सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३८ ]
नहीं होता, क्योंकि अन्नपान का रस ही सब धातुओं का प्रीणन करता है (सु० सू० अ० १४-११)। २—अतिमैथुन से, जब शुक्र धातु का क्षय हो जाता है तब मज्जा अस्थि आदि धातुओं का भी क्षय होने लगता है और धातुओं का क्षय होने से शरीर सूखने लगता है, फलतः शारीरिक मानसिक एवं वाचिक क्रियाओं का क्षय हो जाता है। इसे प्रति-लोक कहते हैं। अनुलोक को शोष और प्रतिलोक को क्षय कहा जाय जो स्यात् कोई अनौचित्य नहीं है। चरक के शब्दों में—रसवाही क्षोतों के रक्त जाने से फलतः रक्त आदि धातुओं का क्षय होने से तथा धातुगत अग्नियों के मन्द हो जाने से राज-यक्ष्मा की प्रवृत्ति (प्रारम्भ) होती है। इस समय (इन दिनों) में उदर में आगत जिस आहार को अग्नि पकाता है वह प्रायः पुरीष ही बन जाता है, उसका बहुत थोड़ा अंश ओजस् अर्थात् रस बनता है और वह रस भी रसवाही क्षोतों का अवरोध हो जाने से स्वस्थान अर्थात् हृदय (एवं फुफ्फुस) में ही विदग्ध (विकृत) हो जाता है और वही खाँसते समय कफ के रूप में निकलता रहता है (च० चि० अ० ७) अतएव उसे कफ क्षय भी कहते हैं। राजयक्ष्मा काय चिकित्सा का रोग है, अतः च० चि० अ० ७ तथा च० नि० अ० ६ में विस्तार से वर्णित है। पाठक वही देखें। आज कल ऐलोपेथी वाले जिसे टी० बी० या थायसिस कहते हैं वह वस्तुतः चरक संहिता में वर्णित शोष रोग है पाठक ध्यान से देखें ॥१०॥
भक्तद्वेषो ज्वरः श्वासः कासः शोणितदर्शनम्।
स्वरभेदश्च जायेत षडरूपे राजयक्ष्मणि ॥११॥
भोजन में अर्चि, ज्वर, श्वास, कास, रक्त का आना और भेद, ये छे रूप राजयक्ष्मा में होते हैं ॥११॥
स्वरभेदोऽतिछाच्छूलं संकोचश्चांसपाश्चर्वयोः।
ज्वरो दाहोऽतिसारश्च पिच्छाद्रकस्य चागमः ॥१२॥
गिरसः परिपूर्णत्वमभक्तच्छन्द एव च।
कासः कण्टस्य चोद्द्वंसो विज्ञेयः कफकोपतः ॥१३॥
ग्यारहरूप—बायु के कारण स्वरभेद, शूल, अंस और पाश्चर्वों में संकोच, पिच्छ के कारण ज्वर, दाह, अतिसार और रक्त का आना, कफ के कारण, शिर का कफ से भरना, भोजन में अर्चि, कास, कण्ट भंग, होता है। बात से तीन, पिच्छ से चार, कफ से चार लक्षण—इस प्रकार ग्यारह लक्षण राजयक्ष्मा में होते हैं ॥१२,१३॥
एकादशभिरेभिर्वा षड्भिर्वाऽपि समन्वितम्।
(कासातीसारपाश्चर्वीतिस्वरभेदारुचिज्वरैः ॥१४॥
त्रिभिर्वा पीडितं लिङ्गैर्ज्वरैर्कासास्तृणामयैः।)
जहाच्छोषादितं जनतुमिच्छन्तु सुविपुलं यशः ॥१५॥
इन ग्यारह लक्षणों से अथवा छे लक्षणों से युक्त (कास, अतिसार, पाश्चर्वशूल, स्वरभेद, अर्चि, एवं ज्वर इन छे अथवा ज्वर, कास, रक्तखाव इन तीन लक्षणों से युक्त) शोष से पीड़ित रोगी को उत्तम यश चाहनेवाला वैद्य छोड़ देवे, उसकी चिकित्सा न करे।
वि० मन्तव्य—छ रूपवाले राजयक्ष्मा में शोणित दर्शन, (श्लो० ११) ११ रूपवाले में रक्तस्य आगमः—रक्त का आना (श्लो० १२), कास आदि छ रूपवाले में पाश्चर्वीऽर्चि—पाश्चर्व (फुफ्फुस) में वेदना तथा ज्वर आदि तीन लक्षणवाले में असु गामय—रक्त रोग या रक्तगम नामक लक्षण फुफ्फुस गत क्षण के सूचक हैं। रक्त का एक नाम “क्षतज” है, शब्दार्थ है जो क्षत से प्रादुर्भूत हो—दिखाई दे। यही क्षत “एकस रे” द्वारा चित्रपट पर दिखाई पड़ता है। चरक के शब्दों में—“तस्य अतिमात्रेण कर्मणां उरःक्षण्यते, तस्य उरः क्षतं उपलब्धते वायुः……ततः क्षणनात् च एव उरसः……कासप्रसङ्गात् उरति क्षते शोणितं द्योवति, शोणितगमनात् च अस्य दौर्बल्यं उपजायते” च० नि० अ० ६।४४-५। और इसी का वर्णन अगले २४-२५ वें श्लोकों में किया गया है और वह उरःक्षत (श्लो० १६) से उत्पन्न शोष माना गया है। इसमें प्रथम रक्त आता है, फिर पाक होने पर पूय तथा तद्रूप कफ आता रहता है। इसमें भी अरुण वर्ण का रक्त मिला रहता है, परन्तु कभी कभी किसी र रोगी को ॥१४,१५॥
व्यवायशोकस्थायिर्न्यायामाश्चोपवासतः।
ब्रणोरःक्षतपीडाभ्यां शोषानन्दये वदन्ति हि ॥१६॥
व्यवाय, शोक, स्थविरता (बुढ़ापा), व्यायाम, मुखाफरी, उपवास, ब्रण, उरःक्षत की पीड़ा के कारण से शोष होता है, ऐसा अन्य आचार्य कहते हैं ॥१६॥
व्यवायशोषी शुक्रस्य क्षयलिङ्गरूपद्वुतः।
पाण्डुदेहो यथापूर्वं क्षीयन्ते चास्य धातवः ॥१७॥
व्यवाय (मैथुन-वीर्यक्षय) के कारण उत्पन्न शोष में रोगी शुक्रक्षय के लक्षणों से (शुक्रक्षये भेषबृषणयोः वेदना, अर्थात् मैथुने, चिराद्वा प्रसेकः, प्रसेके चाल्यदर्शनम् रक्तस्य शुक्रस्य वा), पीड़ित, रोगी का शरीर पाण्डुवर्ण होता है, क्रमशः पूर्व धातु सूख जाते हैं, अर्थात् शुक्र से पूर्व मज्जा का क्षय, मज्जा से पूर्व अस्थि, अस्थि से पूर्व भेद का, भेद से पूर्व मांस का क्षय होता है ॥१७॥
प्रधानशीलः क्षस्तगः शोकशोष्यपि तादृशः।
विना शुक्रक्षयकृतेर्विकारैरभिलक्षितः ॥१८॥