सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४१ ]
जितेन्द्रिय, प्रदीप्तानि, बलवान्, नये रोगी की चिकित्सा करे। (नवम्-एक साल से कम)।
स्थिरादिवर्गसिद्धेन घृतेनाजाविकेन च ॥३२॥
स्तिग्धस्थ मृदु कर्तव्यमूर्ध्वं चाधश्च शोधनम्।
आस्थापनं तथा कार्यं शिरसश्च विरेचम् ॥३३॥
विदारिगन्वादिगणे से सिद्ध किये बकरी या भेड़ के घी से रोगी का स्नेहन करके ऊर्ध्व एवं अधः (वमनविरेचन) मृदु शोधन करे। मृदु आस्थापन (निरुह) देवे, शिरोविरेचन भी मृदु करे ॥३२,३३॥
यवगोधूमशालीश्च रसैर्मुञ्जीत शोषितः।
शोधन हो जाने पर जो गेहूँ, शाली को जांगल मांस रस से खाये।
हृद्रेऽग्नौ वृंहयेच्छ्वापि निवृत्तोपद्रवं नरम् ॥३४॥
अग्नि के बलवान् होने पर, उपद्रव शान्त हो जाने पर मनुष्य का वृंहण करे ॥३४॥
व्यवायशोषी को प्रायः वातजन्यरोग होते हैं। इसके लिये वृंहण, स्निग्ध, वातनाशक विधि बरते।
कहा भी है—
“व्लानिःकम्पोऽवसादः तदनु च कृशता क्षीणता चेन्द्रियाणाम्, शोषो श्वासोपदंश्चञ्चरगुदजगदाः क्षीणता सर्वधातोः। जायन्ते दुर्निवाराः पवनपरिभवाः क्लीवतालिंगभंगाः। वामावश्यातियोगात् भजत इह सदा बाजिकमन्युतस्य” ॥३४॥
व्यवायशोषिणं प्रायो भजन्ते वातजा गदाः।
वृंहणीयो विधितस्तमे द्वितः स्निग्धोऽनिलापहः ॥३५॥
काकानुलूकाश्चकुलान् विडालान्
गण्डूपदान् व्यालबिलेशयाखूनम्।
गुर्धाश्च दद्याद्विविधैः प्रवादैः
ससैन्धवान् सषपतेलभृशान् ॥३६॥
देयानि मांसानि च जाङ्गलानि
सुदृगढकीसूपरसाश्च हृद्याः।
खरोष्ट्रनागराश्वतराश्वजानि
देयानि मांसानि सुकल्पितानि ॥३७॥
मांसोपदंशाश्च पिबेदरिधान्
माहीकियुक्तान् मदिराश्च सेव्याः।
अर्कासुताक्षारजलोपितेभ्यः
कृत्वा यवेभ्यो विविधाश्च भद्व्यान् ॥३८॥
खादेत्, पिबेत् सर्पिरजाविकं वा
कृशो यवावा सह भक्तकाले।
सर्पिमधुभ्यां त्रिकुटु प्रलिह्या-
क्वचन्याविदङ्गोपहितं क्षयार्तः ॥३९॥
कौआ, उल्लू, नेवला, बिल्ली, केंचुआ, व्याल (हिसक पशु), बिलेशय, चूहा, गीध, इनको नानाप्रकार के भूटे बचन कहकर, सैन्धव के साथ सरसां के तेल में भूनकर देवे। जांगल मांस देवे। मूंग, अरहर के गूथ देवे, मन के प्रिय मांखर दे। गधा, ऊंट, हाथी, खच्चर, घोड़ा इनके मांसों को भली प्रकार बनाकर देवे। मांस के पकौड़ों को खाकर भरिघों (अभयारिष्ठ अदि) को पीये। माहीक मद्य, या मदिरा को पीये। आक और गिलोय के क्वाथ के पानीयक्षार में रात भर रक्खे। जो से नाना प्रकार के मद्य बनाकर खाये। बकरी या भेड़ का घी पीये। कुछ व्यक्ति भोजन के समय यवागू के साथ बकरी या भेड़ का घी खाये। क्षय रोगी, त्रिकुटु, विडंग के साथ घी और मधु को चाटे।
वक्तव्य—बिल्ली छै प्रकार की है—ग्राम्यो वन्यस्तोयजातः पक्षिमाजंरिबिज्जको। सुगन्धवृषण्यश्चेति माजंराः षट् प्रकीर्तितः॥ प्रवाद-मिथ्यावचन से, चरक में इसके लिये उपधा शब्द प्रयोग किया है, उसमें भी-काकस्तिचिरिशब्देन मत्स्यशब्देन चोरगान्। भृष्टमत्स्यशब्देन दद्याद् गण्डूपदानि॥ इसका लाभ—जानन् जुगुप्सन्नैवाद्याद् भुक्तं वा पुनश्चलित्वेत। तस्माच्छोपसिद्धानि मांसान्येतानि दापयेत्॥ गधे आदि का मांस मांस को बढ़ाता है, यथा—“खरोष्ट्राश्वतरं नागं मांसं मांसाभिबृद्धये। दद्यान्माहिषशब्देन वेंसवारीकृतं भिषक्॥” पानीयक्षार—“पानीयभोजनाथाय भस्मखाद्यं चतुर्गुणे। जजेऽर्धमवशिष्टं तु क्षाराग्नौ ब्राह्मिष्यते॥” चरक—गजखड्गपुर-गाणां वेशवारीकृतं भिषक्। दद्यान्महिषशब्देन मांसं मांसाभिबृद्धये॥ मांसोनेपचित्वाङ्गानां मांसं मांखरं परम्। तीक्ष्णोष्णलाघवात् शस्त्रं विशेषान्मृगपक्षिणाम्॥ मांसानि यान्यनभ्यासात् अनिष्टानि प्रयोजयेत्। तेषूपधा, सुखं भोक्तुं तथा शक्यानि तानि हि। जानन् जुगुप्सन्नैवाद्याद्जगधं वा पुनश्चलित्वेत। तस्मात् छद्मोपसिद्धानि मांसान्येतानि दापयेत्॥
वि० मन्तव्य—विधिः प्रवादः—प्रवाद-छल उपधा। जिन देशों-जातियों, कुलों अथवा व्यक्तियों में कौआ, उल्लू आदि का मांस खाने का प्रबार अथवा अभ्यास नहीं है वहाँ अथवा उस व्यक्ति को छल से मांस खिलाना चाहिये। चरक के शब्दों में कौआ को तीतर कहकर, सर्प को मछली कहकर खिला देना चाहिये, अन्यथा घृणा होने के कारण छर्दि हो सकती है। चीन जापान आदि देशों में तो सर्प, माजंर आदि का मांस चाव से खाया जाता है, वहाँ छल करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। और यूरोपीय देशों में गधा एवं खच्चर का मांस भी चाव से खाया जाता है, जैसे भारत में मछली तथा बकरा का मांस तथा कुछ जातियों में महिष का और कुछ व्यक्ति सर्प का मांस भी चाव से खाते हैं। तत्पर्य यह है, कि