सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 755, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 755

अ० ४० ]

उत्तरतन्त्रम्

६६९

जाता है । मल-अतिशय दुर्गन्धयुक्त, दूटा-दूटा थोड़ा प्रवृत्त होता है, इसको आमातीसार कहते हैं ।

मज्जत्यामागुरुत्वाद् विद पक्वात् पुल्वते जले । विनाऽतिद्र- वसंवातैः शैत्यश्लेष्मप्रदूषणात् । परीक्ष्यैव पुरा सामं निरामं चामदोषिणाम् । विधिनीपचरेत् सम्यक् पाचनेनेतरेण वा ॥ चरक ॥१७॥

एतान्येव तु लिङ्गानि विपरीतानि यस्य तु । लाघवं च मनुष्यस्य तस्य पक्वं विनिर्दिशेत् ॥१८॥

उपयुक्त लक्षणों से विपरीत लक्षण जिस मल में हों, (जो मल पानी में तैरे), रोगी के शरीर में हल्कापन रहे उसको पक्वातीसार जानना ॥१८॥

सर्पिर्मदोवेसवाराभ्युत्तेल- मज्जाक्षीरक्षौद्रूपं घवेद्यत् ।

मस्त्रिष्टाभं मस्तुलुङ्गोपमं वा विच्छं गीतं प्रेतगन्धयुक्तानाभम् ॥१९॥

राजीमद्रा चन्द्रकैः सन्ततं वा पूयप्रस्थं कर्दमाभं तथोष्णम् ।

हृन्यादेतद्यत् प्रतीपं भवेच्च क्षीणं हन्युश्चोपसर्गां प्रभूताः ॥२०॥

असंबृत्तगुदं क्षीणं दुराध्मातमुपद्रुतम् । गुदे पक्वे गतोष्माणमतीसारकिणिं त्यजेत् ॥२१॥

असाध्यलक्षण—जिस मल का रूप घी, मेद, वेसवार (कुहितमांस), पानी, तैल, मज्जा, दूध, मधु के समान, या मंजीठ अथवा मस्तुलुङ्ग के समान हो, सड़ी गन्ध का, ठण्डा, सुई की गन्ध का, या काला हो, जिस मल में रेखायें या चन्द्रिका (मोर पंख का रंग) सारे में फैली हो, पूय के या कीचड़ के समान, उष्ण हो, तथा दोष के अपने लक्षणों से विपरीत लक्षणों से युक्त, बहुत से उपद्रवों से युक्त, एवं क्षीण पुरुष को अति- सार नष्ट कर देता है । जिस रोगी की गुदा ढीली पड़ गई (संकुचन शक्ति नष्ट हो गई), क्षीण अतिशय आध्मानयुक्त, उपद्रवों से पीड़ित, गुदा के पक जाने पर भी जिसमें उष्णिमा कम हो गई हो, ऐसे अतिसार रोगी को छोड़ देवे ।

वक्तव्य—शोफं शूलं ज्वरं तृष्णां श्वासं कासमरोचकम् । छर्दिं हिक्कां च मूर्छां च हृष्ट्वाऽतीसारिणं त्यजेत् ॥२२-२१॥

शरीरिणामतीसारः संभूतो येन केनचित् । दोषाणामेव लिङ्गानि कदाचिन्नातिवर्तते ॥२२॥

स्नेहाजीर्णनिमित्तस्तु बहुशूलप्रवाहिकाः । विस्मिकानिनिमित्तस्तु चान्योऽजीर्णनिमित्तजः ।

विषाशैः क्रमिसंभूतो यथास्वं दोषलक्षणः ॥२३॥ पुरुषों में अतीसार चाहे किसी भी कारण से क्यों न हों, वह वातावि दोषों के लक्षणों का अतिक्रमण नहीं करता ॥

स्नेहजन्य अजीर्ण के कारण, अतिशयशालयुक्त प्रवाहिका होती है । विस्मिकीजन्य अतीसार, अजीर्णजन्य अतीसार का ही रूपान्तर है । विष, अर्श एवं क्रमि से उत्पन्न अतीसार में अपने-अपने दोषों के लक्षण होते हैं । (इसलिये अतीसार छेः ही हैं) ।

आमपक्वक्रमं हिंस्वा नातिसारे क्रियायुतः । अतः सर्वेऽतिसारास्तु ब्रूयाः पक्वामलक्षणैः ॥२४॥

अतीसार में चिकित्सा आम और पक्व के लक्षणों से की जाती है, इसलिये सब अतीसारों में आमातीसार और पक्वा-तीसार के लक्षणों को जानना चाहिये ॥२४॥

तत्रादौ लङ्गनं कार्यमतिसारेषु देहिनाम् । ततः पाचनसंयुक्तो यवाग्वादिक्रमो हिः ॥२५॥

मनुष्यों के सब अतीसारों में सबसे प्रथम लंघन कराना चाहिये । फिर लंघन के उपरांत पाचन से मिला यवाग्-यूप आदि विधि बरतनी चाहिये ॥२५॥

अथवा वामथिरवाऽऽमे शूलआध्मानिपीडितम् । पिप्पलीसेन्धवाभूमिलेङ्गनायैरुपाचरेत् ॥२६॥

अथवा आमातीसार में शूल, आध्मान होने पर रोगी को, पिप्पली और सेन्धव मिश्रित गरम पानी से वमन कराके लंघन यवाग् आदि से चिकित्सा करे ॥२६॥

कार्यं च वमनस्यान्ते प्रदवं लघुभोजनम् । खड्ययूपयवाग्पु पिप्पल्याद्यं च योजयेत् ॥२७॥

वमन के पीछे द्रवबहुल एवं लघु भोजन देना खड्ययूप, यवाग् आदि साधन में पिप्पल्यादिगुण का उपयोग करे ।

वक्तव्य—कथिथ, मरिच, अनारदाना आदि से पकाया तक खड्ययूप है, अनारदाना, तक, शाकादि से संस्कृत द्रवों को खड्ययूप कहते हैं । मूंग मसूर आदि से बना यूप है ॥२७॥

अनेन विधिना चामं यस्य वै नोपशास्यति । हरिद्रादिं वचादिं वा पिबेत् प्रायः स मानवः ॥२८॥

इस विधि से जिस रोगी का आमातीसार शान्त न हो, वह रोगी प्रातःकाल हरिद्रादि या वाचादिगुण का स्वाय प्रातः पीये ॥२८॥

आमातीसारिणां कार्यं नादा संग्रहणं नृणाम् । तेषां दोषा विबद्धाः प्रागजनयन्त्यामयानिमान् ॥२९॥

प्लोहपाण्डुवामयानाहमेहकुष्ठार्द्रज्वरात् । शोफगुरुमग्रहणशूलालसकहृदग्रहान् ॥३०॥

आमातीसार में मनुष्यों को संग्राहक औषध नहीं देनी चाहिये । क्योंकि इनसे रोके हुए दोष निम्न रोगों को उत्पन्न करते हैं, यथा—प्लोहा, पाण्डुरोग, आनाह, प्रमेह, कुष्ठ, उदर, ज्वर, शोफ, गुरुम, पाण्डु, ग्रहणो, अर्श, शूल, अलसक, हृदग्रह-इन रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥२९,३०॥

सशूलं बहुशः क्रुच्छाद्विबद्धं योऽतिसार्यते । दोषान् सन्निचितान् तस्य पथ्याभिः संप्रवर्तयेत् ॥३१॥