सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३६ ]
अहित के कारण—अपथ्य सेवन से या ज्वर से मुक्त कृश व्यक्ति में अपथ्याचारण से बढ़ा हुआ थोड़ा दोष किसी एक धातु का आश्रय लेकर विषमज्वर करता है। यथा काश्यप-संहिता में—
ज्वरप्रवेगोपरमे देही मुक्त इवेक्षते। तथाऽप्यस्यामवस्थायामेभिः लिंगैः न मुच्यते ॥ मुखवैरस्यकाटुक्य माधुर्यादिभिरलृणः। नात्यन्तलिप्सारलानिभ्यां शिरसो गौरवेण च ॥ पुनः पुनर्यथा चैष जायते तच्चिदोष मे। निरुद्धमागो दोषेण विषमज्वरहेतुना ॥ वायुस्तदोषकोपान्ते लब्धमागो यथाक्रमम्। दोषशेषं तमादाय यथास्थानं प्रपद्यते ॥ सदोषशेषः स्वे स्थाने लीनः कालवलाश्रयात्। रसस्थानमुपागम्य भूयो जनयति ज्वरम् ॥ उपक्रमविशेषेण स्वबलस्य व्ययेन च। क्षयं प्राप्नोति वृद्धिं च समानगुणसंश्रयात् ॥ सोऽयं निवृत्तं संप्राप्य यथा दीपः स्वभावतः। पुनः पुनः प्रज्वलति क्षीणतैलैन्धनोऽपि सन् ॥
सततं रसरक्तस्थः सोऽन्येषुः पिशिताश्रितः। मेदोगतस्तृतीयेऽह्नि स्वस्थिमज्जगतः पुनः ॥६७॥ कुर्याच्छातुर्थकं घोरमन्तकं रोगसंकरम्।
सततज्वर रस रक्त में स्थित होकर, अन्येषु मांस में, तृतीयक ज्वर में, चतुर्थक ज्वर अस्थि और मज्जा में स्थित होकर, भयानक यमसदृश रोगसमूहवाले ज्वर को उत्पन्न करते हैं ॥६७॥
केचिद्भूताभिपक्षोऽयं श्रुतते विषमज्वरम् ॥६८॥ कई आचार्य विषमज्वर को मृत के सम्बन्ध से (आवेश में) उत्पन्न हुआ कहते हैं ॥६८॥
सम्राहं वा दशाहं वा द्वादशाहमथापि वा। सन्तत्या योऽविसर्गां स्यात्सन्ततः स निगद्यते ॥६९॥
सात दिन तक, दस दिन या बारह दिन तक निरन्तर विना किसी विच्छेद के जो ज्वर बना रहता है, उसको सन्तत कहते हैं।
वक्तव्य—सन्ततज्वर सुखसाध्य है—
“सन्ततज्वर एवान्यः स्वल्पदुर्बलकारणः।
एकदोषो द्विदोषो वा सुखसाध्यः प्रकीर्तितः ॥
परन्तु चरक में इसको कष्टसाध्य कहा है, यथा—
“छोतोभिः विस्तृता दोषा गुरवो रसवाहिभिः।
सर्वदैहानुगाः स्तम्भा ज्वरं कुर्वन्ति सन्ततम् ॥
दशाहे द्वादशाहे वा सताहे वा सुदुःसहः।
सशीघ्रं शीघ्रकारित्वात् प्रशमं याति हन्ति वा ॥
कालदूष्यप्रकृतिभिः दोषस्तुरगो हि सन्ततम्।
यथाधातूस्तथा मृत्रं पुरीषं चानिलादयः।
युगपच्चानुपद्यन्ते नियमात् सन्तते ज्वरे ॥
स शुद्धया वाऽप्यशुद्धया वा रसादीनामशेषतः।
सताहादिषु कालेषु प्रशमं याति हन्ति वा ॥
यदा तु नाति शुभ्यन्ति न वा शुभ्यन्ति सर्वशः।
द्वादशैते समुद्विधाः सन्ततस्याश्रयास्तादा ॥६९॥
अहोरात्रे सततको द्वौ कालाञ्जनुवर्त्तते।
अन्येषुऽकस्त्वहोरात्रादेककालं प्रवर्त्तते ॥७०॥
तृतीयकस्तृतीयेऽह्नि चतुर्थेहि चतुर्थकः।
सततक ज्वर दिन रात में दो समय आता है। अन्येषु-कज्वर दिन रात में एक समय आता है। तृतीयक ज्वर तीसरे दिन, चतुर्थक ज्वर चौथे दिन आता है ॥७०॥
वातेनोदीर्यमाणश्च द्वियमाणश्च सर्वतः।
एकद्विदोषा मर्त्यानां तस्मिन्नेवोदितेऽह्नि ॥७१॥
वेलां तामेव कुर्वन्ति ज्वरवेगे सुदुसुदुः।
(वातेनोद्भूयमानस्तु यथा पूर्यत सागरः ॥७२॥
वातेनोदीरितास्तद्वहोषाः कुर्वन्ति वै ज्वरान्।
यथा वेगागमे वेलां छादयित्वा महोदधेः ॥७३॥
वेगहानौ तदेवाभ्रस्तत्रैवान्तनिलीयते।
दोषवेगोदये तद्वदुदीर्यते ज्वरोऽस्य वै ॥७४॥
वेगहानौ प्रशम्येत यथाऽम्भः सागरे तथा)।
एक दोष या दो दोष वायु से प्रेरित होकर, उसी दिन मनुष्यों में ज्वर को उत्पन्न करते हैं, और सम्पूर्ण रूप में घटकर उसी दिन ज्वर को कम भी कर देते हैं। इस प्रकार से ज्वर वेग बार-बार वेला (तरंग) को उत्पन्न करते हैं। (जिस प्रकार कि समुद्र में से वायु के कारण उत्पन्न हुई लहर सारे समुद्र में फैल जाती है, उसी प्रकार वायु से प्रेरित दोष ज्वर को उत्पन्न करते हैं। जिस प्रकार वेग के आने पर वेला (तरंग-लहर) समुद्र के ऊपर फैलती है, वेग के शान्त होने पर वह पानी उसी समुद्र के पानी में लीन हो जाता है, इसी प्रकार दोष वेग के उत्पन्न होने से मनुष्य में ज्वर चढ़ता है, और दोष के शान्त होने पर शान्त हो जाता है। जिस प्रकार कि पानी-समुद्र में से उठता है, और फिर समा जाता है) ॥७२-७४॥
विविधेनाभिघातेन ज्वरो यः संप्रवर्तते ॥७५॥
यथादोषप्रकोपं तु तथा मन्येत तं ज्वरम्।
नाना प्रकार के अभिघात से जो ज्वर उत्पन्न होता है, उस ज्वर को दोष के प्रकोप के अनुसार वैषा ही माना जाता है ॥७५॥