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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ४१ ]

वत्तरतन्त्रम्

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शोकशोषी मनुष्य निरन्तर ध्यान में ( चिन्ता में ) डूबा, शिथिल अंगों का, व्यवाय शोष के लक्षणों के समान परन्तु शुक्लक्षयजन्य लक्षणों से रहित होता है। (शुक्लक्षय के लक्षण नहीं होते) ॥१८॥

जराशोषी कुशो मन्दवीर्ययुद्धिबलेन्द्रियः। कम्पनोऽरुचिमान्भिनन्कांस्यपात्रहृतस्वरः (तः) ॥१९॥ छीवति श्लेष्मणाहीनं गौरवारुचिपीडितः। संप्रच्छ्रुतास्यनासाक्षः सुमरुक्षमलच्छविः ॥२०॥

जराशोषी मनुष्य कुश, मन्दवीर्य, मन्दबुद्धि, मन्दबल एवं मन्द इन्द्रिय शुक्ल एवं आँख आदि), काँपनेवाला, अरुचि-युक्त, टूटे हुए काँसे के पात्र के समान भँकार (आवाजवाला), कफ के बिना शूकता है, गौरव-भारीपन, अरुचि से पीड़ित, मुख-नासा-आँख से पानी बहता है, कान्ति सुप्त (निर्जीव), रूक्ष एवं मलिन होती है ॥१९, २०॥

अध्वप्रशोषी क्षत्ताङ्गः संपृष्टप्ररुषच्छ्वविः। प्रसुप्तगात्रावयवः शुष्ककलोमगठाननः ॥२१॥ अध्व ( मुसाफरी ) शोषी-मनुष्य के अंग ढीले रहते हैं, कान्ति जली हुई एवं कठोर रहती है। शरीर के अवयव शोये हुए, क्लोम, गला और मुख शुष्क रहते हैं ॥२१॥

व्यायामशोषी भूयिष्ठमेभिरैव समन्वितः। उरःक्षतकृतैलिङ्गैः संयुक्तश्च क्षताद्विना ॥२२॥ व्यायामजन्य शोष से पीड़ित मनुष्य अध्वशोषी के मुख्य एवं बहुत से लक्षणों से युक्त होता है। इसमें उरःक्षतजन्य शोष के सब लक्षण मिलते हैं, परन्तु क्षत नहीं होता ॥२२॥

रक्तक्षयाद्वेदनाभित्तथैवाहारयन्त्रणात्। व्रणितस्य भवेच्छोषः स चासाध्यतमः स्मृतः ॥२३॥ व्रणरोगी में रक्त के क्षय के कारण, वेदना के कारण तथा आहार की परहेजी से व्रण रोगी में जो शोष उत्पन्न हो जाता है, वह असाध्य माना है ॥२३॥

व्यायामभाराध्ययनेरभिघातातिमैथुनैः। कर्मणा चाप्युरस्येन वक्षो यस्य विदारितम्। तस्योरसि क्षते रक्तं पूयः श्लेष्मा च गच्छति ॥२४॥ कासमानरुद्धयैच्छ च पीतरकासितारुणम्। संतप्तवक्ष्याः सोऽत्यथ दूषनात्परितान्यति ॥२५॥ दुर्गन्धवद्वनोच्छवासो भिन्नवर्णस्वरो नरः।

व्यायाम से, भार से, अध्ययन (पढ़ने एवं पढ़ाने) से चोट लगने से, अतिमैथुन से छाती पर जोर पड़नेवाले कार्यों से (जैसे घनूष को तानना, भागते हुए घोड़ों के साथ भागना या रोकना), जिस रोगी का उरःस्थल विदीर्ण हो जाता है, उसकी छाती में क्षत होने से रक्त, पूय और कफ जाता है। खांसे हुए या वमन करते हुए पीला, लाल, काला, अरुण खाव होता है।

वक्षस्थल अतिशय जलता है, वेदना की अधिकता से मूच्छा आती है, मुख एवं उच्छ्वास में दुर्गन्ध आती है, वर्ण और स्वर फटा हुआ होता है ॥२४, २५॥

केषाचिदेवं शोषे हि कारणेभेदमागतः ॥२६॥ न तत्र दोषलिगानां समस्तानां निपातनम्। कई आचार्यों के मत में व्यायाम आदि अनेक कारणों से शोष में जो भेद आया है, उसे वे नहीं मानते, क्योंकि उनमें तीनों दोषों के लक्षण मिलते हैं। अर्थात् इनके मत में शोष एक ही है—व्यायाम आदि भेदजन्य नहीं हैं ॥२६॥

क्षया एव हि ते ज्ञेयाः प्रत्येकं धातुसंज्ञिताः ॥२७॥ व्यायामादिजन्य इन शोषों को क्षय ही जानना चाहिये, इनको धातुक्षय संज्ञक जाने।

वक्तव्य—क्योंकि शुक्ल से आरम्भ करके विलोम रूप में व्यवाय आदि के कारण धातुओं का यथापूर्व क्षय होता है ॥

चिकित्सितं तु तेषां हि प्रागुक्तं धातुसंक्षेपे ॥२८॥ दोषघातु मल क्षय इद्धि अध्याय में इन धातुक्षयों की चिकित्सा पहले कह दी है ॥२८॥

श्वासान्नासदकफसंस्त्रवतालुशोष- च्छर्च्यगिनसादमदीनसपाण्डुनिद्राः।

शोषे भविष्यति भवन्ति स चापि जन्तुः शुक्लैक्षणो भवति मांसपरो रिरंसुः ॥२९॥

स्वप्नेषु काकशुकशल्लकिनीलकण्ठ- गुप्तास्थेव कपयः कृकलासकाश्च।

तं वाहयन्ति स नदीर्विजलाश्च पर्ये- च्छ्लुष्कास्तूरुण पवनधूमदवादितांश्च ॥३०॥

पूर्वरूप—श्वास, अंगों में शिथिलता, कफ का खाव, तालु का सूखना, वमन, अनिमान्द्य, मद (मूच्छा), पीनस, पाण्डुरोग, नींद की अधिकता, आंखों का सफेद होना, मांसाभिलाषा, मैथुन की इच्छा, ये होनेवाले शोष रोग में लक्षण होते हैं। स्वप्न में कौआ, तोता, चील, नीलकण्ठ, गीध, बन्दर, छिपकली इसको ले जाते प्रतीत होते हैं। रोगी सूखी नदियों को देखता है, वृक्षों को रूखे, वायु, धूम एवं दवानल से जले देखता है। वक्तव्य—मद (मुपारी जन्म सत्ता) रिरंसु-मैथुन की इच्छा, यह रोग माहात्म्य से होता है। कृकलास गिरगिट ॥

महाशानं क्षीयमाणमतीसारनिपीडितम्। शून्यसुष्कोदरं चैव यद्विषमं परिवर्जयेत् ॥३१॥

बहुत खाने पर भी क्षीण होते हुए, अतिसार से पीड़ित, मुष्क, (अण्डकोष) और उदर पर सूजन होने पर यक्ष्मा रोगी की चिकित्सा न करे ॥३१॥

उपचरेदात्मवन्तं दीप्ताग्निसंक्रुं नवम्।