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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३१ ]

सन्दर्भ का निष्कर्ष यह है कि साम दोष रोगोत्पादक होता है और निराम दोष रोगोत्पादक नहीं होता। जब दोष साम होता है तब रोगोत्पत्ति होती है, जब वह निराम हो जाता है तब रोग शान्त हो जाता है। सामदोषोत्पन्न रोग को भी 'साम' कहा जाता है और जब दोष निराम होता है अथवा कुछ २ निराम होने लगता है तब रोग को भी निराम कहा जाता है। यथा आमज्वर, आमातिसार तथा निरामज्वर तथा पक्षातिसार आदि २। दोषाऽप्रवृत्तिः—जब दोष-वातादि दोष साम रहते हैं तब उनकी उचित प्रवृत्ति-गति नहीं होती, यथा वायु का अपानवायु तथा उद्गार आदि के रूप में और शरीर के भीतरी अवयवों में उचित रूप से गति न करना, पित्त का सूत्र के साथ, पुरीष के साथ न निकलना और शरीर के भीतरी अवयवों में पाचन रञ्जन आदि क्रिया न करना और कफ का खलार एवं सिंघाणक आदि के रूप में न निकलना और शरीर के भीतरी अवयवों में रसन, अवलम्बन आदि क्रिया न करना ॥११६-११८॥

सप्तरात्रात्परं केचिन्मन्यन्ते देयमौषधम् ॥११९॥

दशरात्रात्परं केचिद्वातव्यमिति निश्चितः।

कई आचार्य कहते हैं कि सात दिन के पीछे औषध देनी चाहिये। दूसरे आचार्य दस दिन के पीछे औषध देने का विधान कहते हैं।

वक्तव्य—चरक में पच्यमान ज्वर के भी लक्षण हैं, यथा—

“ज्वरवेगोऽधिकस्तुष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः।

मलप्रवृत्तिस्तृक्षेः पच्यमानस्य लक्षणम् ॥”

चरक० चि० अ० ३।११६।११९॥

पैत्तिके वा ज्वरे देयमल्पकालसमुत्थिते ॥१२०॥

अचिरञ्जरितस्यापि देयं स्यादोषपाकतः।

पित्तजन्य या अल्पकाल से उत्पन्न पित्तज्वर में भी, शीघ्र उत्पन्न हुए ज्वर में भी दोषों का पाक हो जाने पर सात दिन से पूर्व भी औषध दे देनी चाहिये ॥१२०॥

भेषजं ह्यामदोषस्य भूयो ज्वलयति ज्वरम् ॥१२१॥

शोधनं, शमनीयं तु करोति विषमज्वरम्।

आमदोषवाले पुरुष में दी गई शोधन औषध ज्वर को और भी अधिक बढ़ा देती है। शमनीय औषध ज्वर को विषम ज्वर में बदल देती है, शोधनीय औषध ज्वर को बढ़ाती है ॥

ज्यवमानं ज्वरोक्तिलघुमुपेक्षेत मलं सदा ॥१२२॥

अतिप्रवर्तमानं च साधयेदतिसारवत्।

ज्वर के आक्रान्त रोगी के प्रवृत्त हुए पुरीषादि मलों की सदा उपेक्षा करे। यदि ये अतिमात्रा में प्रवृत्त हो रहे हों तो अतिसार की भाँति चिकित्सा करे। चरक में—

“पित्तं वा कफपित्तं वा पित्ताशयगतं हरेत्। लंसनं, त्रीनम्लान् बस्तिहरेत् पक्षाशयस्थितान्” ॥

यद्वा कोष्ठातुंगाः पक्त्वा विबद्धाः स्रोतसां मलाः ॥१२३॥ अचिरञ्जरितस्यापि तदा दद्याद्विरेचनम्।

जब मल कोष्ठ में पहुँचे हुए हों, पक गये हों स्रोतों में रुके हों, तो यदि ज्वर पुराना न भी हुआ हो तो भी इस रोगी को विरेचन देवे। (मल शब्द पुरीष के लिए है)। चरक— दाहतृष्णापरीतस्य वातपित्तोत्तरं ज्वरम्।

बद्धप्रत्युतदोषं वा निरामे पयसा जयेत् ॥

क्रियाभिरामिः प्रशमं न प्रयाति यदा ज्वरः।

अक्षीणवलमांशान्नेः शमयेत् विरेचनैः ॥

ज्वरक्षीणस्य न हितं वमनं न विरेचनम्।

कामं तु पयसा तस्य निरुहैर्वा हरेन्मलान् ॥१२३॥

पक्वो ह्यनिर्हतो दोषो देहे तिष्ठन् महात्ययम् ॥१२४॥

विषमं वा ज्वरं कुर्याद्वलव्यापदमेव च।

तस्माच्चिह्नैर्णं कार्यं दोषाणां वमनादिभिः ॥१२५॥

क्योंकि पका हुआ दोष यदि बाहर न निकाला जाय, शरीर में रह जाये तो गम्भीर रोग को, विषमज्वर को, और बल हानि को करता है, इसलिये वमन आदि से दोषों को निकालना चाहिये ॥१२४, १२५॥

प्राक्कर्म वमनं चास्य कार्यमास्थापनं तथा।

विरेचनं तथा कुर्याच्छिरसश्च विरेचनम् ॥१२६॥

अवस्थानुसारं प्रथमं रोगी को वमन देवे, फिर आस्थापन, फिर विरेचन, इसके पीछे शिरोंविरेचन देवे, क्रम से चिकित्सा करे।

गौरवे शिरसः शूलं विबद्धैर्विन्दिश्येधु च।

जीर्णज्वरे रुचिकरं कुर्यान्मूर्धविरेचनम् ॥१२७॥

क्रमशो बलिनो देयं वमनं श्लेष्मिके ज्वरे।

पित्तभाये विरेकस्तु कार्यः प्रशयिच्छाशये ॥१२७॥

सरुजेऽनिलजे कार्यं सोदावर्त्तं निरुहणम्।

कटीपुष्पग्रहातस्य दीप्तानेनरनुवासनम् ॥१२८॥

शिरोगौरवशूलघ्नमिन्द्रियप्रतिबोधनम्।

कफामिपन्ने शिरसि कार्यं मूर्धविरेचनम् ॥१२९॥

कफज्वर में बलवान् रोगी को वमन देवे। पक्वाशय के शिथिल (अस्तब्ध) होने पर पित्त प्रधान ज्वर में विरेचन देवे। वातजन्य एवं उदावर्त्तयुक्त ज्वर में गेदना होने पर निरुहण देवे। कटिग्रह से पीड़ित दीप्तार्ग्न पुरुष को अनुवासन देवे। कफ से भरे हुए शिर में शिर का भारीपन नाशक, शूल नाशक, इन्द्रियों को जाग्रत करनेवाला शिरोंविरेचन देवे।

ज्वरे पुराणे संक्षीणे कफपित्ते दृढागने।

रुक्षबद्धपुरीषायप्रदयादनुवासनम् ॥”चरक ॥१२७-१२९॥