सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४० ]
छटा है। कई ( हारीत आदि ) आचार्य कहते हैं कि अतीसार द्रव्दज आदि भेद से अनेक प्रकार के हैं, परन्तु काशीराज धन्वन्तरि का कहना है कि यह ठीक नहीं। आमावस्था, पक्वावस्था, रक्तावस्था, ये भेद दोष की अवस्था से ही होते हैं, इसलिये अनेक प्रकार का अतिसार नहीं है, इस अतिसार में समय समय पर ये अवस्थायें उत्पन्न हो जाती हैं।
वक्तव्य—द्रव्दज आमातिसार, पक्वातिसार आदि भेद धन्वन्तरि को मान्य नहीं हैं। ये भेद अतिसार की अवस्था भेद से उत्पन्न होते हैं। प्रथम आमावस्था फिर पक्वावस्था, पितातिसार में पिताकारक वस्तुओं के सेवन से रक्तातिसार उत्पन्न होता है ॥७॥
हृन्ताभिपायुदरकुक्षितोद-
गात्रावसादानिल्लुन्तिरोधाः ॥८॥
विट्सङ्घ आधमानमथाविपाको
भविष्यतस्तस्य पुरःसराणि ।
पूर्वरूप-हृदय-नाभि गुद, उदर, कुक्षि (कोख) में चुभने की सी दर्द, अंगों में शिथिलता, वायु का अवरोध, मल की रूकावट. आधमान, अविपाक-इस अतिसार रोग के पूर्वरूप हैं ॥
शूलाविष्टः सक्तमूत्रोऽन्त्रकूजी
स्रस्तापानः सन्नक्तव्यरुजङ्गः ॥९॥
वचो मुख्तव्यल्पमल्पं सफेनं
रुक्षं श्यावं सानिलं मारुतेन ।
वातातीसार में रोगी को शुद्ध रहता है, मूत्र रुकता है, आँतों में गड़गड़ाहट होती है, गुद शिथिल रहती है, कटि, ऊरु और जंघा ढीली सुस्त, क्षाग के साथ साथ थोड़ा मल बाहर आता है, यह मल रुक्ष, श्याव वर्ण और वायु से मिला होता है ॥९॥
दुर्गन्धयुष्णं वेगवर्मासतोय-
प्रख्यं भिन्नं सिन्वन्देहोऽतितीक्ष्णम् ॥१०॥
पितात पीतं नीलमालोहितं वा
तृष्णन्मूच्छोदाहपाकव्वरार्तः ।
पितातिसार में मल दुर्गन्धयुक्त, उष्ण, वेग के साथ ( एकदम ) प्रवाहित होता है, इसका रंग मांस के धोवने के समान, तथा पुरीष फटा हुआ होता है, रोगी को पसीना आता है, पित्त के कारण मल में तीक्ष्णता पीलापन, नीलापन या रक्तिमा रहती है। रोगी को प्यास, दाह, मूच्छा, गुदपाक, व्वर आता है ॥१०॥
तन्द्रानिद्रागौरवोत्कलेशासादी
येगाशङ्की सूक्ष्मविट्कोऽपि भूयः ॥११॥
शुक्लं सान्द्रं श्लेष्मणा श्लेष्मयुक्तं
भक्तद्वेषी निःस्वनं हृष्टरोमा ।
कफ के कारण अतिसार रोगी को तन्द्रा, नींद, भारीपन, जीमचलाना, शिथिलता रहती है, मलका त्याग कर चुकने पर भी मल की आंशका बनी रहती है। मल-श्वेत, घट्ट, कफ से मिला होता है। भोजन से अरुचि, मल बिना शब्द के आता है, शरीर में रोमांच रहता है ॥११॥
तन्द्रायुक्तो मोहसादास्यशोषी
वर्चः कुर्यान्नैकवर्णं तृषार्तः ॥१२॥
सर्वोद्भूते सर्वलिङ्गोपपत्तिः
कृच्छ्रश्चरायं बालवृद्धेऽवसाध्यः ।
सन्निपातजन्य अतीसार में तन्द्रा होती है, मूच्छा, शिथिलता, मुख में शुष्कता रहती है, मल भी अनेक वर्णों का होता है, रोगी को प्यास रहती है, सब दोषों के लक्षण रहते हैं, यह कष्टसाध्य है, बालक एवं वृद्धों में असाध्य है ॥१२॥
तैस्तेभोर्वैः शोचतोऽल्पपाशनस्य
बाष्पावेगः पक्तिमाविध्य (इय) जनतोः ॥१३॥
कोष्ठं गत्वा क्षोभयत्यस्य रक्तं
तच्छाधस्तात् काकणन्तीप्रकाशम् ।
वचोमिश्रं निःपुरीषं सगन्धं
निर्गन्धं वा सायते तेन कृच्छ्रात् ॥१४॥
शोकोत्पन्नो दुःखिकित्त्योऽतिमात्रं
रोगी वैद्योः कष्ट एष प्रदिष्टः ।
बन्धुविद्योग, धननाश आदि कारण से चिन्ता करते हुए एवं थोड़ा भोजन लेनेवाले मनुष्य में बाष्प का आवेग (शोकजन्य उद्रेक) कोष्ठ में जाकर अन्तरगति के साथ मिलकर इस पुरुष के रक्त चिनीठी (गुजा) के समान, मल से मिला या मल के बिना, गन्ध के साथ, या बिना गन्ध के कष्ट से गुदामार्ग द्वारा प्रवृत्त होता है। यह शोकजन्य अतीसार अतिशय कष्ट साध्य है, यह रोग वैद्यों ने कष्टसाध्य कहा है।
वक्तव्य—इसमें कोई-कोई—“शुष्कं मुक्तं तेज ऊभयहीतं कोष्ठं गत्वा रक्तमत्यर्थमुष्णम्। गुञ्जाप्रख्यं प्रेरयेच्छाध्यश्चात्तद् वचोयुक्तं निष्पुरीषं सगन्धम् ॥” यह पढ़ते हैं ॥१३, १४॥
आमाजीर्णोपद्रुताः क्षोभयन्तः
कोष्ठं दोषाः संपद्रुष्टाः सभक्तम् ॥१५॥
नानावर्णं नैकशः सारयन्ति
कृच्छ्राज्जन्तोः षष्ठमेनं बदन्ति ॥१६॥
आमाजीर्ण से कुपित हुए दूषित हुए दोष कोष्ठ को विथी, भित्त करते हुए, भोजन के साथ मल को प्रवाहित करते हैं, यह मल अनेक वर्णों का बहुत बार कठिनाई से प्रवृत्त होता है। यह छटा अतीसार होता है ॥१६॥
संसृष्टमेभिदोषैस्तु न्यस्तमप्यवसोदति ।
पुरीषं भृशदुर्गन्धि विच्छिन्नं चामसंज्ञकम् ॥१७॥
इन दोषों से मिला मल पानी में डाला हुआ है