सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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यथावास्यता विपकृते दाहातीसारहृदयहृत् ॥७६॥ अभक्तकृत् पिपासा च तोदो मूर्च्छा बलक्षयः । ओषधीगन्धजे मूर्च्छा शिरोरुक् वमशः क्षयः ॥७७॥ कामजे चित्तविभ्रंशस्तन्नाऽऽलस्यमरोचकः । हृदये वेदना चास्य गात्रं च परिशुष्यति ॥७८॥ भयात् प्रलापः शोकाच्च भवेत् कोपाच्च वेपथुः । अभिचाराभिशापाभ्यां मोहस्तृष्णा च जायते ॥७९॥ भूताभिषक्तादुद्रेगाहास्यकम्पनरोदनम् ।
यथा-विषमजन्मज्वर में मुख का काला होना, दाह, अति-सार, हृदय का जकड़ जाना, आलस्य, आरोचक, प्यास, तोद, मूर्च्छा, बलक्षय, होता है। औषधि गन्धजन्म ज्वर में-मूर्च्छा, शिर में दर्द, वमन, छींक आना होता है। कामजन्मज्वर में चित्तविभ्रंश, तन्ना, आलस्य, अरोचक हृदय में वेदना होती है और शरीर सूख जाता है। भय से प्रलाप, शोक और कोप से कम्पन, अभिचार-अभिशाप से-मूर्च्छा और तृष्णा होती है। भूताभिषंग जन्म ज्वर में-उद्रेग, हास्य, कम्पन और रोना होता है।
वक्तव्य—“स्थाननिःश्वासबहुलं लिंगं कामज्वरे स्मृतम् । शोकजे वाष्पबहुलं त्रासप्रायं भयज्वरे ॥ क्रोधजे बहुसरंभं भूतावेशे त्वमानुषम् । मूर्च्छामोहमदग्लानिभूयिधं विषसंभवे ॥ केषाञ्चिदेषां लिंगानां संतापो जायते पुरः । पश्चात्तुल्यं तु केषाञ्चिद्वेषं कामज्वरादिषु ॥ मनस्यभिहते पूर्वं कामाद्यैर्न तथा-बलम् । ज्वरः प्राप्नोति वाताद्यैः देहो यावन्न दुष्यति ॥ देहे चाभिद्वृते पूर्वं वाताद्यैर्न तथा बलम् । ज्वरः प्राप्नोति कामाद्यैः मनो यावन्न दुष्यति” ॥ चरक ॥ ७६-७९ ॥
श्रमक्षयाभिघातेभ्यो देहिनां कुपितोऽनिलः ॥८०॥ पूरयित्वाऽखिलं देहं ज्वरमापादयेद् भुशम् । श्रम, क्षय और चोट से कुपित वायु मनुष्यों के सम्पूर्ण शरीर में फैलकर अतिशय ज्वर को करता है ॥८०॥
रोगाणां तु समुत्थानाद्विदाहागन्तुस्तत्तथा ॥८१॥ ज्वरोऽपरः संभवति तैस्तैरन्यैश्च हेतुभिः । दोषाणां स तु लिङ्गानि कदाचिन्नातिवर्तते ॥८२॥ विद्वधि आदि दूसरे रोगों के कारणों से विवाह से, आगन्तुज कारणों से-तथा अन्य दूसरे कारणों से दूसरे प्रकार का ज्वर होता है। इस प्रकार ज्वर कभी भी वातादि दोषों के लक्षणों का अतिक्रमण नहीं करता। अर्थात् आगन्तुज या अन्य ज्वर भी वातादि दोषों के लक्षणोंवाला ही होता है ॥८१, ८२॥
गुरुता हृदयोक्तलेशः सदनं छर्चरोचको । रसरथे तु ज्वरे लिङ्गं दैन्यं चास्योपजायते ॥८३॥ रक्तनिष्ठोवनं दाहः स्वेदश्छर्द्वेनविभ्रभी । प्रलापः पिटिका तृष्णा रक्तप्राप्तं ज्वरे नृणाम् ॥८४॥ पिण्डिकोद्वेष्टनं तृष्णा सूक्ष्मवृत्रपुरीषता । ऊष्माऽन्तर्दाहविच्योप ग्लानिः स्थानमांसरो ज्वरे ॥८५॥
