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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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ज्वर और अतिसार में दोषों का संयोग या सन्निपात होने पर प्रथम पित्त की चिकित्सा करे। और अन्य सब रोगों में सबसे प्रथम वायु को शान्त करे।

वक्तव्य—ज्वर और अतिसार में पित्त की प्रधानता है, अन्य सब रोगों में वायु सब रोगों का नेता है। नेता के नष्ट होने पर दूसरे दोष शीघ्र शान्त हो जाते हैं ॥

वातस्यानुजयेत् पित्तं पित्तस्यानुजयेत्कफम् ।

त्रयायां वा जयेत् पूर्वं यो भवेद् बलवत्तमः ॥८०॥१६१॥

यस्योच्चारं बिना मूर्त्रं सम्यग्वायुश्च गच्छति ।

दीप्तान्नेर्लघुकोष्ठस्य स्थितस्तस्योदरामयः ॥१६२॥

जिस रोगी को मूर्त्र बिना मल त्याग के प्रवाहित हो जाता है, अपानवायु भली प्रकार प्रबुद्ध होती है, अग्नि प्रदीप्त हो, उदर में हल्का पन हो, उसका अतिसार शान्त हुआ समझे ॥

कर्मजा व्याधयः केचिदोषजाः सन्ति चापरे ।

कर्मदोषोद्भवान्नायने

व्याधियां तीन प्रकार की हैं, यथा—कर्मजन्म, दोषजन्म और उभयजन्म (कर्मदोष) ।

वक्तव्य—शास्त्रोंक सद्बुद्ध, आहार विहार करने पर भी श्रुतुजन्म रोग होते हैं, वे कर्मजन्म हैं। इसी से चरक में कहा है—“तत्कालयुक्तं यदि नास्ति दैवम् (२) न हि कर्म महत् किंचित्, फलं यस्य न भुज्यते। क्रियाप्नाः कर्मजा रोगाः प्रथमं यान्ति तत्क्षयात् ॥ निर्दिष्टं दैवशब्देन कर्म यत् पौर्वदैहिकम् । हेतुस्तदपि कालेन रोगाणामुपलभ्यते ॥ कालस्य परिणामेन जरामृत्युनिमित्ताजाः । रोगाः स्वाभाविका दृष्टाः स्वभावो निष्प्रतिक्रियः ॥” चरक ।

कर्मजास्तेष्वहेतुजाः ॥१६३॥

नश्यन्ति त्वक्रियाभिरस्ते क्रियाभिः कर्मसंक्षये ।

इनमें बिना कारण के, तथा बिना चिकित्सा के जप-तप प्रायश्चित् आदि चिकित्सा से कर्मों का क्षय होनेपर जो व्याधियां नष्ट होती हैं, वे कर्मजन्म हैं ॥१६३॥

गाम्यन्ति दोषसंभूता दोषसंक्षयहेतुभिः ॥१६४॥

जो दोष संक्षय हेतुओं से शान्त होते हैं, वे दोषजन्म रोग हैं ॥१६४॥

तेषामल्पनिदाना ये प्रतिकृष्टा भवन्ति च ।

मुद्वो बहुदोषा वा कर्मदोषोद्भवास्तु ते ॥१६५॥

जो रोग दोष थोड़े से ही कारण से अति कष्टदायक हो जाते हैं, अथवा बहुत दोषवाले मुद्व रूप में रहते हैं, वे कर्म एवं दोष उभय जन्म होते हैं ।

वि० मन्तव्य—कर्मजा...विधीयते-विधिमेद से व्याधियां तीन प्रकार की होती हैं, १—कर्मजन्म-मिथ्या आहार विहार

के बिना ही और काल परिणाम के बिना ही अथवा अन्य भयशोक आदि हेतु के बिना ही उत्पन्न हो जाती हैं और चिकित्सा न करने पर भी अथवा केवल प्रायश्चित्, जप, होम एवं बलि मङ्गल आदि उपचार करने पर, कर्म का फल भोग लेने पर शान्ति होती है । २—दोषजन्म-ये दोषानुसार मिथ्या आहार-विहार, कालपरिणाम अथवा भयशोक आदि कारणों से उत्पन्न होती हैं, और दोषानुसार चिकित्सा करने पर अथवा दोष का क्षय हो जाने पर शान्त हो जाती हैं ॥१६५॥

कर्मदोषक्षयकृता तेषां सिद्धिविधीयते ।

इस प्रकार के (कर्मदोषोद्भव) रोगों की चिकित्सा यज्ञदान-तप आदि से कर्म का क्षय करके, तथा स्नेहन स्वेदन आदि से दोष का नाश करके की जाती है ॥

दुष्यति ग्रहणी जन्तोर्गन्तसादनहेतुभिः ॥१६६॥

अतिसारे निवृत्तेऽपि मन्दाग्नेरहिताग्निः ।

भूयः संदूषितो बहिर्ग्रहणीमभिदूषयेत् ॥१६७॥

तस्मात्कायः परीहारस्वतीसारं विरिक्तवत् ।

यावन्न प्रकृतिस्थः स्यादोषतः प्राणतत्तथा ॥१६८॥

अग्नि को मन्द करनेवाले कारणों से ग्रहणी दूषित हो जाती है, और अतिसार के शान्त हो जाने पर भी-मन्दाग्नि पुरुष के अहित सेवन करने से अग्नि पुनः दूषित होकर ग्रहणी रोग को उत्पन्न करती है । इसलिये अतीसार में विरेचन दिये हुए की भाँति परहेजी पालनी चाहिये । जब तक मनुष्य (या अग्नि) दोष एवं प्राण (बल) से स्वाभाविक रूप में न आजाये, तब तक परहेजी पाले ॥१६९-१६८॥

षष्ठो पित्तधरा नाम या कला परिकीर्तिता ।

पक्कामाशयसम्यश्चा ग्रहणी सा प्रकीर्तिता ॥१६९॥

पित्तधरा नामक जो छठी कला कही है, वह पक्वाशय और आमाशय के मध्य में स्थित है, इस कला को ग्रहणी कहते हैं ।

वक्तव्य—‘ग्रहणात् ग्रहणी मता’ ग्रहण करने से ग्रहणी कहलाती है, आमाशय से निकले अपक्व आहार को यह ग्रहण करती है । यहाँ पर यकृत के पित्ताशय का पित्त, क्लोमका रस मिलते हैं । ये सब अग्निगुण होने से इस स्थान को अग्नि स्थान कहते हैं । इन रसों के मन्द होने से अग्नि भी कम हो जाती है, जिससे भली प्रकार पाक नहीं होता, इससे कहा है....

अग्न्यभिघ्नान्मन्मन्स्य ग्रहणात् ग्रहणी मता ।

नामेवपरि हि अग्निबलेनपष्टवोपबृंहितः ॥

अपक्वं धारयत्यन्मं पक्वं सृजति पार्श्वतः ।

दुर्बलान्नि बला दुष्टा त्वाममेव विमुञ्चति ॥८०॥ १६९॥

ग्रहणया बलमग्निर्हि स चापि ग्रहणी श्रितः ।

तस्मात् संदूषिते बह्वी ग्रहणी संप्रदुष्यति ॥१७०॥