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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३२ ]

निर्मुग्ने कलुषे नेत्रे कणौ शब्दरुगन्वितौ । प्रलापः चोतसां पाकः कूजनं चेतनान्युतिः ॥३७॥ स्वेदभूत्रपुरीषाणामल्पशः सुचिरात् क्षतिः । सन्निपातज्वरं में—निद्रानाश, भ्रम, श्वास, तन्त्रा, अंगों का सोना (संशर्शिता), अरुति, प्यास, मूर्छा, मद, स्तम्भता, शीतप्रतीति, हृदय में पीड़ा, देर से दौषों का परिपाक, उन्माद, दांतों का काला पड़ना, जिह्वा-कर्कश और काली, सन्निपात और अस्थियों में दर्द, नेत्र कुटिल और मलिन, कानों में शब्द और वेदना, प्रलाप, सुख-नाश आदि छिद्रों का पाक, करा-हना, चेतनानाश, पसीना-मूत्र मल का बहुत देर में—थोड़ा-थोड़ा करके बाहर आना होता है। सन्निपातजन्य ज्वर में सब दौषों के लक्षण होते हैं ॥३५-३७॥

सर्वजै सर्वल्लिङ्गानि विशेषं चात्र मे शृणु ॥३८॥ नात्युष्णशीतोत्पत्तसंज्ञो आन्तप्रेक्षी हतस्वरः । खरजिह्वाः शुष्ककण्ठः स्वेदविष्णमूत्रवर्जितः ॥३९॥ सास्रो निमुग्धहृदयो भक्तद्वेषी हतप्रभः । श्वसननिपतिः शैते प्रलापोपद्रवायुतः ॥४०॥ तमभिन्यासमित्याहुर्हतौजसमथापरे ।

इसमें विशेष सन्निपात के लक्षण सुनो—रोगी के अंगों का स्पर्श साधारण रहता है, थोड़ी चेतना, सब पदार्थों को मिथ्या देखनेवाला (आँखों के सामने घागे या जाल देखना), स्वर का बैठ जाना (आवाज न निकलना), जिह्वा में कर्कशता, गले का सूखना, पसीना-मूत्र-मल का अभाव, आँखों में आंसू, हृदय में ऐंठन, भोजन से द्वेष, प्रभा का नष्ट होना, जोर से या कठिनाई से श्वास लेते हुए गिरना या लेटे रहना, प्रलाप करते रहना, इस सन्निपात को अभिन्यास या हतौजस कहते हैं।

वक्तव्य—‘ओज’—एक अदृश्य वस्तु होते हुए भी दृश्य है, जिस प्रकार की बिजली या बिजली का स्पर्क, इनको हम देखते हुए भी नहीं देखते, जैसे क्रोध को। ओज—कान्ति, बल है, वह इसमें चला जाता है। ये लक्षण विकृति विषम समवेत दौषों के हैं। प्रकृति सम समवेत सन्निपात के लक्षण ऊपर कह दिये हैं ॥३८-४०॥

सन्निपातज्वरं कृच्छ्रमसाध्यमपरे विदुः ॥४१॥ सन्निपातजन्य कष्ट साध्य हैं, दूसरे उसे असाध्य कहते हैं ॥ निद्रोपेतमभिन्यासं क्षीणमेनं हतौजसम् । संन्यस्तगात्रं संन्यासं विद्यात्सर्वोत्तमके ज्वरे ॥४२॥

जिस सन्निपातज्वर में निद्रा की अधिकता रहे—रोगी सोया ही रहे (बेमान पड़ा रहे), उसे अभिन्यास कहते हैं। दिन प्रतिदिन क्षीण होता जाये वह हतौजस, जिसमें गात्र

