सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 760, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें७०४
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४० ]
दूध पीये। अतीसार में दूध अमृत के समान श्रेष्ठ है। पुरातन अतिसारों में दूध को तीन गुने जल से सिद्ध करके दूध मात्र शोध रह जाने पर पीये। क्योंकि इस प्रकार दूध बचे हुए दोष को नष्ट करता है, इसलिये यह उत्तम पथ्य है। स्नेह विरेचन, और पिच्छल वस्तियाँ हितकारी हैं। सिम्बल आदि पिच्छल द्रव्यों के स्वरस में सिद्ध घृत हितकारी कहा जाता है।
वि० मन्तव्य—श्लो० ६८ वें में जो शालमलिबुन्त का हिम बतलाया गया है, और जो पिच्छल वस्तियों तथा पिच्छल द्रव्यों के संयोग से सिद्ध घृत का विधान किया गया है, इनका प्रतिनिधि आज का “ईसबगोल” है। ईसबगोल की १-२ तो० की मात्रा-शर्करोदक अथवा दही के साथ दी जाती है। प्रवाहिका को “पेचिश” या मरोड़ा कहते हैं (देखिये श्लो० १३८)॥
शकृता यस्तु संसृष्टमत्सियायैत शोणितम् ।
प्राक् पश्चाद्वा पुरीषस्य सरकू सपरिकर्तिकः ॥१०३॥
क्षीरिगुष्कश्चतं सर्पिः पिवेत सख्योद्गर्कर्म ।
जिस रोगी को मल के साथ मिला हुआ रक्त मल त्याग के पहिले या पीछे आता है, जिसे दर्द एवं परिकर्त्तिका (वस्ति, गुदा, मेहन में काटने के समान दर्द) रहती हो, वह बरगद आदि क्षीरि बूछों के शूद्रों (नूतन पत्रों के कोपल) से सिद्ध घृत को मधु और शर्करा के साथ पीये।
वि० मन्तव्य—सपरिकर्त्तिकाः—परिकर्त्तिका—इस विकृति में अन्त्रों के भीतरी भाग पर कर्त्तन अर्थात् खरोश हो जाता है, मल का दवाव पड़ने पर अथवा अन्त्र में एंठन होने पर इसी में रक्त निकलकर पुरीष के आगे या पीछे या साथ में आता है। पिच्छल पदार्थों का लेस लगने से परिकर्त्तिका का रोपण हो जाता है, और पुरीष भी विस्फककर सरलता से निकल जाता है। परिकर्त्तिका में कतीरा भी जल अथवा दूध अथवा दही में भिगोकर फूल जाने पर खाया जाता है, वह भी पिच्छल होने से लाभ करता है। श्लो० १११ वें भी देखिये ॥१०३॥
दार्वात्विक्पिप्पलीशुण्टीलाक्ष्माशक्रयवैघृतम् ॥१०४॥
संयुक्तं भद्ररोहिण्या पक्वं पेयादिमिश्रितम् ।
दाश्रहर्दी की छाल, पिप्पली, सोंठ, लाख, इन्द्रजो, कुटकी इनसे सिद्ध किया घृत पेया आदि में मिलाकर पिलाये। यह घृत त्रिदोषजन्य भयानक अतिसार को भी नष्ट कर देता है ॥
त्रिदोषमप्यतीसारं पीतं हन्ति सुदारुणम् ॥१०५॥
गौरवे वमनं पथ्यं यस्य स्यात् प्रबलः कफः ।
शरीर में भारीपन, कफ की प्रबलता, ज्वर, दाह, वायु से मलबन्ध होने पर अधोगामि रक्त की भाँति रोगी को वमन करना उत्तम है।
वक्तव्य—द्रव कफ के नष्ट होने से विपरीत मार्ग चिकित्सा के प्रभाव से भला होता है, जिस प्रकार अधोगामि रक्त पित्त में वमन चिकित्सा लाभ करती है ॥१०५॥
ज्वरे दाहे सविखबन्धे मार्गताद्रक्तपित्तवत् ॥१०६॥
संपक्वे बहुदोषे च विवन्धे मूत्रशोधनैः ।
कार्यमास्थापनं क्षिप्रं तथा चैवानुवासनम् ॥१०७॥
अतिसार के पक जाने पर, शरीर में दोष की अधिकता होने पर, अधोवात आदि की अप्रवृत्ति में तृण पञ्चमूल, पाषाण भेद आदि मूत्र शोधन द्रव्यों से आस्थापन और अनुवासन तुरन्त देवे ॥१०६, १०७॥
प्रवाहणे गुदभ्रंशे मूत्राधाते कटिग्रहे ।
मधुरारुलैः श्रुतं तैलं सर्पिर्वाऽप्यनुवासनम् ॥१०८॥
प्रवाहन में, गुदभ्रंश में, मूत्राधात में, कटिग्रह में, काकोल्यादि मधुर एवं वीजपूरक, कपित्थ आदि अम्लद्रव्यों से सिद्ध तैल या घृत का अनुवासन देवे ॥१०८॥
गुदपाकस्तु पित्तेन यस्य स्याद्विहातिशिनः ।
तस्य पित्तहराः सेकास्तसिद्धाश्चानुवासनाः ॥१०९॥
अहित सेवन करनेवाले जिस रोगी की गुदा का पाक पित्त के कारण हो जाये, उसमें पित्तहर द्रव्यों (दूध, इक्षुख, शर्करोदक, मधुरोषध कृत कषाय) से सेक एवं इनसे सिद्ध अनुवासन देवे ॥१०९॥
दधिमण्डसुराबिल्वसिद्धं तैलं समास्ते ।
भोजने च हितं क्षीरं कच्छुरामूलसाधितम् ॥११०॥
वातज अतिसार में दधि, मण्ड, सुरा और बिल्व से सिद्ध तैल अनुवासन में देवे। भोजन में कौंच या धमासा मूल से सिद्ध दूध देवे। (कच्छुरा-दुरालभा या शूकशिम्भी दधिमण्डल-दधिमस्तु) ॥११०॥
अल्पाल्पं बहुशो रक्तं सरुग्य उपवेश्यते ।
यदा वायुर्विषद्वक्ष्म पिच्छावस्तिस्तदा-हितः ॥१११॥
जो रोगी थोड़ा-थोड़ा रक्त एवं वेदना के साथ बार-बार मल त्याग करता हो, वायु का अवरोध हो, तब इसे पिच्छावस्ति (पिच्छल द्रव्यों से बनाई वि० अ० ३८ में कही) देवे ॥१११॥
प्रायेण गुददौर्बल्यं दीर्घकालातिशरिणाम् ।
भवेत्तस्माद्वितं तेषां गुदे तैलावचारणम् ॥११२॥
प्रायः करके चिरकालीन अतीसार रोगियों की गुदा निर्बल पड़ जाती है, इसलिये इनकी गुद में पित्रु, सेक, अनुवासन रूप में तैल बरतना चाहिये। (दाह युक्त गुददौर्बल्य में घृत बरते)।
वि० मन्तव्य—गुददौर्बल्य-गुदवलयों की दुर्बलता, इसी कारण से गुदवलयों संवरण आदि कार्य उचित रूप से नहीं कर पातीं ॥११२॥