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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 772

७१६ सुश्रतसं हिता [ अ०५। पिप्पली, शकरा इनके करक से सिद्ध किया धृत यद्दभा रोग को अजाशकृन्ूत्रपयोधृतीसङ- नष्ट करता है ।४६॥ मांसाख्यानि प्रतिसेवमानः। एलाजमोदामर्काभयाक्ष- स्तानादिना ना विधिना जहाति गायञ्यरिष्टासनशाख्सारान्‌। मासादशलेषं नियमेन ओषम्‌ ।५६॥

विडज्गभल्लातकचिच्नकोग्रा- बकरी कौ मीगनी, मूच, दूध, घृत, रक्त, मांस, साथ कटुत्रिकाम्भोदसुराष्ूजां शच ॥५०॥ रहना (ये सब बकरी के ही) इनका स्नान आदि नाना शि पक्त्वा जे तेन पचेद्धि सपि- से नियम पूवक सेवन करने पर, एक मास मे सम्पूर्ण शा स्तस्मिन्‌ सुसिद्धं स्ववतारिते च । ते यक्त हो जाता है । ग

त्रि्त्पङान्यत्र सितोपाया कहा मी ै--

दन्तवा तुगाक्षोरिपडानि षट्‌ च ।५९१॥

प्रस्थे घतस्य द्विगुणं च दद्यात्‌

छ्षो द्रं ततो मन्थहतं विदध्यात्‌ ।

प पटं प्रातरतः प्रख्य

पञ्चात्‌ पिवेत्‌ क्षीरमतन्द्रित्च ।।५२॥

एतद्धि मेध्यं परमं पवितं चच्युष्यमायुष्यमथो यशस्यम्‌ । यद्माणमा्चु म्यपहन्ति चैतत्‌

पाण्डवामयं चैव भगन्दर च ॥५३॥ इवासं च हन्ति स्वरभेदकासः हसष्टोदगल्मभ्रहणीगदांश्च ।

न चात्र किंचित्‌ परिवजनीयं रसायनं चैतदुपास्यमानम्‌ ॥५८४॥ इलायची, अजवायन, आंवला, हरड़, बेडा, खेर, नीम,

विजयसार, शार इनके सार भाग, विडङ्ग, मिखावा; चित्रक) वच, ननिकटु, मोथा, सोरटी मिट्टी (गोपीचन्दन) इनके काथ से घृत एक भस्य केकर घृत सिद्ध करे । सिद्ध किये इस एक प्रस्थ

घृत मे मिश्री तीस पल, वंशरोचन छ पठ, मधुःदो प्रस्थ

मिलाकर मन्थन दण्ड से मथकर रख देवे । प्रतिदिन प्रातःकाठ इसमं से एक पर चाटकर ऊपर से दुघ पीये । इस प्रकार बिना आलस्य के करे । यह धृतयोग अतिशय मेषावधंक, पवित्र, चक्तुष्य, मायुष्य, यशस्य है, यद्मारोग को शीघ्र नष्ट करता दै, पाण्डुरोग, मगन्द्र, श्वाख, स्वरभेद, कास, हदय, ष्टीहा गुल्मग्रहणी रोग को नष्ट करता दै] इसके-सेवन करने मे किसी

प्रकार का परदेज नदीं रखना पड़ता । निरन्तर सेवन करने पर यह योग रसायन ह ॥५०-५४॥ प्टीहोदरोक्त' विदितं च सपिं- खीण्येव चान्यानि हितानि चात्र।

" यद््मा रोग मे प्टीहोदरोक्त षट्पटघृत, तथा दूसरे तीन घृत (श्त इरीतकौचूण प्रस्थं, २-गव्ये पयसि महादृकष्षीरम्‌ . ३- चव्य चित्रक दन्ती अतिनिषा ), दितकारी ई । उपद्रवांश्च स्वरवे्ृतादीन्‌ = `` जयेदयथास्वं प्रसमीद्य आलम्‌ ॥५५॥ स्वरभंग आदि उपद्रवो को उनकी अपनी अपनी चिकित्वा से शार के अनुसार श्चान्त करे ॥५५॥

वक्तव्य छागम्ठं पयश्छागं छागं सर्पिश्च शर्करम्‌

छागोपसेवा शयनं छागमष्ये तु यद्मनुत्‌ |” बकरी ओर पाराः वत को तथा बन्दर को क्षय नहीं होता, एेसी मान्यता प्राचीन

आचाय की दै । पारावत को इसी ल्यि षरोंमे पाल्तेर यथा-मेषदूत मे -““तां कस्यांचिद्‌ भवनवलमो सु्पारावतापं

नीत्वा रात्रि चिरविसनात्‌ खिन विदयुर्कलत्रः” ॥५६॥

रसोनयोगं विधिवत्‌ क्षयातः

क्षीरेण वा नागबराप्रयोगम्‌ 1 सेवेत वा सागधिकाविधानं |

तथोपयोगं ज॑तुनोऽश्मजस्य ॥५७॥ क्षयरोगी विधिपूवंक ल्दसुन का उपयोग करे या दूष से

नागबला को बरते । अथवा पिप्परीवधमान का सेवन कर,

सी प्रकार शिढाजतु का उपयोग करे ।

विण मन्तव्य-श्लो° ५६ में बतलाए अजासेवन तथा इष

श्ोक मे वतलाए रखोन योग आदि योग बहुत. उपयोगी ई। जो निरामिष मोजी हं, वे अजादुग्ध पीव एवं अजाओं के साथ

हिकमि कर ही रहं तो भी काम होता है ॥५७॥

शोकं लियं करोधमसूयनं च॒ कषयरोगी-ओोक, क्रोध, मेथुन निन्दा करना छोड दे। त्यजदुदासान्‌ विषयान्‌ भजेत ।

वेदान्‌ द्विजातींखिद शान्‌ गुरू

वाताश्च पुण्याः शणुयाद्‌ द्विज्ञेभ्यः |५८।

धमे के अविरोधि-मन के अनुकूल विष्यो का सेवन क|

वैद्य व्राह्मण, देवता, युखजनो की पूजा करे तथा राह्मी

पुण्यक्रारी उपदेश सुने ॥५८॥

“'मांसभेवाश्नतः शोषो माध्वीकं पिब्तोऽपि च। ` नियतानेल्पचित्तस्य चिरं काये न_ तिष्ठति ॥

बारणीमण्डनित्यस्य बहिमाजंनसे विनः ।

अविधारितवेगस्य -यद्माः न रमतेऽन्तसम्‌ । ।

प्रनां ` वारुणीं सीधुमरिष्टानाखवान्मध । यथाहंमनुपानाथं पिबेन्मांखानि मकषवन्‌ ॥ |

` मद्यं तैच्ण्योष्णवेश ्यसुमत्वात्‌ -लोतस।: मुखम्‌

प्रमथ्य विबरृणोत्याश्च तन्मो्लात्‌ खत

क । --<

त॒ धातवः॥ : -.