशुर्विषमो वेगः कण्ठौष्णपरिशोषणम् । निद्रानाशः क्षुतः स्तम्भो गात्राणां रौदयमेव च ॥२९॥ शिरोहृद्ग्रात्ररुक्वक्रवैरस्यं बद्धविट्कता । जूष्माऽऽधमानं तथा शुलं भवत्यनिलजे ज्वरे ॥३०॥ वातजन्यज्वर में—कम्पन, ज्वर का वेग अनियमित, कण्ठ और ओठ का सूखना, नींद न आना, छाँक का रुकना, शरीर में रुक्षता, शिर हृदय और अंगों में दर्द, मुख की विरसता, मल का अवरोध, जम्भाई, आधमान, शुल होता है ॥२९,३०॥

वेगस्तीक्ष्णोऽतिसारश्च निद्राल्परत्वं तथा वमिः । कण्ठौष्णमुखनासानां पाकः स्वेदश्च जायते ॥३१॥ प्रलापः कटुता वक्त्रे मूच्छां दाहो मदस्त्रषा । पीतविषमूत्रनेत्रत्वं पैत्तिके श्रम एव च ॥३२॥ पित्तजन्यज्वर में—ज्वर का वेग तीक्ष्ण रहता है, अतीसार, नींद का कम आना, वमन, कण्ठ-ओठ-मुख और नासा का पकना, पसीना आना, प्रलाप, मुख में कटुता, मूच्छां दाह, मद, प्यास, मल-मूत्र और नेत्र में पीलापन, और चक्कर आना होता है ॥३१,३२॥

गौरवं शीतमुक्त्तेशो रोमहर्षोऽतिनिद्रता । क्षोतोरोधो रूगल्परत्वं प्रसेको मधुरास्यता ॥३३॥ नात्युष्णगात्रता छर्दिरङ्गसादोऽविपाकता । प्रतिदयायोऽरुचिः कासः कफजेदोश्च गुक्कता ॥३४॥ कफजन्यज्वर में—भारीपन, शीतलता, जी मचलाना, रोमहर्ष, नींद की अधिकता, क्षोतों का बन्द होना, मन्द वेदनायें, मुख से शूक आना, मुख में मिठास, अंगों का बहुत गरम न होना, वमन, अंगों का दूटना, अजीर्ण, प्रतिशयय, अरुचि, कास और आंतों में सफेदी होती है ॥३३,३४॥

निद्रानाशो श्रमः श्वासस्तन्ना सुसाङ्कताऽरुचिः । तृष्णामोहो मदः स्तम्भो दाहः शीतं हृदि व्यथा ॥ पत्किश्चिरेण दोषाणामुन्मादः श्यावदन्तता । रसना परुषा कृष्णा सन्धिमूर्धोस्थिजा रूजः ॥३६॥