सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 741, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३६]
उत्तरतन्त्रम्
६८५
दुर्बलस्य समाध्मातमुदरं सरुजं दिहेत् । दाहहैमवतीकुष्ठशताह्नादिकुसेन्यवैः ॥१३०॥ दुर्बल रोगी को आध्मान एवं उदर में शूल होने पर— देवदारु, वच, कूठ, सौफ, हींग, सेन्यव, इनको कांजी में पीसकर सुहाता गरम लेप उदर पर करे ॥१३०॥
अस्लपिष्टैः सुखोष्णैश्च पवने तूर्ध्वमागते । रुद्धमूत्रपूरोषाय गुदे वर्ति निधापयेत् ॥१३१॥ वायु के ऊर्ध्वगामि होने पर, मल मूत्र रुके हुए रोगी की गुदा में वर्ति रक्खे । वर्त्ति-मैनफल, सैन्धव, पिप्पली आदि की बनाई या उपयुक्त देवदारु आदि से बनाई रक्खे ॥१३१॥ पिप्पलीपिप्पलीमूलयवानौचन्यसाधिताम् । पाययेत् यवागुं वा मारुताद्यनुलोमिनीम् ॥१३२॥ पवन के ऊर्ध्वगामि होने पर पिप्पली, पिप्पलीमूल, अज- वायन, चन्य से सिद्ध की यवागु को पिलाये, यह वायु आदि का अनुलोमन करती है ॥१३२॥
शुद्धस्योभयतो यस्य ज्वरः शान्तिं न गच्छति । सशेषदोषरूक्षस्य तस्य तं सर्पिषा जयेत् ॥१३३॥ वमन विरेचन से शुद्ध होने पर भी जिस रोगी का ज्वर दोष बचे होने से शान्त नहीं होता, घी से उसका ज्वर शान्त करे । चरक में—
ज्वराः कषायेः वमनैः लंघनैर्लघुभोजनैः । रूक्षस्य ये न शाम्यन्ति सर्पिस्तेषां भिषगजितम् ॥ रूक्षं तेजो ज्वरकरं तेजसा रूक्षितस्य च । यः स्यादनुबलो धातुः स्नेहवध्यः स चानिलः ॥१३३॥ कृशं चैवाल्पदोषं च शामनीयरूपाचरेत् । उपवासैर्बलस्थं तु ज्वरे सन्तर्पणोस्थिते ॥१३४॥
कृश एवं अल्पदोषवाले रोगी की चिकित्सा शामनीय औषधियों से करे । सन्तर्पणजन्य ज्वर में बलवान् रोगी को उपवास से चिकित्सा करे ।
वक्तव्य—यहाँ पर "चतुष्पकारा संशुद्धिः पिपासामारुता- त्पौ । पाचनान्युपवासश्च व्यायामश्चेति लंघनम् ॥" इनका भी समावेश करना चाहिये ॥१३४॥
किञ्चां यवागुं मन्दगतिं तृषार्तं पाययेन्नरम् । टुट्छिदिंदाहचर्मात् मद्यपं लाजतर्पणम् ॥१३५॥ सखौद्रमस्मसां पश्चाञ्जीणं यूषरसौदनम् । उपवासश्रमकृते क्षीणं (गे) वाताधिके ज्वरे ॥१३६॥ दीर्माग्नित् योग्येत् प्राज्ञो नरं मांसरसौदनम् । मुदगयूषौदनश्चापि हितः कफसमुत्थिते ॥१३७॥ स एव सितथा युक्तः शीतः पित्तज्वरे हितः । मन्दगतिं एवं प्यास से पीड़ित मनुष्य को खूब गली यवागु पिलाये ।
प्यास, वमन, दाह, गरमी से पीड़ित मनुष्य को या मद्यपी को लाज से बना तर्पण (लाजा-सत्त्व को पानी में घोलकर) मधु
के साथ मिलाकर देवे । इसके जीर्ण होने पर पीछे से मूँग आदि के यूष से या मांस रस से भात देवे । उपवास या श्रम के कारण क्षीण हुए, वात की अधिकतावाले ज्वर में, प्रदी- प्ताग्नि पुरुष को वैद्य मांस रस के साथ भात देवे । कफजन्य- ज्वर में मूँग के यूष के साथ भात देवे । पित्त ज्वर में इसी यूष को ठण्डा करके शर्करा के साथ देवे ॥१३५-१३७॥
दाडिमासलमुदगात्तां यूषशान्तिलपेत्तिके ॥१३८॥ हृस्वामलकयूषस्तु वातश्लेष्माधिके हितः । पटोलनिम्बयूषस्तु पथ्यः पित्तकफात्मके ॥१३९॥ दाहच्छिद्विद्युत्तं क्षामं निरन्तं तृष्णयाऽर्दितम् । सिताश्वौद्रयुत्तं लाजतर्पणं पाययेत् च ॥१४०॥
वातपित्तज्वर में अनारदाना, आंबला और मूँग का यूष देवे । वातकफज्वर में छोटी मूली का यूष देवे । पित्त कफ ज्वर में परबल और नीम का यूष पथ्य है । दाह, वमन से युक्त, कृश, भोजन न करनेवाले, तथा प्यास से पीड़ित मनुष्य को लाजाओं के सत्त्व को पानी में घोलकर शर्करा और मधु मिला- कर पीने को देवे ॥१३८-१४०॥
कफपित्तपरीतस्य श्रोत्रमेऽस्तु कपित्तनस्तथा । मद्यनित्यस्य न हितं यवागुस्तमुपाचरेत् ॥१४१॥ यूषैरस्लैरनस्लैर्वा जाङ्गलैश्च रसैर्हितैः ।
कफ पित्त की शिकायतवाले नित्य मद्य पीनेवाले के लिये यवागु उत्तम नहीं । उसकी चिकित्सा खट्टे या खड़ाश रहित यूषों से या जांगलमांस रसों से करनी चाहिये । चरक में— ऊर्ध्वग रक्तपित्त में यवागु का निषेध किया है, यथा—ऊर्ध्वगे रक्तपित्तो च यवागुर्न हितं ज्वरे ॥
वक्तव्य—रक्तपित्त में यवागु उत्तम कही है, परन्तु ज्वर होने से यह अपथ्य है । वह भी कफ पित्त दोनों दोषों का संयोग होने पर अहित है ॥१४१॥
मद्यं पुराणं मन्दगन्धेयं वात्रोपहितं हितम् ॥१४२॥ मन्दगतिं पुरुष को पुरातन मद्य जो के भोजन के साथ देवे (मद्य-दीपक एवं कफनाशक है) ॥१४२॥
सन्योगं वितरेत्तकं कफारोचकपीडिते । कफजन्य अरोचक में त्रिकुट (सौठ, मरिच, पिप्पली) के साथ तक पीये ।
कृशोऽल्पदोषो दीनश्च नरो जीर्णज्वरार्दितः ॥१४३॥ विविद्धः सूक्ष्मदोषश्च रूक्षः पित्तानिलज्वरो । पिपासातः सदाहो वा पयसा स सुखो भवेत् ॥१४४॥ कृश, अल्पदोषवाला, दीन, जीर्णज्वर से पीड़ित, अप्रबुद्ध- दोष में, प्रन्युत दोषों में, रूक्ष या पित्तावातज्वर रोगी मनुष्य
१ आहारभावात् प्राणाय सरत्वालाघवाय च ॥ ज्वरध्नो ज्वरसात्प्यत्वाद् तस्मात् पेयाभिरादितः ॥