सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ अ० ४१ ]
क्योंकि अग्नि के स्थान-ग्रहणी का बल अग्नि ही है, और यह अग्नि भी ग्रहणी के ही आश्रित है। इसलिये अग्नि के दूषित हो जाने पर ग्रहणी भी दूषित हो जाती है ॥१७०॥
एकशः सर्वशश्वैव दोषैरत्यर्थमुच्छ्रितैः।
सा दुष्टा बहुशो मुक्तमाममेव विमुञ्चति ॥१७१॥
पक्षं वा सहजं पूति मुहुर्वदं मुहुर्वम ।
ग्रहणीरोगमाहुस्तमायुर्वेदविदो जनाः ॥१७२॥
वातादि पृथक् दोषों से सन्निपात रूप में मिलित दोषों से दूषित हुई यह ग्रहणी बहुत बार अपक्षव आहार को ही आगे गुजार देती है। यह अन्न कभी पका, कभी कच्चा वेदना के साथ, दुर्गन्धयुक्त, कभी वेधा हुआ, कभी द्रवरूप में प्रवाहित (मल रूप से) होता है। आयुर्वेद को जाननेवाले इस रोग को ग्रहणी रोग कहते हैं ॥१७१,१७२॥
तस्योत्पत्ती विदाहोऽन्ने सदनालस्यतृट्कलमाः।
बल्लस्योऽर्चाः कासः कर्णद्वेडोऽन्त्रकूजन्म ॥१७३॥
पूर्वरूप—इस ग्रहणी रोग के उत्पन्न होने के पूर्व, अन्न में विदाह (भली प्रकार न पकना), शिथिलता, आलस्य, प्यास, यकान, बल का हास, अर्श, कास, कानों में शब्द, आंतों में गड़गड़ाहट होती है ॥१७३॥
अथ जाते भवेज्जनतुः शूनपादकरः कृशः।
पर्वरुग्लोल्यतृट्छिद्विज्वराशोचकदाहवान् ॥१७४॥
वदुगिरिच्छुक्तित्काम्ललोहधूमामगन्धिकम्।
प्रसेकमुखवैरस्यतमकारुचिपीडितः ॥१७५॥
लक्षण—ग्रहणीरोग हो जाने पर रोगी के हाथ-पैर सूज जाते हैं, रोगी कृश, पवों में दर्द, सब रसों में लोलुपता, प्यास, वमन, ज्वर, अरोचक, दाह रहता है। शुक्त (खड़ा), तित्त (कड़ुआ), अम्लगन्धि, लोहगन्धि, धूमगन्धि, आमगन्धि (सड़ी गन्ध) उद्गार होता है और मुख से पानी गिरता है, लाला-खाव, मुख में विरसता, मोह, अर्श रहती है ॥१७३-१७५॥
वानान्छलाधिकैः पायुहृत्पाश्चर्वोद्वरमस्तकैः।
पितात् सदाहैर्गुरुभिः कफास्त्रिभ्यञ्चिल्लक्षणः ॥१७६॥
वातजन्य ग्रहणी में—गुद, हृदय, पाश्चर्व, उदर और शिर में अधिक शूल रहता है। पित्त से दाह की अधिकता, कफ से भारीपन, सन्निपात से तीनों दोषों के लक्षण रहते हैं ॥१७६॥
दोषवर्णैर्नखैस्तद्विप्रमूत्रनयनान्तैः।
हृत्पाण्डुरगुल्माशैः प्लीहागङ्गो च मानवः ॥१७७॥
वातादि दोषों के वर्णवाले नख, मल-मूत्र, आँख, और मुख को देखकर ग्रहणी रोग जानना चाहिये। रोगी को हृदय-रोग, पाण्डुरोग, उदररोग, गुल्मरोग, अर्शरोग, प्लीहारोग, का प्रम बना रहता है।
वक्तव्य—वायु के कारण कृष्ण अरुणवर्ण, पित्त से हरा-पीला वर्ण, कफ से श्वेत वर्ण होता है ॥१७७॥
यथादोषोच्छ्रयं तस्य विशुद्धस्य यथाक्रमम्।
पेयादिं वितरेत् सम्यग्दीपनीयोपसंभूतम् ॥१७८॥
ततः पाचनसंप्राहिदीपनीयगणत्रयम्।
पिवेत् प्रातः सुरारिष्ठस्येहमूत्रमुखास्त्रुभिः ॥१७९॥
तक्केण वाऽथ तर्कं वा केवलं हितमुच्यते।
कृमिगुल्मोदरागोर्धनीः क्रियाश्चात्रावचारयेत् ॥१८०॥
चूर्णं हिङ्गवादिकं चात्र घृतं वा प्लीहानाशनम्।
दोष की अधिकता के अनुसार दोषों को अपने-अपने शुद्ध क्रम से शोधन करके (वात की अधिकता में निरुद्ध, पित्त की अधिकता में विरेचन, कफ की अधिकता में वमन)-दीपनीय द्रव्यों (पंचकोल आदि अग्निदीपक) से मिश्रित पेया, विलेपी आदि देवे। फिर पाचन द्रव्य गण (हरिद्रादि), दीपनी-यगण (पिप्पल्यादि), संप्राहीगण (अम्लघादि) को प्रतिदिन प्रातःकाल सुरा, अरिष्ट, स्नेह (घृत), मूत्र या गरम पानी से पीये। अथवा इनको तर्क के साथ पीये, या अकेला तर्क ही पीना उत्तम है। कृमिरोग, गुल्मरोग, उदररोग, अर्शरोग नाशक चिकित्सा यहाँ करे। हिङ्गवादि चूर्ण, एवं प्लीहा नाशक घृत (घट्टल घृत) ग्रहणी रोग में वरते।
वक्तव्य—स्वस्थाने मासतोऽवश्यं वर्षते कफसंक्षये।
स वृद्धः सहसा हन्यात्तस्मात् स्वरया जयेत् ॥
वातस्यानुजयेत् पित्तं पित्तस्यानुजयेत् कफम्।
त्रयाणां वा जयेत् पूर्वं यो भवेद् बलवत्तमः ॥१८१-१८२॥
कलकेन मगधादेश्च चाङ्गैरीस्वरसेन च ॥१८३॥
चतुर्गुणेन दध्ना च घृतं सिद्धं हितं भवेत्।
पिप्पल्यादि गण के कलक से, चांगेरी के स्वरस में, घृत से चार गुणे दही के साथ सिद्ध किया घृत हितकारी है ॥१८३॥
सर्वथा दीपनं सर्वं ग्रहणीरोगिणां हितम्।
अग्निदीपक चिकित्सा ग्रहणी रोग में सब प्रकार से हितकारी है ॥
व्वरादीनविरोधाच्च साधयेत् स्वैच्छिकस्तिवैः ॥१८४॥
ज्वर आदि रोगों को उनकी अपनी-अपनी चिकित्सा से-ग्रहणी रोग के अविरोधि चिकित्सा से शान्त करे ॥१८४॥
इति श्रीमुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सा-
तन्त्रोऽतिसारप्रतिषेधो नाम (द्वितीयोऽध्यायः,
आदितः) चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४०॥
एकचत्वारिंशतमोऽध्यायः
अथातः शोषप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