सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 761, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 761

अ० ४० ] ८६

उत्तरतन्त्रम्

७०५

कपित्थशालमल्लोफञ्जीवटकार्पासदाडिमाः। युथिका कच्छुरा शेलुः शणरुचुच्छूक्ष् दधिक्ताः ॥११३॥ कैथ, सिम्बल, फंजी (पाठा भेद), बरगद, कपास के पत्ते, अनार, जूही, धमासा, लसड़ा, सन और चुन्चु इनको दही से संस्कृत करके देवे ॥११३॥

शालपर्णी पुश्चिनपर्णी बृहती कण्टकारिका। बलाश्वदंष्ट्राबिल्वानि पाठानागरधान्यकम् ॥११४॥ एष आहारसंयोगे हितः सर्वातिसारिणाम्।

शालपर्णी, पुश्चिनपर्णी, कटेरी छोटी, बड़ी कटेरी, बला, गोलक, बिल्ब, पाठा, सोंठ, धनियाँ इन द्रव्यों को अतिसार रोगियों के आहार के सिद्ध करने में बरते।

वक्तव्य—'भक्त पञ्चगुणे तोये यवागं षड्गुणे पचेत्। चतु- दंशगुणे पेयां विलेपी च चतुर्गुणे ॥' शालपर्ण्यादि द्रव्य चार पल लेकर एक आदक जल में सिद्ध करके आधा शेष रहने पर हस क्वाथ से पेया आदि बनाये ॥११४॥

तिलकल्क की हितश्चात्र मौदुगो मुद्गगरसस्तथा ॥११५॥ तिलकल्क, मूंग का कल्क, मूंग का यूप (ओसावण) इसमें हितकारी है ॥११५॥

पित्तातिसारी यो मत्स्यः पित्तलान्यतिसेवते। पित्तं प्रदुष्टं तस्याशु रक्तातीसारमावहेत् ॥११६॥ ज्वरं शूलं तृषां दाहं गुदपाकं च दारुणम्।

जो पित्तातिसार रोगी पित्तकारक वस्तुओं का अतिसेवन करता है, उसका प्रदुषित हुआ पित्त रक्तातिसार को उत्पन्न कर देता है। इसके साथ ज्वर, शूल, दाह, और भयानक गुद- पाक होता है ॥११६॥

यो रक्तं शकृतः पूर्व पश्चाद्वा प्रतिसार्यते ॥११७॥ स पल्लवैर्बटादीनां ससर्पिः साधितं प्रयः। पिवेत् सर्कारक्षौद्रमथवाडप्यभिमध्य तत् ॥११८॥ नवनीतमथो लिह्यात्तक्तं चानुपिवेत्ततः।

जिस रोगी को मल के पूर्व या पीछे रक्त आता हो, वह बरगद आदि धीर वृक्षों के कोमल पत्तों से साधित दूध को घी, शर्करा मधु के साथ पीये। अथवा बरगद आदि के पत्तों को दूध में मथकर इससे दही जमाये, फिर इसको मथकर मक्खन निकालकर मधु और शर्करा के साथ चादे, पीछे यह तक पीये ॥११७, ११८॥

प्रियालशालमलीपल्लवगल्लकीतिनिशत्त्वचः ॥११९॥ क्षीरे विमृदिताः पीताः सखौद्रा रक्तनाशनाः। प्रियाल, सिम्बल, पिल्लवन, शल्लकी, सांदन इनको छाल को दूध में मसलकर मधु मिलाकर पीये, यह रक्तनाशक है। मधुकं शर्करा लोहं पयस्यामथ सारिबाम् ॥१२०॥ पिवेच्छागेन पयसा सखौद्रं रक्तनाशनम्।

मुलेहटी, शर्करा, लोघ, विदारी, सारिवा, इनको बकरी के दूध में मथकर मधु के साथ पीये, यह रक्तनाशक है ॥१२०॥ मडिजघ्रां सारिवां लोहं पद्मकं कुमुदोत्पलम् ॥१२१॥ पिवेत् पद्मां च दुग्धेन छागेनासूकप्रशान्तये।

रक्त की शान्ति के लिये—मंजीठ, सारिवा, लोघ, पद्माल, कुमुद, नीलोफर, और भांगी इनको बकरी के दूध से पीये। (इनका कल्क करके दूध के साथ पीये) ॥१२१॥

शर्करोत्पललोघाणि समझा मधुकं तिलाः ॥१२२॥ तिलाः कृष्णाः सयष्ट्याह्नाः समझा चोत्पलानि च। तिला मोचरसो लोहं तथैव मधुकोत्पलम् ॥१२३॥

कच्छुरा तिलकल्कश्च योगाश्चत्वार एव च। आजेन पयसा पेयाः सरक्ते मधुसंयुताः ॥१२४॥ चार योग—(१) शर्करा, कमल, लोघ, मंजीठ, मुलेहटी,

तिल, (२) काले तिल, मुलेहटी, मंजीठ और नीलोफर, (३) तिल, मोचरस, लोघ, मुलेहटी, नीलोफर, (४) धमासा, तिल, कल्क ये चार योग मधु के साथ मिलाकर बकरी के दूध से रक्तातिसार में पीने चाहिये ॥१२२-१२४॥

द्रवे सरक्ते स्रवति बालबिल्बं सफाणितम्। सखौद्रतैलं प्रागेव लिह्यादाशु हितं हि तत् ॥१२५॥

रक्त के साथ द्रव रूप (पतला-पानी जैसा) मल आने पर कच्चे बिल्ब को राव मधु और तेल के साथ भोजन से पूर्व चादे, यह शीघ्र ही लाभ करता है।

वि० मन्तव्य—इसका प्रतिनिधि बेल का सुरन्बा है ॥१२५॥

कोशकारं घृते भृष्टं लाजचूर्णं सिता मधु। सशूलं रक्तपित्तोत्थं लोहं हन्तुद्वरामयम् ॥१२६॥

कोशकार को टुकड़े करके घी में भूनकर पीसकर, लाजा, चूर्ण शर्करा मधु में मिलाकर चाटने से शूलयुक्त-पित्तजन्य अतिसार नष्ट होता है।

वक्तव्य—कोशकार—इन्धुभेद इति इल्लुणः। कोशकारी नाम—कोशयवच्छोपादानभूततत्त्वपादकः कीटविशेषः इति। चरक में भी इसी रेशम के कीड़े के लिये कोशकार शब्द आया है। यथा—कोषकारी यथा ह्याशुनुपादत्ते वषप्रदान्। उपादत्ते तथाऽर्थभ्यः तृणामशः सदाऽऽतुरः॥

वि० मन्तव्य—आवरेशम—कोशकार रेशम के कृमि का नाम है। यह कृमि अपनी लाला (मुख के रस) से अपने ऊपर आवरण बना लेता है और उसी आवरण पर रेशम के तन्तु बन जाते हैं। इस आवरण के भीतर ही भीतर कृमि मर जाता है और इस आवरण को सुखा लिया जाता है यही "आवरेशम" कहलाता है। इस आवरण को घृत में भूनकर अथवा जल में उबालकर रस-क्वाथ रोगी को पिलाया जाता है। अरबी एवं फारसी भाषा में इसका नाम आवरेशम है। स्वाद—फीका, वर्ण पीतामश रवेत, गुण-बलवर्द्धक, स्मरण शक्ति वर्द्धक, नेत्ररोग