सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ अ० ११ ]
त्रिफला, कुटकी, नीम, पटोल, देवदारु, कटेरी, इनका क्वाथ पीने से सन्निपातज्वर नष्ट होता है। अविपाक, लालाप्रसेक, शोफ, कास, अरोचक को यह नष्ट करता है। त्रिदोषज्वर में त्रिफला का क्वाथ घी के साथ पीये ॥२०४-२०७॥
अनन्ता बालकं मुस्तां नागरं कटुरोहिणीम् । मुखास्त्वनुना प्रागुदयात्पाययेताक्षसंमितम् ॥२०८॥ एष सर्वज्वरान् हन्ति दीपयत्याशु चान्तलम् ।
सारिवा, नेत्रवाला, मुस्ता, सोंठ, कुटकी, इनको एक कर्ष की मात्रा में गरम पानी से सूर्य के निकलने से पूर्व पीये। यह योग सब प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है, और अग्नि को बढ़ाता है ॥२०८॥
द्रव्याणि दीपनीयानि तथा वैरेचनानि च ॥२०९॥ एकशो वा द्विशो वाऽपि ज्वरघ्नानि प्रयोजयेत् ।
पिप्पल्यादि दीपनीय, त्रिहृत्तादि विरेचक, जीर्णज्वरनाशक द्रव्यों को अकेला अकेला या दो-दो अथवा तीन तीन मिलाकर बरते। “सारिवाशर्करापाठामंजिद्राद्राक्षपीलुप्लुषकाभयामलक-विभीतकानि इति दशेमानि ज्वरहराणि ॥” चरक ॥२०९॥
सर्पिर्मध्वभयतैलछेहोऽयं सर्वजं ज्वरम् ॥२१०॥
आन्ति नयेत्त्रिबृन्नापि सक्षौद्रा प्रबलं ज्वरम् ।
घी, मधु, हरड और तेल इनका यह लेह सन्निपातजन्यज्वर को शान्त करता है। मधु के साथ निशोथ प्रबलज्वर को नष्ट करती है। तंत्रान्तर में—
पथातैलभुतक्षौद्रैः लेहो दाहश्रमज्वरान् ।
कासास्यकपित्तवीर्यश्वसात् हन्ति वमीरपि ॥२१०॥
ज्वरे तु विषमे कार्यमूर्ध्वं चाधश्च शोधनम् ॥२११॥
विषमज्वर में रोगी को वमन (कफापिक्क में) और विरेचन (पित्तापिक्क में) देवे ॥२११॥
घृतं प्लीहोदरोक्तं वा निहन्त्याद्विषमज्वरम् ।
प्लीहोदर में कहा घटपलभुत विषमज्वर में देवे।
गुडप्रगाढां त्रिफलां पिबेद्वा विषमादितः ॥२१२॥
विषमज्वर से पीड़ित रोगी प्रचुर गुडमिश्रित त्रिफला को खाये ॥२१२॥
गुडूचीनिम्बधात्रीणं कषायं वा समाक्षिकम् ।
गिलौय, नीम, आंवला इनका क्वाथ मधु के साथ पीये।
प्रातः प्रातः ससपिक्कं रसोनमुपयोजयेत् ॥२१३॥
प्रतिदिन प्रातःकाल लहसुन के रस में घी मिलाकर पीये ॥
त्रिचतुर्भिः पिबेत् काथं पञ्चभिर्वा समन्वितैः ।
मधुकस्य पटोलस्य रोहिण्या मुस्तकस्य च ॥२१४॥
हरीतक्याश्च सर्वोऽयं त्रिविधो योग इष्टयेत् ।
मुलेहटी, पटोल, कुटकी, मुस्ता, हरड इनमें से किन्हीं तीन, या किन्हीं चार या इन पांचों को मिलाकर क्वाथ करके पीये। (इस प्रकार तीन भेदों से सोलह योग बरते हैं) ॥
सर्पिःक्षीरसिताक्षौद्रमागधीर्वा यथाबलम् ॥२१५॥
दशमूलीकषायेण मागधीर्वा प्रयोजयेत् ।
बल के अनुसार घी, दूध, शर्करा, मधु और पिप्पली को बरते। अथवा दशमूल के कषाय से एक कर्ष पिप्पली पीये।
वि० मन्तव्य—घृतं १ से ४ तो०, दूध १ पाव से १ सेर, श्वेतखण्ड ४ तो० से १६ तो०, मधु १ से ४ तो० और पीपल ३-५-७-८ संख्यक पीसकर सबको मिलाकर विषमज्वर से १-२ घण्टा पूर्व पिला देना चाहिये। उसी दिन ज्वर रुक जाता है। परन्तु यह योग निराम विषम ज्वर में दिया जाता है, साम में नहीं। और साम ज्वर को रोकना निषिद्ध है देखिये श्लो० १२१। साम-निराम का विचार किये बिना अंधार्धुध कुनायन का प्रयोग किये जाने से उत्पन्न दुष्परिणामों को चिकित्सक-समाज भलीभाँति देख सुन रहा है। निम्नलिखित बर्द्धमान पिप्पली तथा मद्य का प्रयोग भी उत्कृष्ट दशा में ही करना चाहिये। इसी योग को श्लो० २५५ में “पञ्चसार” नाम से लिखा है और इसके विशिष्टगुण भी लिखे हैं। प्रयोग कीजिये और लाभ उठाइये ॥२१५॥
पिप्पलीवर्धमानं वा पिबेत् क्षीररसाशनः ॥२१६॥
दूध या मांघरस का ही भोजन करते हुए वर्धमान पिप्पली का (व्रत व्याधि में कहीं) उपयोग करे ॥२१६॥
ताम्रचूडस्य मासेन पिबेद्वा मद्यमुत्तमम् ।
मुर्गे के मांस के साथ उत्तम मद्य को पीये।
कोलागिनमन्थत्रिफलाकाथे दध्ना घृतं पचेत् ॥२१७॥
तिल्वकावापमेतद्वि विषमज्वरनाशनम् ।
पंचकोल, (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चम्य, चित्रक, सोंठ), अग्निमन्थ, त्रिफला-इनका एक सौ पल, पानी पांच सौ बारह पल, मिलाकर क्वाथ करे। एक सौ अट्टा इस पल क्वाथ, एक सौ अट्टा इस पल दही और बत्तीस पल घी, आठ पल तिल्वक का कल्क मिलाकर घृत सिद्ध करे। यह विषमज्वर नाशक है ॥
पिप्पल्यतिविषाद्राक्षासारिवाबिल्वचन्दनैः ॥२१८॥
कटुकेन्द्रयवोशीरसिंहोतामलकीघनैः ।
त्रायमाणास्थिराधात्रीविश्वभेषजचित्रकैः ॥२१९॥
पकमेतैर्घृतं पीतं विजित्य विषमाग्निताम् ।
जीर्णज्वरशिरःशूलगुल्मोदरहृलीमकान् ॥२२०॥
क्षयकासं संसतापं पाश्वंशूलानपास्यति ।
पिप्पली, अतीस, द्राक्षा, सारिवा, बिल्व, चन्दन, कुटकी, इन्द्रजो, खस, कटेरी, भूईआंवला, मुस्ता, त्राय