सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 758, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें७०२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४० ]
चत्वार एते योगाः स्युः पक्वातीसारनाशनाः ।
उक्ता य उपयोऽस्यास्ते सक्षौद्रास्तण्डुलाम्बुना ॥७१॥
चार योग (१) संसंगा (लाजवन्ती), धायके फूल, मजीठ लोघ, मुस्ता, (२) मोचरस, लोघ, अनार की छाल, कड़े की छाल, (३) आमकी गुठली की मरजा, लोघ, बेल का गूदा, प्रियंगू, (४) मुलेहटी, सोंठ, श्योनाक की छाल; ये चार योग पक्व अतिसार नाशक हैं। इन योगों को मधु और चावलों के पानी के साथ पीना चाहिये ॥६६-७१॥
मौस्तं कषायमेकं वा पेर्यं मधुसमायुतम् ।
लोघ्राम्बघ्राप्रियङ्गवादीन् गणानेवं प्रयोजयेत् ॥७२॥
अकेले मोये का ही क्वाथ मधु के साथ पक्वातिसार में पीये। लोघ्रादि गण, अम्बघ्रादिगण, प्रियंग्वादिगणों को इसी प्रकार (कषाय करके मधु के साथ) पीये। कहा भी है—
“पक्वातीसारिणे देयो मुस्ताक्वाथः समाधिकः ॥” ७२॥
पद्मा समझां मधुक्ं विश्वतम्बूशलाटु च ।
पिवेत्तण्डुलतोयेन सक्षौद्रमगदंकरम् ॥७३॥
भागीं, लाजवन्ती, मुलेहटी, कच्चे बिल्ब, कच्चे जामुन इनको मधुमिश्रित चावल के घोवन के साथ पीवे। यह अतिसारनाशक है ॥७३॥
कच्छुरामूलकरकं वाऽप्युदुम्बरफलोपलम् ।
पयस्या चन्दनं पद्मा सितामुस्ताब्जकेशरम् ॥७४॥
पक्वातिसारं योगोऽयं जयेत्पीतः सशोणितम् ।
कच्छुरा कौंच या घमासा) के मूल का करक, गूलर के फल के बराबर मात्रा में (कर्षमात्रा में) मधु के साथ चावल के घोवन से पीये। विदारी, लालचन्दन, भागीं, शर्करा, मोथा, कमलकेशर, इनको मधु एवं चावल के घोवन के साथ पीने से रक्त मिश्रित पित्तज पक्वातीसार नष्ट होता है।
वक्तुं न्यु—डल्हण ने इनका क्वाथ करने को कहा है। पयस्या-अर्कपुष्पी या दुग्धिका अर्थ, डल्हण ने दिया है ॥७४॥
निरामरूपं शूलात् तं लङ्घनाद्यैश्च कर्षितम् ॥७५॥
नरं रूक्षमवेदंयानि सक्षारं पाययेद् घृतम् ।
निराम के लक्षण होने पर शूल से पीड़ित, लंघन आदि से क्रुश एवं रूक्ष व्यक्ति में अग्नि की दोषि को देखकर यवक्षार मिश्रित घृत पिलाये ॥७५॥
बलाघृहृत्यं गुमतीकच्छुरामूलसाधितम् ॥७६॥
मधुक्षितं समधुक्ं पिवेच्छूलैरभितुतः ।
शूल से पीड़ित मनुष्य बला, पुरिन्पर्णी, बड़ी कटेरी, कौंच, (या घमासा) का मूल, इनके क्वाथ में मुलेहटी का करक और मधु मिलाकर पीये ॥७६॥
दार्वां विश्वकण्णाद्राक्षाकटुकेन्द्रयवैर्घृतम् ॥७७॥
साधितं हृत्यतीसारं वातपित्तकफात्मकम् ।
