सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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अ० ३६ 1
मणा, शाल्पणीं, वला, सो, चिधक इनके कल्क ओर काय से सिद्ध किया धृत विषमाग्नि को नष्ट करके जीणंज्वर,
शर शल, गुल्म, उद्र, दीमक, क्षयकास, संताप, पाश्वंशूल
क्रो नष्ट करता है ॥२१८-२२०॥ गुद्धचीत्रिफटावासात्रायमाणायवासकेः ।२२१॥ कथितोर्बिधिवत्पकमेतेः कल्कीकरतेः समः ।
्राक्षामागधिकाम्भोद नागरोल्छचन्द नेः ॥२२२॥ पीतं सर्पिः क्षयर्वासकासजीणञ्वरान् जयेत् ।
गिरोय, त्रिफला, वासा, त्रायमाण, धमासा, इनसे बिधि.
वंक बनाये क्वाय म द्राक्षा, पिप्परी, मोथा, सोठ, कमल, | चन्दन, इसको खमान भाग लेकर इनके कल्क से धृत सिद्ध | करे। इस घी के पीने से श्चय, श्वास, कास, जीणंञ्वर नष्ट , होते ह ।।२२१,२२२॥। करगीवरहती्राक्षात्रायन्तीनिम्बगोल्धुरेः ॥२२३॥
बछापपेटकाम्भोदञ्ाखपर्णीयवासकैः। + ९६ र पक्वमुत्क्वथितेः सर्पिः कल्केरेभिः समन्वितम् ॥२२४॥ गरटीतामलकौभारगीमिदामल्कपौष्करः ।
क्षीरद्विगुणसंयुक्तं जीणेञ्वरमपोहति ॥२२८॥
५ ५ शिरःपारवंरुजाकासक्षयप्रश्मन परम् ।
्रिनिपर्णी, कटेरी, द्राक्षा, चायमाण, नीम, गोखरू, बा,
पित्तपापडा, मोथा, शालपर्णी, जवासा, इनका क्वाथ करे ।
इसमे कचूर, भृडे आंवला, भागी, गेदा, आंवला, पुष्करम्, ए्नका कल्क ओर षी से दुगुना दूध मिलाकर धृतपाकं करे । इस धी के पीने से. जीणेज्वर नष्ट होता दै, शिरःशल, कास, य नष्ट होता इ ।॥२२३-२२५॥ पटोडी पपंटारिष्टगुडचौत्रिफछाबरषेः ॥२२६॥
कटुकाम्बुदभूनिम्बयासयष्टयाहचन्दनेः। दार्वीशक्छयवोञीरत्रायमाणाकणोत्पङेः ॥२२७॥ धात्रीशङ्गरजोभीरुकाकमाचीरसेषरेतम् । सिद्धमाश्वपचीङुष्ठञररदुक्राजेनत्रणान् ॥२२९॥
हन्यान्नयनवदनश्रवणघ्राणजान् गदान् । पटोल, पित्तपापडा, नीम, गिलोय, त्रिफला, अद्कसा, ऊुटकौ, मोथा, चिरायता, जवास, मुङेहटी, चन्दन, दारहल्द), इन्द्र
र › लस, बायमाण, पिप्पटी, कमर इनके कल्क से आंवला;
› शतावरी, मको, इनके स्वरसो से सिद्ध किंया धृत
ही अपची, कुष्ट, जवर, शुक्रवण, अजुनत्रण, नेत्र-युख+कान-
| ७ के रोगों छो नष्ट करता है । (डल्हण ने उपह का
| १ नीलोफर किया दै) ॥२२६-२२८) भ. विडङ्गतरिफलामुस्तमख्िष्ठादाडिमोतपरैः ॥२२९॥ यङ्गेखेखवालूकचन्दनामरदारुमिः॥ छृ्ठरजनीप्णिनीसारिवा्रयेः॥२३०॥ हरेणुकातनिददन्तीवचातालीरकेसर।
