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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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उत्तरतन्त्रम्

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परिशेषेत् ॥ संगृह्णाति मलं तस्याद् माहि शुष्काद्यो यथा । समीरगुणभूयिधं शीतत्वाद्यन्नभस्वतः ॥ विधाय वृद्धि स्तम्नाति स्तम्भनं तद्यथा वटः । यद् वातपित्तातिसारं वरतना चाहिये ॥

लोघ्नचन्दनयष्टयाहृदार्वीपाठासितोत्पलान् ॥८६॥ तण्डुलोदकसंपिष्टान् दीर्घवृन्तत्वगन्विताम् । पूर्ववत् कृलितात्समाद्रसमादाय गीतलम् ॥८७॥ मध्वाकृतं पाययेच्छैतत् कफपित्तोदरामये ।

लोघ्न, चन्दन, मुलेहटी, दाहहल्दी, पाठा, शर्करा, कमल, अरुलु की छाल इनकी चावल के धोवन के साथ पीसकर पुट- पाक विधि से अग्नि में स्विस करके निचोड़कर इसका रस निकाल ले । शीतल होने पर इसमें मधु मिलाकर कफ पित्ताति- सार में पिलाये ॥८६,८७॥

एवं प्ररोहैः कुर्वीत वटादीनां विधानवत् ॥८८॥ पुटपाकान् यथायोगं जाङ्गलोपहितान् शुभान् ।

इसी पुटपाक विधि से बरगद आदि के प्ररोहों ( शालों के अधोभाग से निकली जटायें ) से बटेर, कपिजल आदि जांगल मांस के साथ मिलाकर कल्पना बनाकर बरते ॥८८॥

बहुश्लेष्म सरक्तं च मन्दवातं चिरोस्थितम् ॥८९॥ कौटजं फाणितं वाडपि हन्यन्तीसारमोजसा ।

अम्बछादिमधुयुतं पिप्पल्यादिसमन्वितम् ॥९०॥

अतिशय कफवाले रक्त के साथ, मन्दवायु पुरातन अति- सार को कुटज की फाणित ( अवलेह ), अम्बछादि, पिप्पल्यादि- गण के साथ, मधु मिलाकर देने पर अपनी शक्ति से नष्ट कर देती है ।

वक्तव्य—कुटज की छाल लेकर घोलह गुने, आठ गुने या चार गुने जल में क्वाय करके आधा शेष रहने पर छान ले । इसमें अम्बछादि, पिप्पल्यादिगण का चूर्ण मिलाकर फिर पकाये । जब यह रसक्रिया बन जाये, तब उत्तारकर इसमें शीतल होने पर मधु मिलाये । दूसरे अम्बछादिगण का चूर्ण रसक्रिया में पीछे मिलाना चाहते हैं, वह ठीक भी है । चूर्ण का अग्नि में पाक करने से हीनवीर्य होने की सम्भावना रहती है ॥८६,९०॥

पुत्रिन्पर्णीबलाबिल्बवालकोत्पलधान्यकैः ।

सनागरेः पिबेत् पेयां साधितामुदरामयी ॥९१॥

अतिसाररोगी पुत्रिन्पर्णी, बला, बिल्ब, नेत्रवाला, कमल, धनियाँ, सोंठ, इनसे सिद्ध पेया पीये ॥९१॥

अरुलुवक् प्रियङ्कु च मधुकं दाडिमाङ्कुरान् ।

आवाप्य पिष्टा दधनि यवाग् साधयेद् द्रवाम् ॥९२॥

यथा सर्वान्तीसारान् हन्ति पकानसंशयम् ।

अरुलु की छाल, प्रियंगु, मुलेहटी, अनार के अंकुर (कोमल पत्ते) इनको पीसकर, दधि में घोलकर पतली यवाग् बनाये । यह यवाग् सब प्रकार के पक्व अतिसारों को अवश्य नष्ट करती है ॥९२॥

रसाञ्जनं सातिविपं त्वग्बीजं कौटजं तथा ॥९३॥

धातकी नागरं चैव पाययेत्तण्डुलाञ्चुना ।

सगृलं रक्तजं दन्ति एते मधुसमायुताः ॥९४॥

रसीत, अतीस, कुटज की छाल, इन्द्रजो, हरड, सोंठ- इनकी चावल के धोवन के साथ, मधु मिलाकर पिलाये । ये सब उपर्युक्त योग, शूल एवं रक्तयुक्त अतिसार को नष्ट करते हैं ॥९३,९४॥

मधुकं बिल्बपेशी च शर्करामधुसंयुता ।

अतीसारं निहन्त्युश्च शालिपट्टिकयोः कणाः ॥९५॥

तद्वल्लोढं मधुयुतं बदरीमूलमेव तु ।

मुलेहटी, बिल्ब की मजा, इनकी शर्करा और मधु के साथ, शालिचावल एवं सांठी की कणियाँ मधु के साथ, बेरी का मूल मधु के साथ चाटने से अतिसार को नष्ट करता है । (तीन योग हैं) ॥९५॥

बदर्यजुनजम्बाश्रशङ्कोवेतसस्वचः ॥९६॥

शर्कराश्वौद्रसंयुक्ताः पीता दन्त्युद्वरासयम् ।

बेर, अर्जुन, जामुन, आम, शल्लकी, वेतस (अम्लवेतस) इनकी छाल शर्करा, मधु के साथ, पीने से अतिसार को नष्ट करती है ॥९६॥

एतैरेव यवागंश्च षडान् यृषांश्च कारयेत् ॥९७॥

पानीयानि च तृष्णामु द्रव्येष्वेतेषु बुद्धिमान् ।

बुद्धिमान् वैद्य इन्हीं शोगों से यवाग्, षड ( खड ) और यृषों को बनाये । प्यास लगने पर इन्हीं द्रव्यों से सिद्ध जल पीने को देवे ॥९७॥

कृतं शालमलिबुत्तेषु कषायं हिमसंज्ञितम् ॥९८॥

निशापर्युषितं पेयं सञ्चोद्वै मधुकान्वितम् ॥

सिम्बल के कोपलों से शीत कषाय बनाये । एक रात रखने के पीछे नितारकर इसमें मधु और मुलेहटी मिलाकर पीये ।

वक्तव्य—कोपलों का चूर्ण लेकर चौबीस घण्टे पानी में भिगोया रहने दे । फिर मलकर छानकर इसमें से चार पल लेकर, इसमें मुलेहटी एक कर्ष और मधु मिलाकर पीये ॥९८॥

विबद्धवातविट् शूलपरीतः सप्रवाहिकः ॥९९॥

सरक्तपित्तश्च पयः पिबेत्तृष्णामसमन्वितः ।

यथाऽस्मृतं तथा क्षीरमतीसारेषु पुजितम् ॥१००॥

चिरोस्थितेषु तत् पेयमपां भागैस्त्रिभिः श्रुतम् ।

दोषशेषं हरेत्तद्वि तस्मात्पथ्यतमं स्मृतम् ॥१०१॥

हितः स्नेहबिरेको वा बस्तयः पिच्छिळाश्च ये ।

पिच्छिळस्वरसे सिद्धं हितं च घृतमुच्यते ॥१०२॥

जिस रोगी को मल और वायु का अवरोध हो, शूल हो, प्रवाहिका हो, रक्तपित्त ( रक्तस्त्राव ) हो, प्यास हो, वह रोगी