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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३१ ]

हृतप्रभेन्द्रियं क्षीणमरोचकनिपीडितम् ॥१३॥ गम्भीरतीक्ष्णवेगात् ज्वरितं परिवर्जयेत् ।

शरीर की दीप्ति नष्ट हो जाने पर, श्रोत्र-चक्षु आदि शक्ति के नष्ट हो जाने पर, क्षीण, अरोचक से पीड़ित, गम्भीर वेग-वाले, तीक्ष्ण वेग से पीड़ित ज्वररोगी की चिकित्सा न करे ॥

हीनमध्याधिकैर्दोषैस्सिन्धमद्रादशाह्निकः ॥१४॥

ज्वरवेगो भवेत्तीब्रो यथापूर्वं सुखक्रियः ।

हीनवेगज्वर तीन दिन में, मध्यवेगज्वर सात दिन में, अधिकदोषज्वर बारह दिन में अधिक तीव्र होता है। इनमें पूर्व के क्रम से ज्वर सुखसाध्य है, अर्थात् तीन दिन का हीन वेग ज्वर सबसे अधिक सुखसाध्य है, मध्यवेगज्वर उससे कम और अधिक ज्वर सबसे अधिक कष्ट साध्य है ॥१४॥

कालो क्षोष यमरुचैव नियतिर्भृत्युरेव च ॥१५॥

तस्मिन् व्यपगते देहाज्जनमेह पुनरुच्यते ।

इति ज्वराः समाख्याता, कर्मदानी प्रवक्ष्यते ॥१६॥

यह ज्वर कालरूप है, यम है, नियति है, भृत्य है, शरीर से ज्वर निकल जाने पर दुबारा जन्म हुआ कहा जाता है। इस प्रकार से ज्वर कह दिया, अब चिकित्सा को कहेंगे ॥१५, १६॥

ज्वरस्य पूर्वरूपेषु वर्तमानेषु बुद्धिमान् ।

पाययेत् घृतं स्वच्छं ततः स लभते सुखम् ॥१७॥

विधिर्मारुतजेध्वेष, पैत्तिकेषु विधीयते ।

भृदु, प्रच्छदं तद्वत्कफजेधु विधीयते ॥१८॥

ज्वर के पूर्वरूपों में बुद्धिमान् वैद्य शुद्ध निर्मल घृत ही पिलाये, इससे रोगी को सुख मिलता है। यह घृतपान विधि वातजन्य ( अर्थात् श्रम-क्षय आदि से कुपित वातज्वर ) ज्वरों के पूर्वरूपों में है, ( न कि आमाशय से उत्पन्न ज्वरों में )। पित्तजन्य ज्वरों में विरेचन भृदु देवें। कफजन्य ज्वरों में वमन कराये।

वक्तव्य—“ज्वरे लंघनमेवादावुपदिष्टमुते ज्वरात् । क्षया- निलभयक्रोधकामशोकश्रमोद्भवात् ॥” चरक ॥१७, १८॥

सर्वद्विदोषजेषूक्तं यथादोषं विकल्पयेत् ।

अस्तेहनीयोऽशोष्यश्च संयोज्यो लब्धनादिना ॥१९॥

सन्निपातज्वर के तथा द्विदोषज्वर के पूर्वरूपों में दोष-नुसार घृतपान आदि का निश्चय करना चाहिये।

तक्षण ज्वरादि जो स्नेह के अयोग्य हैं, वमन विरेचन के जो अयोग्य हैं, उनको लंघन ( पंडगगानीय आदि ) आदि करे ॥१९॥

रूपभ्राम्यप्योर्विद्याज्ञानात्वं वह्निधूमवत् ।

प्रत्यक्कुरुपेषु हितमेकान्तेनापतर्पणम् ॥१००॥

अग्नि और भूम की भाँति रूप और पूर्वरूपों में पृथक्त्व

समझना चाहिये।

रूपों के स्पष्ट हो जाने पर बिना अपवाद के उपवास ( आमाशयजन्य ज्वरों में ) हितकारी है ॥१००॥

आमाशयस्थे दोषे तु सोत्कृच्छ्रे वमनं परम् ।

आनन्दः स्तिमितैर्दोषैर्विद्यन्तं कालमातुरः ॥१०१॥

कुर्वादनशनं तावन्ततः संसर्गमाचरेत् ।

दोष के आमाशय उत्कृच्छ्रे ( बाहर निकलने के लिये ) होने पर वमन देना श्रेष्ठ है।

जितने समय तक स्तिमित ( जकड़े हुए ) दोषों से रक्षा हुआ रहे, उतने समय तक रोगी उपवास करे। इसके पीछे पेयादि क्रम विधि पालन करे ॥१०१॥

न लब्धयेन्मासुतजे क्षयजे मानसे तथा ॥१०२॥

अलब्ध्याश्चापि ये पूर्वं द्विषणीये प्रकीर्तिताः ।

वातजन्य, क्षयजन्य ( घातुक्षयजन्य ) और मानस ज्वर में लंघन नहीं करना चाहिये। तथा द्विषणीय अध्याय में कहे हुए गर्भिणी बाल वृद्ध दुर्बल आदि जो लंघन के अयोग्य कहे हैं, उनको भी लंघन न कराये ॥१०२॥

अतवस्थितदोषाग्नेलब्धनं दोषपाचनम् ॥१०३॥

ज्वरघ्नं दीपनं काङ्क्षारुचिलाघवकारकम् ।

अस्थिर दोषाग्निवाले पुरुष के लिये लंघन दोषों का पाचन करनेवाला है, लंघन ज्वरनाशक, अग्निदीपक, भोजन में चाह, रुचि तथा शरीर में लघुता उत्पन्न करता है ॥१०३॥

सृष्टमारुतविण्मूत्रं लुपिपासासहं लघुम् ॥१०४॥

प्रसन्नास्मैन्द्रियक्षामं नरं विद्यात् सुलब्धिघतम् ।

भली प्रकार लंघन होने से मल-वायु मूत्र की प्रवृत्ति मूल और प्यास का सहन न होना, शरीर में हल्कापन, आत्मा और इन्द्रिय में प्रसन्नता तथा शरीर में कृशता आ जाती है। कहा भी है—

“वातमूत्रपुरीषाणां विसर्गं गात्रलाघवे। हृदयोदरकण्ठास्य- शुद्धौ तन्द्राकलमे गते ॥ स्वेदे जाते रुचौ चापि लुपिपासा सहोदये। कृतं लंघनमादेश्यं नियर्थे चान्तरात्मनि” ॥१०४॥

बलक्षयस्तृष्ण शोषस्तन्द्रानिद्राश्रमकलमाः ॥१०५॥

उपद्रवाश्च श्वासाद्याः संभवन्त्यतिलब्ध्यनात् ।

अतिशय लंघन से-बल का ह्रास, प्यास, शोष, तन्द्रा-निद्रा-श्रम-थकान, श्वास आदि उपद्रव होते हैं ॥१०५॥

दीपनं कफविच्छेदि पित्तवातानुलोमनम् ॥१०६॥

कफवातज्वरात्तैभ्यो हितमुष्णान्मु तृष्टिदम् ।

तद्वि मार्दवक्रुदोषघातसां

ज्वर में गरम पानी अग्नि दीपक, कफ को तोड़नेवाला, पित्त और वायु का अनुलोमक, कफ-वात ज्वर से पीड़ित रोगियों में हितकारी तथा तृष्णा नाशक है। क्योंकि यह दोष एवं क्षोतों को कोमल करता है।