उत्तरतेन्त्रम् ६९१ दविक्षीरं विपचे्सरपिमौटतीकुसुमेः सह ॥२३१॥ जीणज्वरवासकासगुमोन्मादगरापहम् । एतत्कल्याणकं नामसर्पिमा ्गल्यसुत्तमम् ॥२३२॥ अठदमीग्रहरक्षोऽग्निमान्यापस्मारपापनुत् । रस्यते नषटञुक्राणां वन्ध्यानां गभदं परम् ॥२३३॥ मेध्यं चज्लष्यमायुष्यं रेतोमागविशोधनम् । एतेरेव तथा द्रभ्येः सवेगन्धेश्च साधितम् ॥२३४॥ कपिलाया घतप्रस्थं सुबणेमणिसंयुतम् ।
विडग, त्रिफला, मुस्ता, मजीठ, अनार, नीलोफर, प्रियरु, इलायची, एेखवालुक, चन्दन, देवदास, वरिष्ठ (वालक), कूठ, हल्दी, शालपर्णी, सारिवा, काटीसारिवा, रेणु, निशोय, जमालगोटा, वच, तालीश, नागकेषर, चमेली के पएूल, इनका कल्क, दुगुना दुध, इनसे धृत सिद्ध करे । यह घृत जीणञ्वर कास,श्वास, गुल्म उन्माद, गरना्यक दै । यह कल्याणक घृत हे । यह धृत मंगख्कारी श्रेष्ठ ह । अलक्मी, प्रह, राक्षस,
अग्िमान्य, अपस्मार, पापनाशक दै । नष्टशुक्र पुरुषों के लि
४ उत्तम् दै, बन्ध्याओं को गमप्रद् है । मेध्य, चन्ञुष्य, आयुष्य दै, रेतोमागं का 8 इ. ् वक्तव्य--इसमें पानी षी से चारगुणा मिलाना चाहिये ।
कल्क आठ पछ, घी एक प्रस्थ, पानी चार प्रस्थ, दूध दो प्रस्थ
के | चरक मे ~ “विशाखा त्रिफला कोन्ती देवदाव्॑वालुक्म् ।
स्थिरानतं रजन्यौ दर सारिवे दे प्रियंगुका । नीरोखरेला मजिष्ठा
दन्तीदाड़िमकेखरान्। ताीशपत्रं बृहती मालत्याः कुखुमंनवम्॥
विडंग प्रशनिपणीं च कृष्टं चन्दनपद्मको । ` अष्टाविंशतिभिः
कल्कैरेतेरक्च समन्वितः | चतुगु णे जले सम्यग् घृतप्रस्थं | विपा-
चयेत् ।'' इसमें दष नहीं है ॥९२९-२२४॥
तरक्षीरेण सहैकध्यं प्रसाध्य कुसुमे रिमेः ॥२३५॥ ;
सुमनय्चस्पकागोकञिरीषङुसुमेवृतम् तथा नङ्दपद्यानां केशरेदोडिमध्य च ॥२३६॥
तिथौ प्रशस्ते नक्षन्ने साधकस्यातुरस्य च ।
कृतं मनष्यदेवाय ब्राह्मणेरभिमन्त्रितम् ॥२२५॥
दत्तं सवेऽवरान् हन्ति महाकल्याणक स्विद्म् (२३८
द्ज॑नस्पञ्ैनाभ्यां च सवंरोगहरं शिवम् ।
अधृष्यः स्ैभूतानां बलीपडितिब जितः ॥२२९॥
अस्याभ्यासाद् धृतस्थेह जीवेद्रषशतज्नयम् ।
इन कल्याणक धृत के द्रव्यो से तथा उवेगन्धगण् के द्रव्यों
से चमेली, चम्पा, अशोक, शिरीष; इनके नूतन कुसुमों के
साथ, जटामांखी, लाख्कमल, अनार क] केसर, इन द्रव्यो से,
सुवणं, मणि आदि के साय, कपिला (काटे) गाय के दूध मे
कपिलगाय का एकं प्रस्थ घृत सिदध करे। ब्राह्मणों से अभिमंत्नित
करके, शस्त तिथि एवं नक्षत्र मे वेय, रोगो ओर राजा के |
ल्म देने से यहः धृत सब वरो कौ न्ट करता है । इसका
नाम महाकल्याणक घृत ह । देखने यूने से ख रोग नाक
"भि = = ७ * षय ॐ ^ > शक ~ क > ९.७ क~ उः ~ भ 4 भभ
(८ न्य.