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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 756

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मुभ्रतसंहिता

[अ० ३१]

शूल के साथ, बहुत बार, कठिनाई से रुक-रुककर जो मल त्याग करता हो, उस रोगी के एकत्रित हुए दोषों को हरड़ों से प्रवृत्त करे । (हरीतकी अनुलोमनी है ) ॥३१॥

योऽतिद्रवं प्रभूतं च पुरीषमतिसार्यते । तस्यादौ वसन्तं कुर्यात् पश्चात्लंघनपाचनम् ॥३२॥ जो रोगी अतिशयद्रव, मात्रा में बहुत मल प्रवाहित करता है, उसे सबसे प्रथम वसन कराये, फिर लंघन और पाचन देवे । स्तोकं स्तोकं विबद्धं वा सशूलं योऽतिसार्यते । अभयापिप्पलीकल्कैः मुखोष्णैस्तं विरेचयेत् ॥३३॥

जो रोगी, थोड़ा-थोड़ा, रुक-रुक कर शूल के साथ मल त्याग करता हो, उसे गरम पानी के साथ हरड़ और पिप्पली का चूर्ण देकर विरेचन देवे । (‘‘कृच्छ्रं वा वहतां दद्यादभयां संप्रवर्तिनीम्’’ चरक) ॥३३॥

आमे च लंघनं शस्तमादौ पाचनमेव वा । आमातीसारं प्रथमं लंघनं अथवा पाचनं उत्तमं है । योगाश्चात्र प्रवद्व्यन्ते त्वामातीसारनाशनाः ॥३४॥ आमातीसारनाशक योगों को यहाँ कहा जाता है ॥३४॥ कलिङ्गातिविषाहिङ्गुसौवर्चलवचाभयाः । देवदारुवचामुस्तानागरातिविषाभयाः ॥३५॥

अभयाधान्यकं मुस्तं पिप्पली नागरं वचा । नागरं धान्यकं मुस्तं बालकं बिल्वमेव च ॥३६॥ मुस्तं पपटकं शुण्टी वचा प्रतिविषाभया । अभयाऽतिविषा हिङ्गु वचा सौवर्चलं तथा ॥३७॥

चित्रकः पिप्पलीमूलं वचा कटुकरोहिणी । पाठा वत्सकबीजानि हरीतकयो महौषधम् ॥३८॥ मूर्वा निर्देहनी पाठा व्युषणं गजपिप्पली । सिद्धार्थका भद्रदारु शताह्ना कटुरोहिणी ॥३९॥

एला सावरकं कुष्ठं हरिद्रं कोटजा यवाः । मेघशृङ्गी त्वगेले च क्रमिन्दं वृक्षकाणि च ॥४०॥ वृक्षादनी वीरतरुर्वृहत्स्यौ द्वे सहे तथा । अरुत्तुकं तैन्दुकी च दाडिमी कौटजी शमी ॥४१॥

पाठा तेजोवती मुस्तं पिप्पली कौटजं फलम् । पटोलं (ली) दीप्यकं बिल्वं हरिद्रं देवदारु च ॥४२॥ विडङ्गमभया पाठा शृंगवेरं घनं वचा । वचा वत्सकबीजानि सैन्धवं कटुरोहिणी ॥४३॥

हिङ्गुर्वत्सकबीजानि वचा बिल्वशलादु च । नागरातिविषे मुस्तं पिप्पल्यो वात्सकं फलम् ॥४४॥ महौषधं प्रतिविषा मुस्तं चेत्यामपाचनाः । प्रयोज्या विशतियोगाः श्लोकार्घविहितास्त्वमे ॥४५॥

धान्यान्मोष्णान्मुखधानां पिबेद्व्यतमेन वा । निष्कवाथान् वा पिबेदेषां सुखोष्णान् साधुसाधितान् ।

