सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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“व्वरितस्य कायसमुत्थानदेशकालानभिसमीक्ष्य पाचनार्थं पानीयमुष्णं प्रयच्छन्ति भिषजः । ज्वरो ह्यामाशयसमुत्थः, प्रायो भेषजानि चामाशयसमुत्थानां विकाराणां पाचनवमनापतर्पणसमर्थानि भवन्ति, पाचनार्थं च पानीयमुष्णं तस्मादेतज्वरितेभ्यः प्रयच्छन्ति भिषजो भूषिष्ठम् । तद्धि तेषां पीतं वातमनुलोमयति, अग्निं चोदयसुदीरयति, क्षिप्रं जरो गच्छति श्लेष्माणं, परिशोषयति, स्वल्पमपि च पीतं तृष्णाप्रशमनायोककल्पते” ॥ चरकः वि० अ० ३।४६।१०६॥
शीतमन्यथा ॥१०७॥
सेव्यमानेन तोयेन ज्वरः शीतेन वर्धते ।
शीतल जल इससे विपरीत गुणवाला होता है, शीतल जल सेवन करने से ज्वर बढ़ता है ॥१०७॥
पित्तमद्यविशेषेण शीतलं तित्तकैः श्रुतम् ॥१०८॥
गाङ्ग्रेयनागरोशीरपर्टोदीचीयचन्दनैः ।
पित्तजन्य मद्यजन्य विषजन्य ज्वरों में—शीतल या तित्तक द्रव्यों से शोषित शीतल जल देना चाहिये । ये द्रव्य-भद्रमोथा, सोंठ, खस, पित्तापङ्का, खस और लालचन्दन हैं ।
वक्तव्य—इन द्रव्यों का क्वाथ षडंग परिभाषा से बनाना चाहिये, यथा—“कर्षमानं ततो द्रव्यं साधयेत् प्रास्थिकेऽभक्षि । अर्धश्रुतं प्रयोक्तव्यं पाने पेयादि संविधौ ॥” चरक में—तथा-युक्तमपि चैतन्नात्यर्थोत्सन्नपित्ते ज्वरे सदाह्रभ्रमप्रलापतिसारो वा प्रदेयम् । उष्णेन हि दाहभ्रमप्रलापतिसारो भूयोऽभिर्वर्धन्ते, शीतेन चोपशाम्यन्ति ॥ चरक वि० अ० ३।४०।१०८॥
दीपनी पाचनी लब्धी ज्वरातीर्णा ज्वरापहा ॥१०९॥
अन्नकाले हिता पेया श्यास्त्रं पाचनैः कृता ।
दोषों के उनके अपने अनुसार पाचन द्रव्यों के संयोग से दीपनी (अग्नि दीपक), दोषों को पचानेवाली, लघु, ज्वरनाशक, ज्वररोगियों के लिये अन्नकाल में हितकारी है ॥१०९॥
वहूदोषस्य मन्दाग्नैः समरात्रात् परं ज्वरे ॥११०॥
लङ्घनाम्वुयवागूभिर्यदा दोषो न पच्यते तदा तं मुखवैरस्यतृष्णारोचकनाशनैः ॥१११॥
कषायैः पाचनैर्हृद्यैर्ज्वरैरुत्तमैः समुपाचरेत् ।
बहुत दोषवाले, मन्दाग्निवाले पुरुष में लंघन, षडंग-पानीय, यवागू देने पर भी यदि सात दिन में ज्वर के अन्दर दोषों का पाचन न हो, तब रोगी को मुख की विरसता, प्यास, अरोचक नाशक, हृदय के लिये प्रिय, ज्वरघ्न एवं पाचन कषायों से चिकित्सा करे ॥११०,१११॥
१ तृप्प्यते सलिलं चोष्णं दद्यात् वातकफज्वरे । मद्योत्थे पित्तके चाय शीतलं तित्तकैः श्रुतम् ॥ चरक ।
पञ्चमूलीकषायं तु पाचनं पवनज्वरे ॥११२॥ सक्षौद्रं पैत्तिके मुस्तकुटुकेन्द्रयवैः वृत्तम् । पिप्पल्यादिकषायं तु कफजे परिपाचनम् ॥११३॥ द्रन्द्वजेषु तु संसृष्टं दद्यान्
यथा—वातज्वर में वृहस्पत्चमूल का कषाय पाचक है । पित्तज्वर में मुस्ता, कुटकी, इन्द्रजो के क्वाथ में मधु मिलाकर देवे । कफज्वर में पिप्पल्यादिगण का क्वाथ देवे । द्रन्द्वज ज्वरों में इनको मिलाकर देवे ॥११२,११३॥
द्वय विवर्जयेत् ।
पीताम्बुर्वल्लिप्तो मुक्तोऽजीर्णां क्षीणः पिपासितः ॥११४॥ तुरन्त पानी पीने पर, उपवास किया होने पर, तुरन्त भोजन किया होने से, अजीर्णवाले तीक्ष्ण एवं प्यास लगे व्यक्ति को पाचन कषाय मत देवे ॥११४॥
(तीक्ष्ण ज्वरे गुरुरो देहे विबद्धेषु मलेषु च । सामदोषं विजानीयाज्ज्वरं पक्वमसतोऽन्यथा ॥) मृदौ ज्वरे लघो देहे प्रचलेषु मलेषु च । पक्वं दोषं विजानीयाज्ज्वरे देयं तदीषधम् ॥११५॥ (ज्वर के तीक्ष्ण होने पर, शरीर में भारीपन, मलों के रुका होने पर, ज्वर को आमदोषयुक्त जाने, इससे विपरीत अवस्था में निराम या पका जाने) ज्वर के मृदु हो जाने पर, शरीर में हल्कापन, मलों के चलायमान होने पर, दोष को पका हुआ जाने, तब ज्वर में ज्वरनाशक औषध देना ॥११५॥
दोषप्रकृतिवैकृत्यादेकैषां पक्वलक्षणम् । हृदयोद्देष्टनं तन्ना लालास्यु तिररोचकः ॥११६॥ दोषप्रवृत्तिरालस्यं विबन्धो बहुमूत्रता । गुरुदरत्वमस्वेदो न पक्किः शकृतोऽरतिः ॥११७॥ स्वापः स्तम्भो गुरुत्वं च गात्राणां बहिर्मादवम् । मुखस्यागुद्विरग्लानिः प्रसङ्गो बलवाज्ज्वरः ॥११८॥ लिक्नैरेभिर्विजानीयाज्ज्वरसामं विचक्षणः । कोई आचार्य दोष की प्रकृति की प्रकृति होने से पक्क लक्षण मानते हैं ।
आम ज्वर के लक्षण—हृदय में ऐंठन, तन्ना, लालास्य, अरोचक, दोषों की अशुद्धि, आलस्य, मलादि का अवरोध, मूत्र की अधिकता, उदर में भारीपन, पसीना न आना, मल का पाचन न होना, बेचैनी, स्वाप (नींद), जड़ता, अंगों में भारीपन, अग्नि की मुद्धता, मुख की अशुद्धि, मुख में ग्लानि न होना (कुशता-चेहरे पर न आना), ज्वर का निरन्तर बलवान् रहना, इन लक्षणों से बुद्धिमान् आमज्वर को जाने ।
वि० मन्तव्य—दोष—पक्कलक्षणम् का ताल्यर्थ है—दोष अर्थात् वातादि दुष्ट दोष—को प्रकृति अर्थात् स्वभाव है रोग को उत्पन्न करना, इस प्रकृति की जो विकृति अर्थात् विपरीतता दोष के पक्क हो जाने का लक्षण है । इस