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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ४९ ]

इतरतन्त्रम्

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पुष्यन्ति धातुपोषाच्च शीघ्रं शोषः प्रशम्यति । (२) बहिः स्पर्शनमाश्रित्य वक्ष्यतेऽतः परं विधिः । स्नेहखीरागबुकोष्ठेषु स्वभ्यक्तमवागहेत् ॥ क्षोतोविबन्धमोक्षार्थं बलपृथ्यर्थमेव च । उत्तीर्णं मिश्रकैः स्नेहैः पुनराक्तैः सुखैः करैः ॥ मृदनीयात् सुखमासीनं सुखे चोत्सादयेन्नरम् । (३) सत्येनाचारयोगेन मङ्गल्यैःप्यहिंसया । वैद्यविप्रार्चनान्चैव रोगराजो निवर्चते ॥ यथा प्रयुक्त्या चेद्यथा राज्यद्वमा पुरा जितः । तां वेदविहितामिष्टिमारोग्यार्थां प्रयोजयेत् ॥ १८० ॥ इति श्रीशुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सतान्तरे शोषप्रतिषेधो नाम ( तृतीयोऽध्यायः, आदितः ) एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥

द्विचत्वारिंशतमोऽध्यायः

अथातो गुल्मप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥ अब इसके आगे गुल्मप्रतिषेध का व्याख्यान करेंगे-जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥ यथोक्तैः कोपनैर्दोषाः कुपिताः कोष्ठमागताः । जनयन्ति नृणां गुल्मं स पञ्चविध उच्यते ॥३॥ त्रण प्रश्न अध्याय में कहे बलवद् विप्रह, कोषादि, दिवा- स्वन आदि कोपक कारणों से प्रकुपित हुए दोष कोष्ठ में आकर गुल्म को उत्पन्न करते हैं । यह गुल्म पाँच प्रकार का है । वक्तव्य—कोष्ठ—“स्थानान्यामाग्निकवृत्तानां मूत्रस्य स्थिरस्य च । हृदुण्डकः फुफ्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥” पाँच प्रकार का गुल्म—पृथग् दोषों से तीन प्रकार का, सन्निपात से और रक्त से । द्रव्द्रज गुल्म भी चरक में कहे हैं, यथा—“व्यामिश्र- लिंगानपरास्तु गुल्मान् त्रीनादिशेद् औषधकल्पनार्थम् ॥” ये तीन भेद औषध विचार से हैं ॥३॥ हृदस्स्योरन्तरे प्रनिश्चः संचारी यदि वाऽचलः । चयापचयवान् वृत्तः स गुल्म इति कीर्तितः ॥४॥ गुल्म की परिभाषा—हृदय और वस्ति के बीच में ( सम्पूर्ण उदर में ), चलनेवाली, या स्थिर रहनेवाली, घटने एवं बढ़ने- वाली, जो गाँठ होती है, उसको गुल्म कहते हैं । वक्तव्य—अबुद्, सिस्ट आदि से भेद इसमें हो जाता है । वायु की प्रधानता रहने से गुल्म में घटाव बढ़ाव गति एवं स्थिरता तथा आकार रहता है । वायु के शान्त होने से गुल्म भी शान्त हो जाता है ॥४॥ पञ्च गुल्माश्रया नृणां पार्थ हृत्ताभिस्तयः ।

मनुष्यों में गुल्म के आश्रय पाँच हैं, हृदय, नाभि, वस्ति, और दो पार्श्व (पङ्कले) । कृपितानिलमूलत्वाद् गूढमूलोदयादपि ॥५॥ गुल्मबद्धा विशालत्वाद् गुल्म इत्यभिधीयते । गुल्म की निश्क्ति-आकुलीकृत वायुमूल से, गूढमूल के कारण उत्पन्न होने से, गुल्म की भाँति विशाल होने से इसको ‘गुल्म’ शब्द से कहा जाता है । वक्तव्य—वायु गुल्म का कारण है, जैसा कि चरक में कहा है—“सर्वेष्वपि तु खल्वेतेषु गुल्मेषु न कश्चिद् वाताहते संभवति गुल्मः ॥ (२) मास्ते ह्युपशान्ते स्वल्पेनापि प्रयत्नेन शक्योऽन्योऽपि दोषो नियन्तुं गुल्मेषु ॥ गुल्मानामनिलशान्तिष- पायैः सर्वशो विधिबदाचारितव्या ॥” चरक नि० अ० ३ । वायु मुख्यतः गुल्म में कुपित व्याकुल रहती है, गुल्म की उत्पत्ति में कारण गुप्त रहता है, गुल्म (समूह) की भाँति विशाल होने से, यथा—वृक्षगुल्म, लतागुल्म, पशुगुल्म, सेन्यगुल्म, आदि समूह के लिये प्रवृत्त होता है । इसलिये विशाल होने से गुल्म कहते हैं ॥५॥ स यस्मादात्मनिचयं गच्छत्यस्मिन्न बुद्धुदुदः ॥६॥ अन्तः सरति यस्माच्च न पाकमुपत्यात्यतः । गुल्म अपने ही ( अपने अवयव में ही ) निचय (बढ़ता) है, जिस प्रकार पानी का बुलबुला पानी से ही बढ़ता है । अन्दर में घूमता है, इसलिये यह गुल्म पकता नहीं । वक्तव्य—प्रायः करके वातिकगुल्म नहीं पकता, पित्तज एवं रक्तजगुल्म पकते हैं, इसी से चरक में कहा है—“रक्तपिताति- बुद्धत्वात् क्रियामनुपलभ्य च । यदि गुल्मो विदह्येत, शस्त्रं तत्र भिषगूजितम् ॥” पित्तजगुल्म रक्तजगुल्म ( मकल्ल विद्रवि ) प्रायः पक भी जाते हैं । अन्तः विद्रवि शीघ्र पकती है, और गुल्म मन्दपाकी रहता है, यह इनमें भेद है ॥६॥ स न्यस्तैर्जायते दोषैः समस्तैरपि चोच्छ्रितैः ॥७॥ पुरुषाणां तथा स्त्रीणां स्त्रियो रक्तैन चापरः । यह पाँच प्रकार का गुल्म कुपित हुए वातादि पृथक् दोषों से तीन प्रकार का, एवं सन्निपात रूप में कुपित दोषों से एक प्रकार का पुरुष और स्त्रियों में होते हैं । स्त्रियों में रक्तजन्य ( आतंचवजन्य ) गुल्म एक अधिक होता है ॥७॥ सदनं मन्दता बहुराटोपोऽन्त्रविकृज्जन्तम् ॥८॥ विण्मूत्रानिलसङ्गश्च सौहित्यासहता तथा । द्वेषोऽन्ने वायुरुध्वं च पूर्वरूपेषु गुलिमनाम् ॥९॥ पूर्वरूप—शिथिलता, अग्नि की मन्दता, अध्मान, आंतों में गड़गड़ाहट, मल मूत्र-वायु का अवरोध, तृप्ति की अस- हिण्णुता, अन्न में द्वेष, वायु का ऊर्ध्वगामि होना, गुल्म के पूर्वरूप हैं ।