दध्ना चाम्लेन संपक्वं सत्योषाजाजिचित्रकम् ॥७८॥
सूचन्यपिप्पलीमूलं दाडिमैर्वा रुगदितः ।
दारुहल्दी, बिल्ब, पिप्पली, द्राक्षा, कुटकी, इन्द्रजी से सिद्ध किया घृत वात, कफ, पित्तजन्य अतीसार को नष्ट करता है। त्रिकुट, जीरा, चित्रक इनके करक से चव्य, पिप्पलीमूल और अनारदाना, इनके करक से दही और कांजी से सिद्ध किया घृत पीड़ा से पीड़ित मनुष्य पीये ॥७७,७८॥
पयो घृतं च मधु च पिवेच्छूलैरभितुतः ॥७९॥
सिताजमोदकद्वज्जमधुकैरवचूर्णितम् ।
शूल से पीड़ित मनुष्य शर्करा, अजवायन, श्योनाक, मुलेहटी इनका चूर्ण दूध घी और मधु इन तीनों में मिलाकर (ये तीनों समान भाग) पीये ॥७९॥
अवेदनं सुसंपक्वं दीप्ताग्नेः सुचिरोस्थितम् ॥८०॥
नानावर्णमतीसारं पुटपाकैरुपाचरेत् ।
जिसे वेदना न हो, अतीसार पक गया हो, अग्नि प्रदीप्त हो, अतीसार बहुत पुराना हो, मल में रंग अनेक प्रकार के हो, उसकी चिकत्सा पुटपाकों से करे ॥८०॥
त्वक्पिण्डं दीर्घवृंतस्य पद्माकेसरसंयुतम् ॥८१॥
काश्मरीपद्मापत्रैश्चावेष्ट्य सूत्रेण संहृदम् ।
मृदाऽवलिप्तं सुकृतमङ्गारेष्वक्कुलयेत् ॥८२॥
स्विन्नमुद्भूत्य निष्पीड्य रसमादाय तं ततः ।
शीतं मधुयुतं कृत्वा पाययेतोदरामये ॥८३॥
जीवन्तीमेषश्चङ्गादिष्वेवं द्रव्येषु साधयेत् ।
श्योनाक की छाल (या अरलू की छाल) और कमल का केसर दोनों को समान भाग लेकर पीसकर, इस पिण्ड को गम्भारी और कमल के पत्तों से लपेटकर सूत से मजबूती से बाँध देवे। इस पर मिट्टी का लेप करके भलीप्रकार अंगारों में पकाये। जब पक जाये तो निकालकर निचोड़कर रस निकाले। रस के ठण्डा होने पर मधु मिलाकर अतिसार में पिलाये। अरलू की भांति जीवन्ती, मेषश्चङ्गा आदि द्रव्यों से भी पुटपाक बनाये। (पुटपाक जब बाहर से लाल हो जाये तब निकाल ले) ॥८१-८३॥
तित्तिरिं लुध्वितं सम्यक् निष्कुष्ठान्त्रं तु पूरयेत् ॥८४॥
न्यम्रोधादित्वचां कल्केःपूर्ववचावकुलयेत् ।
रसमादाय तस्याथ सुस्विन्नस्य समाधिकम् ॥८५॥
शर्करोपहितं शीतं पाययेतोदरामये ।
तीतर के पर आदि नोचकर-भलीप्रकार साफ करके, इसकी आंत निकाल देवे। फिर बरगद आदि खीरी दूधों का करक इसके पेट में भरकर आग में पकाये। भली प्रकार पक जानेपर इसको पेट में भरकर आग में पकाये। भली प्रकार पक जानेपर इसको निचोड़कर रस निकाले। इसमें मधु और शर्करा मिलाकर ठण्डा होने पर अतिसार में पिलाये। (न्यम्रोध आदि शब्द से ढाक, नन्दीबुक्ष का ग्रहण करते हैं। यथा—संभाहि स्तम्भनाद मिञ् यथा तदभिदध्महे। आग्नेयगुणमृषिष्टं तोषां