भुवं स्वेदस्तृष्णा मूर्च्छा प्रलापश्छर्दिरेव च । दौर्गन्ध्यारोचको ग्लानिमेदःतथे चासहिण्युता ॥८६॥ भेदोऽस्थनां कुञ्च (ज) नं रुवासो विरेकश्छर्दिरेव च । विच्येपणं च गात्राणांसेतदस्थिगते ज्वरे ॥८७॥ तमःप्रवेगनं हिक्का कासः शैत्यं वमिस्तथा । अन्तर्दाहो महाशवासो सर्मच्छेदश्च मज्जगे । मरणं प्राप्नुयात्तत्र शुक्रस्थानगते ज्वरे ॥८८॥ शेषसः स्तब्धता मोक्षः शुक्रस्थ तु विशेषतः । दग्ध्वेनधनं यथा बहिर्धातुम् हत्वा यथा विषम् ॥८९॥ कृतकृत्यो त्रजेच्छान्ति देहं हत्वा तथा ज्वरः ।
रसधातु में स्थित ज्वर से भारीपन, हृदय में वेचैनी, अंगों में शिथिलता, वमन, अर्चि, दीनता होती है। रक्त में स्थित ज्वर से लाल शूक आना, दाह, पसीना, वमन, विभ्रम, प्रलाप, पिटका, प्यास, होती है। मांसगत ज्वर में पिण्डलियों में ऐंटन प्यास, मल-मूत्र की प्रवृत्ति, उष्मा, अन्दर जलन, विच्येप और ग्लानि होती है। मेदगतज्वर में—अतिस्वेद, प्यास, मूर्च्छा, प्रलाप, वमन, दुर्गन्धता, अरोचक, ग्लानि; आवाज आदि की असहनशीलता होती है। अस्थिगतज्वर में—अस्थियों का चट-कना तथा संकोचना, श्वास, अतिसार, वमन, अंगों का फेंकना इधर-उधर चलाना, होता है। मज्जागतज्वर में—रोगी अन्ध-कार में घुसना अनुभव करता है, हिक्का, कास, शीतलता, वमन, अन्दर दाह, महाशवास (श्वास का जोर से चलना), सर्म-स्थानों में छेदनवत् पीड़ा होती है। शुक्रस्थानगतज्वर में रोगी मर जाता है, मेहन में कठोरता, तथा शुक्र का क्षरण विशेष रूप में होता है। जिस प्रकार इन्धन को जलाकर आग तथा जिस प्रकार धातुओं को नष्ट करके विष स्वयं शान्त हो जाते हैं; इसी प्रकार ज्वर देह को नष्ट करके शान्त हो जाता है, देह ठण्डा हो जाता है ॥८३-८५॥
वातपित्तकफोत्थानां ज्वराणां लक्षणं यथा ॥९०॥ तथा तेषां भिषग्नूयाद्वाऽसदिष्वपि बुद्धिमान् । समस्तैः सन्निपातेन धातुस्थमपि निर्दिशेत् ॥९१॥ द्रन्द्वजं द्रन्द्वजैरेव दोषैश्चापि वदेत् कृतम् । जिस प्रकार वात-पित्त-कफ जन्म ज्वरों के लक्षण होते हैं, उसी तरह रस आदि धातुओं में वात आदि दोषों के लक्षण बुद्धिमान् वैद्य जानें। समस्त सन्निपात से भी धातुस्थज्वर को समझे। इसी प्रकार द्रन्द्वज दोषों से भी रसादि धातुस्थ द्रन्द्वज ज्वर को भी समझे ॥९०, ९१॥
गम्भीरस्तु ज्वरो ज्ञेयो ह्यन्तर्दाहेन तृणया ॥९२॥ आनन्दत्वेन चात्यर्थ श्वासकासोद्गमेन च । अन्तर्दाह, तृष्णा, दोष-मल के रुके होने से, अतिशय श्वास, कास की उत्पत्ति से गम्भीर ज्वर को पहचाने। (प्रलाप, श्रम, सन्धि, अस्थि, शूलादि से आक्रान्त होने पर भी गम्भीर जाने)