सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअं. ४१]
चिन्तरत्नम्
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शोष रोगी को मांस खिलाना चाहिये। क्योंकि शरीर का वृंहण करने के लिये मांस से उत्तम अन्य कोई वस्तु नहीं है ॥
गांसादमासेसु घृतं च सिद्धं शोषापहं क्षौद्रकणासमेतम्।
मांस खानेवाले ( गीध आदि ) प्राणियों के मांसों में सिद्ध किया घृत मधु और पिप्पली के साथ खाने से शोष नाशक है। द्राक्षासितामागधिकवलेहः
सक्षौद्रतैलः क्षयरोगघाती ॥४०॥
घृतेन चाजेन समाश्रिकेण
तुरङ्गगन्धातिलमाषचूर्णम्।
द्राक्षा, शर्करा, पिप्पली का अवलेह मधु और तैल के साथ खाने से क्षयरोग नाशक है। अक्षगन्धा, तिल, उड़द का चूर्ण, बकरी के घी और मधु के साथ अवलेह रूप में खाये ॥४०॥
सिताश्वगन्धामगधोद्रवानां
चूर्णं घृतक्षौद्रयुतं प्रलिह्यात् ॥४१॥
सिता, अश्वगन्धा, पिप्पली इनके चूर्ण को घी और मधु के साथ चाटे ॥४१॥
क्षीरं पिबेद्वाऽप्यथ वाजिगन्धा-
विपक्मेवं लभतेऽङ्गुष्ठुष्टिम्।
अश्वगन्धा से पकाया दूध पीये, इससे अंगों की पुष्टि होती है।
तदुत्थितं क्षीरघृतं सिताब्जं
प्रातः पिबेद्वाऽपि पयोनुपानम् ॥४२॥
अश्वगन्धा से सिद्ध दूध में से निकाला घृत प्रचुर सिता ( मिश्री ) के साथ प्रातःकाल दूध के अनुपान से पीये।
वि० मन्तव्य—निरामिष भोजियों के लिये अश्वगन्धा का चूर्ण आधा तो० से १ तो० की मात्रा में आधा से १ से २ दूध में पकाकर, रबड़ी का-सा गाढ़ा हो जातेपर, शीतल करके और खण्ड या मिश्री मिलाकर भूखे पेट पीने से बहुत लाभप्रद है। और निम्नलिखित वासाघृत आदि योग भी उत्तम हैं ॥४२॥
उत्सादने चापि तुरङ्गगन्धा
योज्या यवाश्चैव पुनर्नवे च।
उद्बर्चन ( उबटन ) में—अश्वगन्धा, जो, श्वेत एवं लाल पुनर्नवा को बरते।
कृत्स्ने घृषे तत्कुसुमैश्च सिद्धं
सर्पिः पिबेत्क्षौद्रयुतं हिताशी ॥४३॥
यदमाणमेतत् प्रबलं च कासं
श्वासं च हन्यादपि पाण्डुतां च।
अङ्गुष्ठा के मूल पत्र-शाला-अंकुर के काथ में पुष्पों के कल्क से सिद्ध किया घृत मधु के साथ-हितकारी भोजन करते हुए खाये। इससे यक्षमा, प्रबल कास, श्वास और पाण्डु भी नष्ट हो जाता है।
वक्तव्य—मूल-पत्र आदि के चतुर्गुण देवाय में पुष्पकल्क आठवां भाग मिलाये, यथा—
“शणस्य कोविदारस्य वृषस्य च पुष्क पुष्क।
कल्काब्जत्वात् पुष्पकल्कं प्रस्थे पलचतुष्टयम्” ॥४३॥
अकृद्रसा गोऽश्वगजाश्वजानां
क्वाथा मितारचापि तथैव भगौः ॥४४॥
मूर्वाहरिद्राखदिरदुमाणां
क्षीरस्य भागस्त्वपरौ घृतस्य।
भागान् दशैतान् विपचेद्विधिन्नो
दत्त्वा त्रिवर्गं मधुरं च कृत्स्नम् ॥४५॥
कटुत्रिकं चैव समद्रदारु
घृतोत्तमं यक्षमनिवारणाय।
गाय-घोड़ा हाथी-बकरी-मेड़ इनके गोबर का रस, मूर्वा, हल्दी और खैर इनका काथ, नवां दूध ये प्रत्येक समान भाग और दशवां घी, यह भी एक भाग के समान लेकर, त्रिफल समर्पण मधुर वर्ग ( जीवक, श्रृषमक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, श्रुद्धि, वृद्धि ये आठ अथवा काकोल्यादिगण), त्रिकटु, देवदारु, इनका कल्क मिलाकर घृत सिद्ध करे। यह घृत यक्षमा नाश के लिये श्रेष्ठ है ॥४४,४५॥
द्वे पञ्चमूलयो वरुणं करञ्जं
भञ्जातकं बिल्वपुनर्नवे च ॥४६॥
यवान् कुलस्थान् बदराणि भागी
पाठां हुतार्शं समहौकदम्बम्।
कृत्वा कषायं विपचेद्वि तस्य
षड्भिर्हि पात्रेषु तपात्रमेयम् ॥४७॥
व्योषं महावृक्षपयाऽप्यायां च
चण्डं सुराख्यं लवणोत्तमं च।
एतद्वि शोषं जठराणि चैव
हन्यात् प्रमेहाश्च सहानिलेन ॥४८॥
दशमूल, वरुण, करंज, भिलावा, बिल्ब, पुनर्नवा, जो, कुलस्थी, बेर, भागी, पाठा, चित्रक, महीकदम्ब, इनका कषाय चतुर्गुण जल में करे। यह कषाय छे आदक, घृत एक आदक, त्रिकटु, स्तुहीदूध, हरङ्ग, चण्ड, देवदारु, सेन्धव इनका कल्क मिलाकर घृत सिद्ध करे। यह घृत शोष, जठर ( उदर ), और सब प्रकार के वायु समेत प्रमेहों को भी नष्ट करता है। ( वात-जन्म प्रमेह असाध्य है, यह स्तुतिपरक वचन है ) ॥४६-४८॥
गोऽश्वान्यजमेणखरोष्टजातैः
शक्रद्रसक्षीररसक्षतोत्थैः।
द्राक्षाश्वगन्धामागधासिताभिः
सिद्धं घृतं यक्षमविकारहारि ॥४९॥
गाय, घोड़ा, मेड़, बकरी, हरिण, ऊंट, गधा, हाथी, इनके गोबर के रस, दूध, मांसरस, रक्त, इनमें द्राक्षा, अश्वगन्धा,