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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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एवं कल्याणकारी है । इखसे सब प्राणियों से अतिरस्कृत; वरो-

पलित रहित होकर निरन्तर सेवन करते रहने से तीन खो वे

तक जीता ह ।

एभ्य एव स्थिराढीनि जले पक्तवेकर्वियतिम्‌ ।

रसे तस्मिन्पचेत्‌ सर्पिः गषटक्षीरे चवर णे ॥

वीराद्धिमाषकाकोली स्वयंगुस्तषमधिभिः |

मेदया च समेः कल्कैः तस्स्यात्‌ कल्याणकं महत्‌ ॥

वहणीयं विशेषेण सन्निपातदहरं परम्‌ ॥

चरक चि० अ० ६।४६-५१।.२३४-२३६॥

गव्यं दधि च मूत्रं च क्षीरं सपिः शङ्द्रसः॥२४०॥

खसभागानि पाच्यानि कल्कारचेतान्‌ समावपेत्‌ ।

त्रिपखां चिन्नकं सुस्तं हरिद्राऽतिविषे वचाम्‌ ॥२४१॥

विडङ्गं उयूषणं चभ्यं सुरदारु तथेव च ।

पद्चगन्यमिदं पानाद्विषमञ्वरनाशनम्‌ ॥२४२॥

पचगव्यधृत-गाय का दही, गोमून, गोदूष, गोघृत ओर

गोबर का रख, ये पाचों वस्त॒एं सममाग लेकर त्रिफला) चित्रक

सस्ता, हल्दी, अतीस, वच, विडंग, त्रिकटु, चव्य, देव दाख

इनके कल्क से घृत पाक करे । यह पंचगन्यधृत पीने से विषम￾उ्वर नाशक ह । (यह महत्‌ पंचगव्यधत है) ॥२४०-२४२॥।

पच्चगम्यघुते गभार्पाच्यमन्यद्‌ वृषेण च ।

बलयाऽथ परं पाच्यं गुडच्या तद्वदेव तु ॥२४२॥

जीणंञ्वरे च शोफे च पाण्डुरोगे च पूजितम्‌ ।

इसी पचगव्यधृत मं कल्क न मिलाकर घृतपाक करे तौ यह्‌

दूसरा पंचगव्यधृत (ल्घु) हे । अद्धसे के पर्त के, या बला के

अथवा गिलोय के स्वरस से घृत सिद्ध करे । ये तीनों घत जीण￾ज्वर, शोफ ओर पाण्ड्रोग मे उत्तम द ॥२८३॥ †

एतेनैव तु कल्पेन घतं पश्चाविकं पचेत्‌ । पच्वाजं पञ्चमदहिषं चतुरुष्टूमथापि च ॥२४४॥ पृचगव्य के विधान से परचआविक (भे के दूष, घी, मूत्र

मकर, दही से), पञ्ञाज (बकरी के दुध आदि), पञ्चमदिष

(भख के दुष आदि), चार ॐँट के (गोबर-मल को छोडकर

दूध, दही आदि से) घत सिद्धं करे ॥२४४॥।

त्रिफखोशीरशम्पाककटुकातिविषाघनैः। शतावरीसप्तपणगुड्‌ ची रजनीद्रयः ॥२४५॥ चित्रकञ्चिवृतामृबोपटोरारिष्टवाक्केः । `

छिराततिक्तकवचाविशाखापदूमकोत्पदेः ॥२४६॥

सारिबाद्वययष्टयाहच विकार क्तचन्दनेः। दुराख्मापपेटकत्रायमाणाटरूषकेः ॥२४७]॥

रास्नाुकममच्ष्ठामागधीनागरेस्तथा ।

धात्रीफटरसेः सम्यण्िगुणेः साधितं हविः ॥२४८॥

परिसपेञ्वरश्वासगुल्मञ्ृ्ठनिवारणम्‌ |

पाण्ड्ष्टीहाग्निसादिभ्य एतदेव परं दितम्‌ ।२४९।

सुश्रतसंहितां

र.

| अ० ३६

त्रिफला, खस, अमलतास, कटको, अतीस, सस्ता, शता.

