सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ अ० ३६ ]
को, प्यास तथा दाह से पीड़ित को दूध पिलाये, इससे उसे सुख ( आरोग्य ) होता है । ( थोड़ा थोड़ा मल आने में, या अतिसार में दोनों अवस्थाओं में दूध पथ्य है । जीर्णज्वर की अवस्था में दूध विषेय है ॥१४३,१४४॥
तदेव तरुणे पीतं विषवद्भन्ति मानवम् ।
सर्वज्वरेषु सुलघु मात्रावद्भोजनं हितम् ॥१४५॥
वेगापायेन्मथा तद्धि ज्वरवेगाभिर्वर्धनम् ।
यही दूध तरुणज्वर में पीने से विष की भाँति रोगी को मार देता है ।
सब प्रकार के ज्वरों में अतिशय लघु भोजन मात्रा में ज्वरबेग के शान्त होनेपर देवे । अन्यथा रूप में देने से यह भोजन ज्वरबेग को ही बढ़ाता है ॥१४५॥
ज्वरितो हितमरनीयाद्यप्यस्यास्चिर्भवेत् ॥१४६॥
अन्नकाले ह्यसुज्जनः क्षीयते श्रियतेऽथवा ।
स क्षीणः कृच्छ्रतां याति यात्यसाध्यत्वमेव च ॥१४७॥
तस्माद्भेदद्वलं पुंसां बले सति हि जीवितम् ।
गुर्वभिष्यन्धकाले च ज्वरी नाद्यात् कथञ्चन ॥१४८॥
न तु तस्याहितं मुक्तमायुषे वा सुखाय वा ।
जीर्णज्वर रोगी को यदि किसी कारण से हित भोजन में अरुचि हो जाये, तो अनेक प्रकार की कल्पनाओं से इसे हितकारी भोजन ही देवे । क्योंकि मूल लगनेपर न खाने से रोगी क्षीण हो जाता है या मर जाता है । क्षीण होनेपर ज्वर कष्टसाध्य हो जाता है, या असामर्थ्य हो जाता है । इसलिये मनुष्य के बल की रक्षा करे, बल होनेपर ही जीवन है । ज्वर रोगी गुरु, अभिष्यन्दि भोजन एवं अकाल में भोजन कभी न करे, क्योंकि खाया हुआ अहित भोजन उसको न तो आरोग्य देता है, और न आयु देता है ।
वक्तव्य—“शातत्याद् स्वाद्वभावाच्च पथ्यं द्वेषत्वमागतम् । कल्पनाविधिभित्तैस्तैः प्रियत्वं गमयेत् पुनः ॥ प्राणाविरोधिना चैन लंघनेनोपादयेत् । बलाभिधानमारोग्यं यदर्थोऽयं क्रियाक्रमः ॥ मनसोऽथानुकूल्यादि, दृष्टिरुर्णरुचिर्बलम् । सुखोपभोगता च स्याद् व्यावेश्चता वो बलक्षयः ॥ लौल्याद् दोषक्षयाद् व्याधेः वैधर्म्याच्चापि या रुचिः । तासु पथ्यापचारः स्याद् योगेनाद्यं विकल्पयेत् ॥” चरक ॥१४६-१४८॥
संततं विषमं वाऽपि क्षीणत्व्य मुचिराश्रितम् ॥१४९॥
ज्वरं समाजनेः पथ्यैर्लघुभिः समुपाचरेत् ।
क्षीण व्यक्तित के संतत ज्वर की विषम ज्वर की या अतिपुरातन ज्वर की चिकित्सा पथ्य, लघु इच्छित भोजनों से करे ॥
सुदृगान्मसूरार्क्षणकान् कुलथान् समकुष्ठकान् ॥१५०॥
आहारकाले धार्थं ज्वरिताय प्रदापयेत् ।
रोगियों को यूप की चाह हो, उनको मूल लगनेपर मूंग, मसूर, चने, कुलथी, मोथ इनका यूप ज्वर रोगियों को देवे ॥ पटोलग्रन्त्र वार्ताकं कठिलं पापचेल्किम् ॥१५१॥
कंकटिकं पर्पटकं गोजिह्वां बालमूलकम् ।
पत्रं गुड्छयाः शाकाश्च ज्वरितानां प्रदापयेत् ॥१५२॥
परवल के पत्ते, बैंगन, पुनर्नवा शाक, पाठा शाक, ककोड़ा, श हतरा, गॉजवा, पतली नरम मूली, गिलोय के पत्ते, इनका शाक, ज्वर रोगी को (शाक की चाह में) देवे ॥१५१,१५२॥
लावान् कपिझलानेणान् पुष्यताच्छरभाञ्चज्जान ।
कालपुच्छान् कुरङ्गश्चि तथैव मृगमातृकान् ॥१५३॥
मांसाथं मांससात्क्यानां ज्वरितानां प्रदापयेत् ।
बटेर, कपिजल ( घर की चिड़िया ), हरिण पुषत, शरम, खरगोश, कालपुच्छ, कुरंग, मृगमातृका, इनका मांस, सात्क्य ज्वर रोगियों को मांस की चाह होनेपर देवे ॥१५३॥
सारसकोञ्चशिक्षिनः कुक्कुटांस्तितिरा (री) स्तथा ॥
गुरुष्णत्वात् शंसन्ति ज्वरे केचिच्छिकित्साकाः ॥
सारस, कौंच, मोर, कुक्कुट, तीतर, इनको गुरु एवं उष्ण होने के कारण कई चिकित्सक ज्वर में उत्तम नहीं मानते ॥
ज्वरितानां प्रकोपं तु यदा याति समीरणः ॥१५४॥
तदैतेऽपि हि गस्यन्ते मात्राकालोपपादिताः ।
ज्वर रोगियों में जब वायु का प्रकोप हो जाये, तब इन सारस, मुर्गे आदि को भी—मात्रा एवं काल के अनुसार देना चाहिये ।
“लंघनेनानिलवृलं ज्वरे यद्यधिकं भवेत् ।
भिषङ्ग् मात्राविकल्पज्ञो दद्यात्तानपि कालवित् ॥”
वक्तव्य—चरक में दातुन के लिये विशेष विधान किया है, यथा—“अन्नकालेषु चाप्यस्मै विषेयं दन्तधावनम् । योऽस्य वक्त्ररसस्तस्माद् विपरीतं प्रियं च तत् ॥ तदस्य मुखवैशदं प्रकाङ्क्षां चान्नपानयोः । ध्वरो रसविशेषाणामभिज्ञत्वं करोति यत् ॥ विशोधयद्भुम्याखाद्यैरास्यं प्रक्षाल्य चासक्तु । मस्तिखु रसमधायैर्यथाहारमवाप्नुयात् ॥, चरक ॥१५५॥
परिषेकान् प्रदेहांश्च स्नेहान् संशोधनानि च ॥१५६॥
( स्नानाभ्यङ्गदिवारवन्तश्चोतव्यायामयोषितः । )
कषायगुरुष्णानि क्रोधादीनि तथैव च ॥१५७॥
सारवन्ति च भोज्यानि वज्रयेत्तुरुणज्वरी ।
तथैव नवधान्यादि वज्रयेच्च समासतः ॥१५८॥
तरुणज्वर रोगी—परिषेक (स्नान), प्रदेह, स्नेहन, संशोधन ( बमन विरेचन ), ( स्नान, अश्वगं दिन में सोना, शीत व्यायाम, स्त्री सेवन ) कषाय, गुरु, रूक्ष भोजन, क्रोध आदि, स्निग्ध एवं अभिष्यन्दि ( दही आदि ) भोजन,