सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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इनको, तथा नवधान्यादि वर्ग (सूत्र स्थान में ब्रणितोपासनीय में कहे) का संक्षेप में त्याग करे ॥१५६-१५८॥
अनवस्थितदोषाग्नेरेभिः सन्धुक्षितो ज्वरः ।
गम्भीरतीक्ष्णवेगत्वं यात्यसाध्यत्वमेव च ॥१५९॥
परिपेक आदि आहार विहार के सेवन करने से अस्थिर दोषवाले तरुणज्वर रोगी में ज्वर बढ़कर गम्भीर एवं तीक्ष्ण वेगवाला हो जाता है अथवा असाध्य हो जाता है ॥१५९॥
शीतोत्पीर्दवास्वप्नक्रोधव्यायामयोषितः ।
न सेवेत ज्वरोत्सृष्टो यावन्न बलवान् भवेत् ॥१६०॥
मुक्तस्यापि ज्वरेणाशु दुर्बलस्याहितैज्जरः ।
प्रत्यापन्नो दहेहेहं शुष्कं वृक्षमिवानलः ॥१६१॥
तस्मात्कार्यः परीहारो ज्वरमुत्केचिरिक्तवत् ।
यावन्न प्रकृतिस्थः स्यादोषतः प्राणतस्तथा ॥१६२॥
ज्वरमुक्त मनुष्य जब तक बलवान् न हो तब तक शीतल जल, दिन में सोना, क्रोध, व्यायाम और स्त्री सेवन न करे । क्योंकि ज्वरमुक्त रोगी के दुर्बल होने से अहित सेवन करने पर ज्वर शीघ्र ही लौटकर शरीर को जला देता है, जिस प्रकार शुष्क वृक्ष को अग्नि जला देती है । इसलिये ज्वर मुक्त रोगी को विरेचन की भाँति परहेजी पालनी चाहिये । जब तक कि वह दोष एवं प्राण (बल) से असली स्वभाव में न आजाये ।
“व्यायामं च ध्यवार्यं च स्नानं चक्रमणानि च । ज्वरमुक्तो न सेवेत यावन्न बलवान् भवेत् ॥ असंजातबलो यस्तु ज्वरमुक्तो निषेवते । वज्रमेतन्नरस्तस्य पुनरावर्तते ज्वरः ॥ विगतकलमसंतापमव्यर्थं विमलेन्द्रियम् । युक्तं प्रकृतिसत्त्वेन विद्यात् पुरुषमज्वरम् ॥” चरक ॥१६०-१६२॥
ज्वरे प्रमोहो भवति स्वल्पैरप्यवचेष्टितैः ।
निषण्णं भोजयेत्सस्मान्मूत्रोच्चारौ च कार्येत् ॥१६३॥
ज्वर में थोड़ासा भी उठना-बैठना-चलना करने से मूत्रार्थ हो जाती है । इसलिये विस्तर पर बिठाये या ल्टाये रोगी को ही भोजन देवे और वहाँ पर मल-मूत्र त्याग कराये ॥१६३॥
अरोचके गात्रसादे वैषण्येऽङ्गमलादिषु ।
शान्तज्वरोऽपि शोध्यः स्यादनुबन्धभयान्तरः ॥१६४॥
अरोचक, अंगों में स्थितलता, विवर्णता, अंगों में मलिनता होने पर-ज्वर के शान्त (लीनरूप) हो जाने पर भी रोगी को शोधन देना चाहिये, जिससे कि पुनः ज्वर का आक्रमण न हो ।
“दुर्हितेषु च दोषेषु यस्य वा विनिवर्चते ।
स्वरूपेनाप्यवचारेण तस्य व्यावर्चते पुनः ॥” च० ॥
न जातु स्नापयेत् प्राज्ञः सहसा ज्वरकशितम् ।
तेन संदूषितो ह्यस्य पुनरेव भवेज्ज्वरः ॥१६५॥
ज्वर से कुछ हुए व्यक्ति को बुद्धिमान् सहसा स्नान न कराये । इस स्नान से दूषित हुआ ज्वर पुनः लौट आता है (जल्दी स्नान न कराये, बल आने पर स्नान करावे) ॥१६५॥
चिकित्सेच्च ज्वरान् सर्वान्निमित्तानां विपर्ययेः ।
श्रमक्षयाभिघातोत्थे मूलव्याधिमुपाचरेत् ॥१६६॥
छीणासपप्रजातानां स्तन्यावतरणे च यः ।
तत्र संशमनं कुर्याद्यथा दोषं विधानवित् ॥१६७॥
सब ज्वरों की चिकित्सा इनके कारणों से विपरीत करे । परन्तु श्रम, क्षय या अभिघातजन्य ज्वर में मूल दोष (वायु) की चिकित्सा करे । स्त्रियों में सम्यक् प्रसव न होने के कारण या स्तन्य (धावन) के प्रथम अवतरणकाल में जो ज्वर हो, उसमें दोष के अनुसार संशमन चिकित्सा वैद्य करे । (अप्रजाता-पतितगर्भाः स्त्रियः-इल्लुण) संशमन-पाचन कषाय ॥
अतः संशमनीयानि कषायानि निबोध मे ।
सर्वज्वरेषु देयानि यानि वैद्येन जानता ॥१६८॥
इसके आगे मुझ से संशमन कषायों को सुनो, जिन कषायों को जाननेवाला वैद्य सब ज्वरों में दे सकता है ।
वक्तव्य-कषाय कल्पना “भेयजातु षोडशगुणं जलं, क्वाथं पलं मतम् । चतुर्भागावशेषं तु पेयमेवं सुखार्थिना । उत्तमस्य पलं मानं त्रिभिः कर्षैश्च मध्यमे । जवन्मस्य पलायं च स्नेहक्वाथौषधेषु च ॥” बृद्धवैद्य अष्ट गुण जल में क्वाथ करते हैं । साधारणतः अमलतास आदि कोमल द्रव्यों में चार गुणा, हरड आदि में आठ गुणा, खैर आदि कठिन द्रव्यों में सोलह गुणा जल लेकर चतुर्थांश रखते हैं । यदि द्रव्य की मात्रा अधिक हो, अथवा पूरा रस न आये, तो इसको सायंकाल फिर क्वाथ करके देते हैं ॥१६८॥
पिप्पलीसारिवाद्राक्षाशतपुष्पाहरेणुभिः ।
कृतः कषायः सगुडो हन्याच्छ्वसनजं ज्वरम् ॥१६९॥
पिप्पली, सारिवा, द्राक्षा, सौफ, हरेणु इनके कषाय में गुड मिलाकर देना वातज्वर को नष्ट करता है ॥१६९॥
श्रुतं शीतकषायं वा गुडुच्छयाः पेयमेव तु ।
कफानुबन्ध वातज्वर में गिलोय का श्रुत कषाय देवे, पिचानुबन्ध वातज्वर में गिलोय का शीत कषाय देवे । शीत कषाय कल्पना —
“द्रव्यादापोहितवात्तोये प्रतसे संस्थितास्त्रिशि । कषायो योऽभिनिर्नयति सशीतः समुदाहृतः” ॥१६९॥
बलादमैडवदृष्णां कषायं पादशेषितम् ॥१७०॥
शर्कराघृतसंयुक्तं पिबेद्वातज्वरापहम् ।
बला, दाम, गोखरु इनका क्वाथ चौथाई शेष रखकर शर्करा और घृत के साथ मिलाकर पीये, यह वातज्वर नाशक है ॥१७०॥