वरी, सप्तपण, गिलोय, दल्दी, दारुहल्दी, चित्रक, निशोध मूवाँ, पटोल, नीम) ने्वाला, चिरायता, वच, इन्रायण

पद्माख, नीलोफर, सारिवा; काीखारिवा, मजीट, चपिका'

राल्चन्दन, धमासा, पित्तपापडा, चायमाण, अद्भसा, राला |

केखर, मजीठ, पिप्पली, सोठ, इनके कल्क से ओहि र

स्वरस (या क्वाथ) घी से दुगुना लेकर धृत सिद्ध करे | यह

घृत विसपं, ज्वर, श्वास, गुल्म, कुष्नाशक दै । पाण्ड, ष्ठीह

अग्निमान्य के ल्थि दितकारी है ॥२५५-२४६॥

पटोलकटुकादा्वी निस्बवासाछत्निकम्‌ । दुराङमापरपटकत्रायमाणाः पलोन्मिताः ॥२५०॥ प्रस्थमामख्कानां च क्वाथयेत्सक्िकामणे। ` तेन पादावशेषेण घतग्रस्थं विपाचयेत्‌ ॥२५१॥

कल्केः कुट जभूनिम्बघनयष्ट याह्वचन्दनैः ।

सपिप्पटीकेस्तस्सिद्धं च्च्य सुक्खयोर्हितम्‌ ॥२५२॥ प्राणकणौक्िवद्नवत्मेरोगत्रणापहम्‌ |

रक्तपित्तकफस्वेदक्रेदपूयोपसोषणम्‌ ॥२५३॥

कामङाञ्वरवीसपेगण्डमाखहर परम्‌ ।

पटोल, कुटकौ, दार्दल्दी, नीम अङ्सा, चिफडा, षमाष,

पित्तपापडा, चायमाण प्रस्येक एकपल, आंवला एक प्रस्थ-नको

एक द्रोण जल मेँ क्वाथ करे । चौथाई रहने पर क्वाथ षे

एक प्रस्य घी, कुटज, चिरायता, मोथा, युेहटी, चन्दन

पिप्पली इने कल्क से सिद्ध करे । यह घृत ने के छथि तथा

ने्रगत शक्छभाग के रोगों मे उत्तम दै। नासिका) कान

आंख, मुख; वतमं रोग एवं व्रणका नाशक ह । रक्तपित्त, $

स्वेद, क्लेद, पूय को सुखाता है । कामला; ज्वरः वि

गण्डमाला को नष्ट करने मे उत्तम हे ॥२५०-२५२॥

श्रतं पयः करा च पिप्पल्यो मधुसपिषी ॥२५४॥

पञ्चसारमिदं पेयं मथितं विषमञ्वरे।

कषतक्षीणे क्षये श्वासे हृ्ोगे चैतदिष्यते ॥२५५॥ ।

गरम किया दूष, शकरा, पिप्पली, मधुः धृत, इनक मथ

कर, इसको पीये । यह पंचसार विषमशञ्वर म; छतक्षीण छ्य अ, श्वास भे, हृदय रोग म उत्तम दै । (इनक €“

बिलोना चाहिये) ॥२५४,२५५॥ ‹ |

खाक्षाविदवानिञ्ामूवांमलिष्ठावरसजकामयैः। ह

षड्गुणेन च तक्रेण सिद्ध' सीलं उवरान्तकरत्‌ । ^

लाख, सोठ, हल्दी, मबा; मंजीठ, सखजकक्षाएु क वि

पठ) इनसे तैक (३२ पर) को, तेर से ॐ ने प ~

करे । यह तेरु शौतपूरव, दाहपूव स्वरो को न्ट १ 3

| क्षीरीबृक्षासनारिश्नम्बूखपच्छदानः ५७॥ ` ॥ चिरीषखदिरास्फोटामृतवस्ट्याटरूषकः ^^