(अंग) ढीले रह जायें (रोगी का उनपर अधिकार न रहे) उसे संन्यास कहते हैं।

वक्तव्य—तृण पुष्पक ज्वर के लक्षण—ड० टी० ‘पुष्पेभ्यो गन्धरजसी तेजस्विभ्यो यदाऽनिलः। उपादाय मनुष्यस्य प्राणा-पानो नियच्छति ॥ सौध्यादानुस्तो धातून् ममार्णयपि च तेजसा। कर्म चित्तं बलं ज्ञानं तदास्याभ्येति माखतः ॥ कर्मादिषु निरुद्धेषु स्वप्नोति सुहृज्जनः। मन्यते हतचित्तत्वादौजस्युपरते सति ॥ तस्यादितः शिरोरोगः संसन्नस्येव जायते। विगन्धं च सुगन्धं च हृष्वाऽकस्मात् स मूच्छति ॥ तृणपुष्पकमित्येवं ज्वरं विद्याद् विचक्षणः ॥’ इसका अन्तर्भाव आगन्तुज ज्वर में है।

ओजो विस्संसते यस्य पित्तानिलसमुच्छ्रयात् । स गात्रस्तम्भशीताभ्यां शयनेष्युत्तरेचतनः ॥४३॥ अपि जाग्रत् स्वप्नं जन्तुस्तन्द्वालुक्ष्म प्रलापवान् । संहृष्टरोमा स्रस्ताङ्गो मन्दसन्तापवेदनः ॥४४॥ ओजोनिरोधजं तस्य जानीयात् कुशलो भिषक् ।

पित्त और वायु की अधिकता के कारण जिसका ओज विस्संसित (चलायमान) हो जाता है, उसका शरीर ठण्डा और स्तम्भ बन जाता है, रोगी सदा सोना ही चाहता है, जागते हुए या सोते हुए वह बेमान रहता है, तन्त्रा एवं प्रलाप की अधिकता रहती है, शरीर की ऊँचाट खड़ी रहती है, अंग ढीले रहते हैं, वेदना और सन्ताप (हाथ से छूने पर भी) कम रहता है, इस सन्निपात को वैद्य ओज के निरोध से उत्पन्न हुआ जाने ॥४३,४४॥

सप्तमे दिवसे प्राप्ते दशमे द्वादशेऽपि वा ॥४५॥ पुनर्धोरतरो भूत्वा प्रशमं याति हन्ति वा । सातवें दिन या दसवें दिन अथवा बारहवें दिन फिर एक बार तीव्र रूप में आकर सन्निपात ज्वर या तो शांत हो जाता है, अथवा रोगी को मार देता है।

वक्तव्य—सात, दस या बारह दिन की कल्पना बात, पित्त कफ की दृष्टि से की है, इन दिनों में यदि दौष का पाक हो गया तब ज्वर शांत हो जाता है, अन्यथा फिर बढ़ता है। धातुपाक का लक्षण—संबाध्यमानो हृदि नाभिदेशे गात्रेषु वा पाकश्चोज्जितेषु । पक्वेभिवानेतिरुजं ज्वरात् संधातुपाकी कथितो भिषगभिः ॥” कई आचार्यों ने सन्निपात ज्वर का मोक्षकाल उपर्युक्त समय से दुगुना माना है, यथा—“सप्तमी द्विगुना या तु नवम्येकादशी तथा, एषा त्रिदोषमर्यादा मोक्षाय च वद्याय च ॥” प्रत्येक आक्रमण में (रिलेप्स में) ज्वर की भयानकता रोगी के लिये बढ़ती जाती है ॥४५॥

द्विदोषोच्छ्रायल्लिङ्गस्तु द्वन्द्वजाक्षविध्याः स्मृताः ॥४६॥ दो दौषों के संयोग से संग्रह ज्वर दो दौषों के लक्षणों की अधिकतावाले होते हैं, ये तीन हैं, यथा—वात-पित्तजन्य, वात-कफजन्य, पित्तकफजन्य ॥४६॥

१ लेखक की ‘भारतीय रस पद्धति’ पुस्तक में ओज को समझिये।