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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३६ ]

जतपुष्पावचाकुष्ठदेवदारुहरेणुकाः ॥१७१॥ कुस्तुमुखरुणि नलदं मुस्तं चैवाप्सु साधयेत् । क्षौद्रेण सितयाचापि युक्तः क्वाथोऽनिलाधिके ॥१७२॥ सौफ, वच, कूठ, देवदारु, हरेणु, धनिया, खस, मुस्ता इनका जल में क्वाथ करे, इसमें मधु और शर्करा मिलाकर पीये, वातप्रधान ज्वर में यह क्वाथ उत्तम है ॥१७१,१७२॥ द्राक्षागुड्डीकाशर्मयत्रायमाणः ससारिवाः । निष्कक्वाथ्य सगुडं क्वाथं पिवेद्वातकृते ज्वरे ॥१७३॥ गुड्डीच्याः स्वरसो प्राहः शतावरीश्च तत्समः । निहन्त्यात्सगुडः पीतः सद्योऽनिलकृतं ज्वरम् ॥१७४॥ द्राक्षा, गिलोय, गम्भारी, त्रायमाण, सारिवा इनका क्वाथ करके गुड्डीमिलाकर वातजन्यज्वर में पीये । गिलोय का स्वरस, इनके समान शतावरी का स्वरस मिलाकर-गुड् के साथ पीने से वातजन्यज्वर शान्त होता है ॥१७३,१७४॥ घृताभ्यङ्गस्वेदलेपानवस्थासु च योजयेत् । जीर्णज्वरं त्वचा में स्थित हो तो घी का अभ्यंग करे । शीत होने पर स्वेदन और आलेपन करे । श्रोपर्णीचन्दनोशीरपल्लवकमधूकजः ॥१७५॥ शर्करामधुरो हन्ति क्वाथः पित्तकं ज्वरम् । गम्भारी, चन्दन, खस, फालसा, महुआ इनके क्वाथ को शर्करा मिलाकर मधुर बना कर देवे, इससे पित्तज्वर शान्त होता है ॥१७५॥ पीतं पित्तज्वरं हन्यात्सारिवाद्यं सशर्करम् ॥१७६॥ सारिवादिद्रव्य गण का क्वाथ शर्करा के साथ पीने से पित्तज्वर को नष्ट करता है ॥१७६॥ सयष्टीमधुकं हन्यात्तथैवोत्पलपूर्वकम् । उत्पलादिगणं मुलेहटी मिलाकर क्वाथ करके पीने से (शर्करा मिलाकर) पित्तज्वर नष्ट होता है । श्रुतं शीतक्वाथं वा सोत्पलं शर्करायुतम् ॥१७७॥ उत्पलादि गण का क्वाथ या शीतक्वाथ शर्करा के साथ पित्तज्वर में पीये ॥१७७॥ गुड्डीचीपद्मरोध्राणां सारिवोत्पलयोस्तथा । शर्करामधुरः क्वाथः शीतः पित्तज्वरापहः ॥१७८॥ गिलोय, कमल, लोथ, सारिवा, नीलोफर इनका शीतक्वाथ शर्करा से मधुर बनाकर पीने से पित्तज्वर नाशक है ॥१७८॥ द्राक्षारगवधयोश्चापि काइमर्थस्याथवा पुनः । स्वादुतिक्तक्वाथाणां क्वाथैः शर्करायुतैः ॥१७९॥ सुगीतः शमयेत्तृष्णं प्रवृद्धां दाहमेव च ।

द्राक्षा और अमलतास का शीतक्वाथ, गम्भारी का शीत- क्वाथ, द्राक्षा-मुलेहटी, सारिवादि मधुर, धमास, पित्तापक्का, चिरायता आदि तिक्त, पद्मा-नीलोफर आदि क्वाथ द्रव्यों का शीतक्वाथ शर्करा से मधुर करके पीने पर तृष्णा एवं प्रवृद्ध दाह को शान्त करता है । (ये तीन योग हैं) अथवा क्वाथ करके इसे ठण्डा करके देवे ॥१७९॥ शीतं मधुयुतं तोयमाकृष्ठाद्वा पिपासितम् ॥१८०॥ वामयेत्पाययित्वा तु तेन तृष्णा प्रशम्यति । प्यास से पीड़ित रोगी को मधु मिश्रित शीतल जल पेट भरके पिलाकर वमन कराये, इससे प्यास शान्त होती है ॥१८०॥ क्षीरैः क्षोरिकषायैश्च सुशीतेश्चन्दनायुतैः ॥१८१॥ अन्तर्दाहि विधातव्यमेभिर्चान्यैश्च शीतलैः । अन्तर्दाहि होने पर दूध से, बरगद आदि क्षीर द्रव्यों के क्वाथ में चन्दन आदि शीतल द्रव्य मिलाकर इनको शीतल करके इनसे, तथा काकोल्यादि शीतवीय शीतस्पर्शद्रव्यों से बहिः परिमार्जन करना चाहिये । (पान, आलेपन, परिषेक, अवागहन करे) । वक्तव्यं—कांजी, सिरका, कोलनवाटर-मद्य-ये अम्ल बाह्य उपचार में शीतल हैं । इसलिये इनका उपयोग ज्वर में बाह्य होता है ॥१८१॥ पद्मकं मधुकं द्राक्षां पुण्डरीकमथोत्पलम् ॥१८२॥ यवान् श्रुतानुशीराणि समझां काइमरीफलम् । निदध्यादप्सु चालोक्ष्य निशापर्युषितं ततः ॥१८३॥ क्षौद्रेण युक्तं पिवतो ज्वरदाहौ प्रशम्यतः । पद्माख, मुलेहटी, द्राक्षा, कमल, नीलोफर भूने हुए जौ, खस, मंजीठ, गम्भारीफल, इनका चूर्ण पानी में घोलकर रात भर रक्खा रहने देवे । प्रातः इसको नितारकर मधु मिलाकर पीने से रोगी का ज्वर और दाह शान्त होता है ॥१८२,१८३॥ जिह्वातालग्लकलमशोषे मूर्धनं च दापयेत् ॥१८४॥ जिह्वा-तालु-गला-कलम के शुष्क होने पर शिर पर पद्माख आदि का शीतल लेप या परिषेक करे ॥१८४॥ केसरं मातुलुङ्गस्थं मधुसैन्धवसंयुतम् । शर्करादाडिमाभ्यां वा द्राक्षाखजूरयोस्तथा ॥१८५॥ वैरस्ये धारयेत्कल्कं गणद्वेषं च तथा हितम् । बिजोरे के केसर, मधु और सैन्धव अथवा शर्करा, अनार, द्राक्षा और खजूर इनका कल्क या गणद्वेष मुख में धारण करना उत्तम है । (चरक ने दातुन करने का विधान किया है) ॥ समच्छदं गुड्डीचीं च निम्बं स्फूर्जकमेव च ॥१८६॥ क्वाथयित्वा पिवेत् क्वाथं सक्षौद्रं कफजे ज्वरे । कफज्वर में—सप्तर्ण, गिलोय, नीम, स्फूर्जक (मरवा)