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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 767

४१]

उत्तरतन्त्रम्

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अब इसके आगे शोष प्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे, जैसा—भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

अनेकरोगानुगतो बहुरोगपुरोगमः ।

दुर्विज्ञेयो दुर्निवारः शोषो न्याधिर्महाबलः ॥३॥

बहुत से रोगों (उपद्रवों) का आश्रय, श्वास, कास आदि बहुत से रोगों के आगे चलनेवाला (पूर्व रूप में होनेवाला) त्रिदोष लक्षणों के कारण कठिनाई से जानने योग्य, परस्पर विरोधि चिकित्सा के कारण कष्टसाध्य, अतिबलवान् रोग-शोष है ॥३॥

संशोषणाद्वासादीनां शोष इत्यभिधीयते ।

क्रियाक्षयकर्त्वाच्च क्षय इत्युच्यते पुनः ॥४॥

राज्ञश्चन्द्रमसो यस्माद्भूदेष किलात्मयः ।

तस्माच्च राजयक्ष्मेति केचिदाहुः पुनर्जनाः ॥५॥

रस आदि धातुओं का शोषण करने से शोष कहा जाता है। क्रियाओं का क्षय करने से क्षय कहा जाता है। राजा चन्द्रमा को यह रोग हुआ था, इसलिये कुछ लोग इसको राज-यक्ष्मा कहते हैं।

वक्तव्य—यह आख्यायिका है कि प्रजापति ने अपनी अष्टाईस कन्याओं का (अश्विनी आदि नक्षत्रों का) विवाह चन्द्रमा से कर दिया। चन्द्रमा ने अश्विनी आदि दूसरी कन्याओं की अपेक्षा रोहिणी पर अधिक आसक्ति दिखाई। इस बात की शिकायत उन्होंने अपने पिता प्रजापति से की। प्रजापति ने चन्द्रमा को सबके साथ समान बर्ताव करने के लिये कहा। परन्तु फिर भी प्रजापति के वचनों का तिरस्कार करके वह रोहिणी में ही आसक्त रहा। इससे प्रजापति के क्रोध से यक्ष्मा रूपी विष निकलकर चन्द्रमा में प्रविष्ट हुआ, जिससे चन्द्रमा प्रभा एवं उत्साह हीन हो गया। प्रजापति के दोष के कारण यह शाप हुआ है, यह जानकर चन्द्रमा प्रजापति की सेवा में गया। चन्द्रमा की शुद्ध बुद्धि जानकर अधिनी द्वारा प्रजापति ने उनकी चिकित्सा करवा दी।

अष्टाईस कन्यायै—अश्विनी आदि नक्षत्र हैं, चन्द्रमा का इनके साथ सम्बन्ध है। रोहिणी नक्षत्र पर चन्द्रमा अधिक देर रहता है। इस कथानक का अभिप्राय है कि अधिक आसक्ति पूर्वक स्त्री सेवन से यह रोग मुख्यतः होता है।

वि० मन्तव्य—इस रोग में रस रक्त आदि का धीरे-धीरे शोषण होने लगता है, अतः शोष कहलाता है। शारीरिक, मानसिक एवं वैदिक क्रियाओं का क्षय हो जाता है, अतः क्षय कहलाता है। देखा जाता है कि रस रोग में स्वस्वस्थान-स्थित धातु सूख जाते हैं, शरीर कृश होते होते अत्यन्त कृश

हो जाता है। रस धातु सौम्य है, यथा—स खलु द्रवानुसारी स्नेहन-जीवन-तर्पण-धारणाऽऽदिभिः विशेषैः सौम्य इत्यवगम्यते (सू० सू० अ० १४।३) और यह सौम्य-सोमात्मक रस धातु का रोग है ॥४,५॥

स न्यस्तैर्जायते दोषैरिति केचिद्ब्रुवन्ति हि । यह क्षयरोग वातादि दोषों से पृथग्रूप में भी होता है, ऐसा कई कहते हैं (वास्तव में यह रोग त्रिदोषजन्य है) परन्तु—एकाद्रशानामेकस्मिन् सान्निध्यात्तन्त्रयुक्तिः ॥६॥ क्रियाणामविभागेन प्रागेकोत्पादनेन च । एक एक मतः शोषः सन्निपातात्मको ह्यतः ॥७॥

शोष रोग एक ही (सन्निपातात्मक ही) है, क्योंकि—राज-यक्ष्मा रोगी में ग्यारह लक्षण विद्यमान रहते हैं, शास्त्र को युक्ति से चिकित्सा क्रम का विभाग पृथक्त्व न होने से, प्रथम प्रजापति के क्रोध से एकही रूप में उत्पन्न होने के कारण शोष एक ही प्रकार का सन्निपातजन्य माना है, भले ही—

उद्वाकात्तत्र लिङ्गानि दोषाणां निपतन्ति हि । इस शोष में दोषों की अधिकता से—दोषों के लक्षण प्रजट होते हैं, परन्तु शोष एक ही है ॥६,७॥

क्षयाद्भ्रमप्रतीघाताघाताद्विषमाशनात् ॥८॥ जायते कुपितैर्दोषैर्न्याप्तदेहस्य देहिनः । कुपित हुए दोष जब रोगी के शरीर में व्याप्त हुए होते हैं, तब क्षय से, वेगों के अवरोध से, आघात से, (मानसिक-शोक आदि से) और विषमाशन से क्षय रोग उत्पन्न होता है ॥८॥ कफप्रधानैर्दोषैर्हि रुद्धेषु रसवर्त्मसु ॥९॥

उत्कट कफवाले दोष से रसवह मार्गों के बन्द हो जाने से क्षयरोग उत्पन्न होता है।

क्षोतसां संनिरोधाच्च रक्तादीनां च संख्याद् । धातुभ्रमणां चापचयाद् राजयक्ष्मा प्रवर्त्तते ॥ चरक ॥ अतिव्यवधानिरो वाऽपि श्रोणे रेतस्थनन्तरम् । क्षीयन्ते धातवः सर्वे ततः शुष्यति मानवः ॥१०॥ अति मैथुन करनेवाले पुरुष में वीर्य के शोष होने के पीछे सब धातु शोष हो जाते हैं, तब मनुष्य सूख जाता है।

वक्तव्य—यह प्रतिलोमक्षय है, जिस प्रकार बड़े भारी जलाशय के क्षीण होते समय इसमें प्रविष्ट जल-जन्तु भी नष्ट हो जाते हैं, इसी प्रकार वीर्य के क्षीण होने पर दूसरे धातु भी क्षीण हो जाते हैं। वीर्य-बल शक्ति है, उसके घटने से रसादि भी घट जाते हैं।

वि० मन्तव्य—शोष रोग दो प्रकार से प्रवृत्त होता है। १—कफ प्रधान दोषों द्वारा रसवाही क्षोतसों के अवरोध होने पर। इसका नाम अनुलोम क्षय है, इसमें रसवाही क्षोतों के अवरोध के कारण अन्य धातुओं का उचित रूप से शोषण