बीस योग (१) इन्द्रजौ, अतीस, हींग, संचल और हरड़ (२) देवदारु, वच, मुस्ता, सौठ, अतीस, हरड़, (३) हरड़, धनिया, मोथा, पिप्पली, सौठ, वच, (४) सौठ, धनिया, मोथा, नेत्रवाला बिल्व, (५) मोथा, पिचपापड़ा, सौठ, वच, अतीस, हरड़, (६) हरड़, अतीस, हींग, वच, संचल, (७) चित्रक, पिप्पलीमूल, वच, कुटकी, (८) पाठा, इन्द्रजौ, हरड़, सौठ, (९) पूर्व, चित्रक, पाठा, त्रिकटु, गजपिप्पली, (१०) सरसों, देवदारु, सौफ, कुटकी, (११) इलायची, लोथ, कूट, हल्दी, दारुहल्दी, इन्द्रजौ, (१२) मेघशृङ्गी, दालचीनी, इलायची, विडंग, कूटज, (१३) वन्दा, वीरतरु, कटेरी, मुद्गपर्णी, (१४) श्योनाक की छाल, तिन्दुक की छाल, अनार की और कुटज की छाल, शमी की छाल, (१५) पाठा, तेजबल, मोथा, पिप्पली, इन्द्रजौ, (१६) पटोल, अजवायन, बिल्व, हल्दी, दारुहल्दी, देवदारु, (१७) विडंग, हरड़, पाठा, सौठ, मोथा, वच, (१८) वच, इन्द्रजौ, सैन्धव, कुटकी, (१९) हींग, इन्द्रजौ, वच, कच्चे बिल्व (२०) सौठ, अतीस, मोथा, पिप्पली, इन्द्रजौ ये आधे श्लोक में कहे योग कांजी, गरम पानी या मद्य किसी एक के साथ पीने चाहिये । अथवा इनका क्वाथ भली प्रकार करके, सुहाता गरम गरम पीये । सौठ, अतीस और मोथा ये आम के पाचक हैं ।

वक्तव्य—इल्हण का कहना है कि अतीसार में द्रव औषध बड़ी मात्रा में नहीं देनी चाहिये । इसलिये इन योगों का चूर्ण करके ही बरते ॥३५-४६॥

पयस्युत्कवाध्य मुस्तानां विशति त्रिगुणाम्भसि । क्षीरावशिष्टं तत्पीतं हन्त्यामं शूलमेव च ॥४७॥ निखिलेनोपदिष्टोऽयं विधिरामोपशान्तये । हरीतकीमतिविषां हिङ्गु सौवर्चलं वचाम् ॥४८॥ पिवेत् सुखाम्बुना जनतुरामातीसारपीडितः । पटोलं दीप्यकं बिल्वं वचापिप्पलितानगरम् ॥४९॥ मुस्तं कुष्ठं विडङ्गं च पिबेद्वाऽपि सुखाम्बुना । शृंगवेरं गुड्डीं च पिबेदुष्णेन वारिणा ॥५०॥ लवणान्यथ पिप्पल्यो विडंगानि हरीतकी । चित्रकं शिशपा पाठा शाङ्गैह्ना लवणानि च ॥५१॥ हिङ्गुर्वृक्षकबीजानि लवणानि च भागशः । हस्तिदन्त्यथ पिप्पल्यः कल्कावक्षसमौ स्मृतौ ॥५२॥ वचा गुड्डीकाण्डानि योगोऽयं परमो मतः । एते सुखाम्बुना योगा द्यथाः पञ्च सतां मताः ॥५३॥ मुस्ता बीस, दूध एक भाग और पानी तीन भाग (मिलित नातुर्गुण) लेकर क्वाथ करे । जब केवल दूध मात्र शेष रहे, उसको पीये, इससे आम और शूल नष्ट होता है । आम को शान्त करने के लिये विधि सम्पूर्ण रूप में कह दी है । हरड़, अतीस, हींग, सौवर्चल, वच इनकी